ऋषि सत्ता की आत्मकथा (भाग – 3): सज्जन व्यक्ति तो माफ़ कर देंगे किन्तु ईश्वर कदापि नहीं

[ महती ईश्वरीय कृपा से जब जब परम आदरणीय ऋषि सत्ता का अति दुर्लभ सम्पर्क “स्वयं बनें गोपाल” समूह को प्राप्त होता है तब तब कोई ना कोई बेशकीमती ज्ञान हमें अवश्य प्राप्त होता है, जिनमें से कुछ ज्ञान को लिपिबद्ध कर अपनी वेबसाइट पर भी सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित करने की विशेष अनुमति प्राप्त होती है जो अनेक सत्यान्वेषी पाठकों को इस कलियुग की दिग्भ्रमित कर देने वाली स्थिति से बारम्बार बचाता है !

इस बार भी ऋषि सत्ता ने एक जीवंत सत्य उदाहरण से बताया है कि कभी भी किसी भी निर्दोष का अहित (चाहे वह अहित वाणी से हो या कर्म से) करने के बारे में गलती से भी नहीं सोचना चाहिए क्योंकि इसके प्रायश्चित स्वरुप मृत्यु तुल्य कष्ट भी झेलने पड़ सकतें हैं)]-

परम आदरणीय ऋषि सत्ता ने हमें एक ऐसी आदि काल की घटना सुनाई जिसका वर्णन संभवतः आज के किसी उपलब्ध ग्रन्थ में नहीं है !

परम आदरणीय ऋषि सत्ता अनुसार,- एक बार ब्रह्मर्षि वशिष्ठ एक विशाल सरोवर के किनारे बैठ कर संधिवेला की प्रतीक्षा कर रहे थे, जिससे वे भगवान् भास्कर की संध्या पूजन कर सकें | जैसे ही उचित काल शुरू हुआ तो ऋषि वशिष्ठ जी उस सरोवर में प्रवेश कर गए और सरोवर के किनारे ही खड़े होकर स्नान करने लगे !

वो सरोवर काफी गहरा था, ये बात वशिष्ठ जी को पता थी अतः वो किनारे की ही तरफ (जहाँ सरोवर कम गहरा था) खड़े होकर स्नान करने लगे !

ऋषि वशिष्ठ का उस सरोवर में प्रवेश करके निश्चिन्त भाव से स्नान करते हुए, देखकर वहीं पर वास करने वाले एक यक्ष को कौतुहल हुआ और उस यक्ष ने सोचा कि मृत्यु का भय तो सभी को होता है तो चलो इन ऋषि की भी परीक्षा ली जाए !

वास्तव में यक्ष मायावी युद्ध लड़ने में अद्भुत महारथी होतें हैं | अतः वह यक्ष एक अति भयंकर और अति विशाल जलचर का रूप धारण कर सरोवर के बीच से अचानक बाहर निकला और वशिष्ठ जी के सामने आकर वीभत्स चीत्कार करते हुए उन्हें भयभीत करने का प्रयास करने लगा !

पर वशिष्ठ ऋषि ने एक बार उसे सामान्य भाव से देखा और फिर वे अपने स्नान करने में ही व्यस्त हो गए !

ऋषि वशिष्ठ जी पर अपना कोई प्रभाव ना होते देख, यक्ष को बहुत बुरा लगा और उसने फिर भयंकर क्रोध दिखाते हुए कहा कि हे ऋषि, मै आज तुम्हे अपना निवाला बनाऊँगा !

तब वशिष्ठ जी ने परम सामान्य भाव से उस यक्ष से कहा कि, ठीक है तुम मुझे निगल सकते हो, पर तुम मुझे पचा नहीं पाओगे जिससे तुम्हारे जीवन को खतरा हो सकता है !

तब उस यक्ष ने क्रोध से पूछा, “इतना घमंड ?”

श्री वशिष्ठ ने प्रत्युत्तर में कहा “ये अहंकार नहीं, तुम्हे सत्य से अवगत करा रहा हूँ कि तुम मुझे इसलिए नहीं पचा पाओगे क्योंकि मेरे अंदर ईश्वर का अंश है” !

तब यक्ष ने खीजते हुए कहा; “क्या सिर्फ तुम्हारे ही अंदर ईश्वर का अंश है, मेरे अंदर नही है ?”

श्री वशिष्ठ ने कहा कि, बिल्कुल तुम्हारे अंदर भी ईश्वर है, पर वो सोया हुआ है !

यक्ष ने कहा; ये क्या मजाक है कि मेरा ईश्वर सोया हुआ है और तुम्हारा जागा हुआ है ? ईश्वर भी कभी सोया या जागा हुआ हो सकता है ?

तब श्री वशिष्ठ ने प्रेम से समझाने की मुद्रा में कहा कि, यही तो इस जग की विडम्बना है कि सभी जीवों में ईश्वर का वास होने के बावजूद अधिकाँश जीवों का ईश्वर सुप्त अवस्था में ही होता है | जिन जीवों का ईश्वर सुप्त अवस्था में होता है उनका ईश्वर भी उन्ही जीवों के रूप में ही ढल जाता है जबकि जिन जीवों के अंदर का ईश्वर जागा हुआ होता है, वे जीव, स्वयं ईश्वर के ही रूप में ढल जातें हैं अतः ये कैसे संभव है कि एक सोया हुआ ईश्वर (अर्थात यक्ष), एक जागे हुए ईश्वर (अर्थात श्री वशिष्ठ) को निगल जाए ?

यक्ष को वशिष्ठ जी की बात अच्छी नहीं लगी बल्कि उसकी क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिससे उसने चेतावनी देते हुए वशिष्ठ जी को तुरंत लपक कर अपने मुंह में भर लिया !

वशिष्ठ जी ने भी जब देखा कि दुर्बुद्धि युक्त यक्ष उन्हें निगलने वाला है तो वे तुरंत योग निद्रा में चले गए, जिसकी वजह से योग माया सक्रीय हो गयी और योग माया ने वशिष्ठ ऋषि को तत्क्षण अपने घेरे में ले लिया | वशिष्ठ ऋषि के चारो ओर स्थित योगमाया के परम तेजस्वी घेरे की वजह से, यक्ष के पेट में असह्य दर्द होने लगा, उसने तुरंत जलचर का रूप त्याग कर अपने वास्तविक रूप में आने की कोशिश की लेकिन वह सफल न हो सका | उस यक्ष को आभास हो गया था कि उससे भयंकर गलती हो गयी थी | उसने प्रत्यक्ष महसूस किया कि अगर जल्द ही उसे उस दर्द से मुक्ति ना मिली, तो उसकी मृत्यु तय है !

यक्ष दर्द से तड़पने लगा | उसने पूरी कोशिश की वशिष्ठ ऋषि को मुंह से बाहर उगलने की पर यह भी संभव ना हो सका | अंत में कोई चारा ना देखकर यक्ष ने सोचा कि वशिष्ठ ऋषि तो ब्रह्मा जी के पुत्र हैं अतः वो ही इस विपत्ति से बचा सकतें हैं !

यक्ष ने अत्यंत दयनीय भाव से ब्रह्मा जी को बार बार पुकारा तो ब्रह्मा जी प्रकट हुए | यक्ष ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा कि, कृपया मुझे बचा लीजिये !

ब्रह्मा जी ने कहा कि, वत्स मै तुम्हे बचा नहीं सकता, तुम्हारी मृत्यु निश्चित है क्योंकि तुमने एक निर्दोष और संत पुरुष को मृत्यु तुल्य कष्ट देने की कोशिश की है इसलिए तुम्हे इसका दंड हर हाल में भुगतना ही होगा पर तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हारी कोई दुर्गति ना हो अर्थात तुम्हे किसी क्षुद्र योनि में जन्म ना मिले इसके लिए स्वयं वशिष्ठ ऋषि ही कोई प्रयास कर सकतें हैं किन्तु वशिष्ठ ऋषि योग निद्रा से तभी बाहर आयेंगे जब तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी !

इस सच्चाई का प्रकटीकरण करने के बाद, ब्रह्मा जी अपने धाम लौट गए और वह यक्ष कुछ ही देर में तड़प तड़प कर मर गया !

यक्ष के मृत शरीर से यक्ष की आत्मा बाहर निकली तो उसने अपने सामने वशिष्ठ ऋषि को मुस्कुराते हुए खड़ा पाया | यक्ष की आत्मा तुरंत वशिष्ठ ऋषि के चरणों से लिपट गयी और आत्मग्लानि व पश्चाताप के आंसू से चरण धोने लगी !

तब वशिष्ठ ऋषि ने यक्ष की आत्मा को प्रेम से गले लगाते हुए कहा कि, सदा याद रखना कि इस संसार में छोटे से छोटे किये गये पाप कर्म का भी भुगतान, एक ना एक दिन करना ही पड़ता है | सच्चे संत का सान्निध्य इसीलिए दुर्लभ माना जाता है क्योंकि इनके सम्पर्क में पापों का प्रायश्चित शीघ्र होने लगता है जिससे जीव उत्तम गति के योग्य बनता है | तुम्हारे अंदर जो अतिक्रमण (आधुनिक भाषा में कहें तो दबंगई या अनावश्यक धौंस ज़माना) करने की भावना थी उसका असली प्रायश्चित यही है कि तुम अब विशुद्ध सेवा धर्म सीखो और सेवा धर्म के सबसे महान गुरु हैं स्वयं भगवान् श्री विष्णु जी, अतः मै तुम्हे अपने तपोबल से विष्णु धाम भेज रहा हूँ जहां तुम स्वयं परमेश्वर श्री विष्णु जी से ही महान सेवा धर्म का महत्व समझो !

परम आदरणीय ऋषि सत्ता से “स्वयं बनें गोपाल” समूह को प्राप्त इस कथा का सारांश यही है कि इस दुनिया में कभी भी, किसी भी निर्दोष के खिलाफ कुछ भी गलत करने या गलत बोलने से पहले हजार बार सोच लेना चाहिए क्योंकि जब कभी भी इन पापों का दंड, ईश्वर की तरफ से मिलना शुरू होता है तो अच्छे से अच्छा दबंग आदमी भी दया का निरीह पात्र बनकर रह जाता है !

आज के जमाने में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें दूसरे लोगों की पीठ पीछे झूठी बुराई करने में बहुत मजा आता है और वे दिन रात किसी ना किसी आदमी की झूठी बुराई या बढ़ा चढ़ा कर बनाई गयी बुराई करने में ही व्यस्त रहतें हैं, ऐसे लोगों को की यह आदत इतनी ज्यादा पक्की हो चुकी होती है कि उन्हें यह कभी महसूस ही नहीं होता है कि किसी की झूठी बुराई करना भी कोई गलत काम होता है !

पाप चाहे सामने हो या पीठ पीछे, भगवान् से बिल्कुल छुपा नही रह सकता है क्योंकि भगवान् का एक नाम “सर्वगोप्ता” भी है जिसका अर्थ होता है हर छोटी से छोटी गोपनीय बातों को भी जानने वाले, इसलिए वक्त रहते अपने मुंह को दूसरों की झूठी बुराई के कूड़ेदान में बदलने से पहले ही, उसे ईश्वर के नाम जप के मंदिर में बदल देना चाहिए, नहीं तो ईश्वर जब किसी निर्दोष के बारे में मिथ्या भाषण का दंड देना शुरू करतें हैं तो उस दंड के असहनीय कष्ट से बचने के लिए उस मिथ्याभाषी को प्रायश्चित स्वरुप उन सभी लोगों से बार बार खुद ही स्वीकारना होता है कि हाँ मै अपने जलनखोर स्वभाववश, आपके बारे में हमेशा झूठी बुराई हर जगह करके आपको बदनाम करने की हर संभव कोशिश करता रहता था !

प्रायश्चित स्वरुप अपने गलत काम को, अपने से ही बार बार स्वीकारने की भविष्य की शर्मिंदगी से बचने से तो बेहतर है कि जल्द से जल्द किसी निर्दोष की झूठी बुराई करना तुरंत रोक देना चाहिए !

अक्सर यह देखा जाता है कि हल्की मानसिकता के कई लोग, अपने किसी ख़ास परिचित के बहकावे में आकर, किसी निर्दोष के खिलाफ हो जातें हैं और उस निर्दोष से मन ही मन इर्ष्या, द्वेष या नाराजगी रखतें हैं और साथ ही साथ जब भी उचित मौका मिलता है उस निर्दोष की बुराई भी दूसरों से करते हैं, तो ऐसे बहकावे में आकर निर्णय लेने वाले हल्के मानसिकता के लोगों को भी अच्छे से समझने की जरूरत है कि पाप चाहे स्व बुद्धि से हो या बहकावे में आकर, पाप तो पाप होता है और हर पाप का कोई ना कोई दंड ईश्वर के द्वारा देर सवेर प्रदान किया ही जाता है !

इसलिए बेहतर है कि निर्दोषों या सज्जनों के प्रति अनावश्यक द्वेष रखने वाले लोगों (चाहे वे लोग अपने कितने भी ख़ास क्यों ना हों) से एकदम दूरी बना लेनी चाहिए, नहीं तो ऐसे जलनखोर लोग अपने बुरे कर्मो के चक्रव्यूह मे फंसकर देर सवेर खुद तो डूबेंगे ही, साथ में अपने साथियों को भी ले डूबेंगे !

वैसे इस कलियुग में ऐसे भेड़ की खाल में भेड़िये भी बहुत हैं, जो दिन रात मीठी मीठी भाषा में बहुत धर्म कर्म की बात करते हैं, पर अंदर ही अंदर ऐसे सच्चे सज्जनों से बेवजह द्वेष रखतें हैं, जो अपने विरक्त स्वभाववश उन्हें विशेष तवज्जों नहीं देते हैं !

यहाँ इस लेख में मिथ्या भाषण, निंदा आदि के बारे में इतने विस्तार से इसलिए समझाया गया है क्योंकि निर्दोषों को सताने की प्रकिया में सबसे ज्यादा आज भी मिथ्या भाषण (अर्थात झूठा आरोप लगाने) का ही इस्तेमाल हो रहा है | मिथ्या भाषण के बाद दूसरे स्थान पर है, दूसरों के हिस्से के अधिकार/वस्तु को हड़पने का कर्म | तीसरे स्थान पर है निर्दोषों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का कर्म और चौथे स्थान पर है निर्दोषों की हत्या करने का कर्म (जैसा कि यक्ष ने उपर्युक्त कथा में कोशिश की थी) हालांकि कुछ मिथ्या भाषण या कुटिल कर्म इतने ज्यादा दुखदायक होतें हैं जो किसी निर्दोष या सज्जन को मृत्यु तुल्य कष्ट प्रदान करते हैं |

इस कलियुग में जघन्य पाप करने के बावजूद भी वाणी की चतुरता और फर्जी सबूतों से लोक दंड से तो आसानी से बचा जा सकता है, पर ईश्वरीय दंड से कदापि नहीं !

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