स्वयं बने गोपाल

कहानी – विषम समस्या – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मेरे दफ्तर में चार चपरासी थे, उनमें एक का नाम गरीब था। बहुत ही सीधा, बड़ा आज्ञाकारी, अपने काम में चौकस रहनेवाला, घुड़कियाँ खाकर चुप रह जानेवाला। यथा नाम तथा गुण, गरीब मनुष्य था।...

कविता -नागमती-पदमावती-विवाद खंड, रत्नसेन-संतति खंड, राघवचेतन देशनिकाला खंड, राघवचेतन-दिल्ली-गमन खंड- मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

जाही जूही तेहि फुलवारी । देखि रहस रहि सकी न बारी॥ दूतिन्ह बात न हिये समानी । पदमावति पहँ कहा सो आनी॥   नागमती है आपनि बारी । भँवर मिला रस करै धामारी॥  ...

कहानी – गुप्तधन – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

बाबू हरिदास का ईंटों का पजावा शहर से मिला हुआ था। आसपास के देहातों से सैकड़ों स्त्री-पुरुष, लड़के नित्य आते और पजावे से ईंट सिर पर उठा कर ऊपर कतारों से सजाते। एक आदमी...

कविता – रत्नसेन साथी खंड, षट्ऋतु वर्णन खंड, नागमती-वियोग खंड,नागमती-संदेश खंड,रत्नसेन-बिदाई खंड – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

रतनसेन गए अपनी सभा । बैठे पाट जहाँ अठख्रभा॥ आइ मिले चितउर के साथी । सबै बिहँसि के दीन्ही हाथी॥   राजा कर भल मानहु भाई । जेइ हम कहँ यह भूमि देखाई॥  ...

कहानी – अनिष्ट शंका – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

चाँदनी रात, समीर के सुखद झोंके, सुरम्य उद्यान। कुँवर अमरनाथ अपनी विस्तीर्ण छत पर लेटे हुए मनोरमा से कह रहे थे- तुम घबराओ नहीं, मैं जल्द आऊँगा। मनोरमा ने उनकी ओर कातर नेत्रों से...

कविता – देशयात्रा खंड, लक्ष्मी-समुद्र खंड,चित्तौर -आगमन खंड, – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

बोहित भरे, चला लेइ रानी । दान माँगि सत देखै दानी॥ लोभ न कीजै, दीजै दानू । दान पुन्नि तें होइ कल्यानू॥   दरब दान देबै बिधिा कहा । दान मोख होइ, दु:ख न...

कहानी – विध्वंस – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

जिला बनारस में बीरा नाम का एक गाँव है। वहाँ एक विधवा वृद्धा, संतानहीन, गोंड़िन रहती थी, जिसका भुनगी नाम था। उसके पास एक धुर भी जमीन न थी और न रहने का घर...

कविता – गंधर्वसेन मंत्री खंड, रत्नसेन सूली खंड, रत्नसेन-पद्मावती-विवाह खंड, -पदमावती-रत्नसेन-भेंट खंड पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

राजै सुनि जोगी गढ़ चढ़े । पूछै पास जो पंडित पढ़े॥ जोगी गढ़ जो सेंधिा दै आवहिं । बोलहु सबद सिध्दि जस पावहिं॥   कहहिं बेद पढ़ि पंडित बेदी । जोगि भौंर जस मालति...

कहानी – आदर्श विरोध – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

महाशय दयाकृष्ण मेहता के पाँव जमीन पर न पड़ते थे। उनकी वह आकांक्षा पूरी हो गयी थी जो उनके जीवन का मधुर स्वप्न था। उन्हें वह राज्याधिकार मिल गया था जो भारत-निवासियों के लिए...

कविता -देवपाल-दूती खंड, बादशाह-दूती खंड, पद्मावती-गोरा-बादल-संवाद खंड, गोरा-बादल-युध्द-यात्राा खंड, गोरा-बादल-युध्द खंड, बंधन-मोक्ष; पद्मावती-मिलन खंड,- (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

कुंभलनेर राय देवपालू । राजा केर सत्राु हिय सालू॥ वह पै सुना कि राजा बाँधाा । पाछिल बैर सँवरि छर साधाा॥   सत्राुसाल तब नेवरै सोई । जौ घर आव सत्राु कै जोई॥  ...

कहानी – सौत- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

जब रजिया के दो-तीन बच्चे होकर मर गये और उम्र ढल चली, तो रामू का प्रेम उससे कुछ कम होने लगा और दूसरे व्याह की धुन सवार हुई। आये दिन रजिया से बकझक होने...

कविता -राजा-बादशाह-मेल खंड, बादशाह भोज खंड, चित्तौरगढ़-वर्णन खंड, पद्मावती-नागमती-विलाप खंड, रत्नसेन-बंधन खंड- (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

सुना साह अरदासैं पढ़ीं । चिंता आन आनि चित चढ़ी॥ तौ अगमन मन चीतै कोई । जौ आपन चीता किछु होई॥   मन झूठा, जिउ हाथ पराए । चिंता एक हिए दुइ ठाएँ॥  ...

कहानी – उपदेश- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

प्रयाग के सुशिक्षित समाज में पंडित देवरत्न शर्मा वास्तव में एक रत्न थे। शिक्षा भी उन्होंने उच्च श्रेणी की पायी थी और कुल के भी उच्च थे। न्यायशीला गवर्नमेंट ने उन्हें एक उच्च पद...

कविता -रत्नसेन-देवपाल-युध्द खंड, राजा रत्नसेन बैकुंठवास खंड, पदमावती-नागमती-सती खंड, उपसंहार,- (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

सुनि देवपाल राय कर चालू । राजहि कठिन परा हिय सालू॥ दादुर कतहुँ कँवल कहँपेखा । गादुर मुख न सूर कर देखा॥   अपने रँग जस नाच मयूरू । तेहि सरि साधा करै तमचूरू॥...

कहानी – स्वत्व-रक्षा – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

मीर दिलावर अली के पास एक बड़ी रास का कुम्मैत घोड़ा था। कहते तो वह यही थे कि मैंने अपनी जिन्दगी की आधी कमाई इस पर खर्च की है, पर वास्तव में उन्होंने इसे...

कविता -स्त्री – भेद- वर्णन खंड,पद्मावती-रूप चर्चा खंड, बादशाह-चढ़ाई खंड,राजा-बादशाह-युध्द खंड,- मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

पहिले कहौं हस्तिनी नारी । हस्ती कै परकीरति सारी॥ सिर औ पायँ सुभर गिउ छोटी । उर कै खीनि लंक कै मोटी॥   कुंभस्थल कुच मद उर माहीं । गयन गयंद ढाल जनु वाहीं॥...