ऋषि सत्ता की आत्मकथा (भाग – 2): चाक्षुषमति की देवी प्रदत्त ज्ञान

· April 15, 2017

[ परम आदरणीय ऋषि सत्ता की अत्यंत दयामयी कृपा है कि “स्वयं बनें गोपाल” समूह को उनसे जुड़े दुर्लभ सत्य वृत्तान्त को पुनः प्रकाशित करने की अनुमति मिली है !

ऋषि सत्ता के बारम्बार हमारे समूह के प्रति दृष्टिगोचर होने वाली ममतामयी कृपादृष्टि को देखकर हमारे उत्साह में जबरदस्त वृद्धि हुई है, जिससे हमें एक बेहद सुखद आशा जगी है कि भविष्य में भी हमें, और भी ऋषि सत्ता के दुर्लभ वृत्तान्तों को प्रकाशित करने का सुअवसर जरूर प्राप्त होगा, इसलिए अब हम इन वृतांतों की एक पूरी श्रृंखला शुरू कर रहें हैं ताकि “स्वयं बनें गोपाल” से जुड़े ऐसे कई सत्यान्वेषी पाठकों की नियमित तौर पर आत्मतृप्ति होती रहे जो ऐसे लेखों को अपने गुरु वचन के तौर पर शिरोधार्य कर, अपने जीवन को भी उसी दिशोंन्मुख करने का सतत प्रयास करतें हैं !

इस लेख का प्रथम भाग पढ़ने के लिए कृपया इस लेख के नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें और पिछले आर्टिकल के पब्लिश होने के बाद कुछ पाठकों ने हमसे प्रश्न किया था कि ऋषि सत्ता वृद्ध होतें हैं या युवा ?

तो इसके उत्तर में हम यह कहना चाहेंगे कि ऋषि सत्ता सदैव शाश्वत युवा शरीर धारण करतें हैं अर्थात हमेशा एक 16 वर्ष के दिव्य तरुण के समान तेजस्वी बने रहतें हैं क्योंकि वे जब तक साकार रूप में रहतें हैं, तब तक ईश्वर के ही समान, उन पर काल असर नहीं डाल पाता है, पर चूंकि सामान्य मानवीय बुद्धि किसी वयोवृद्ध को ही गुरु रूप में ज्यादा अच्छे से स्वीकार्य कर पाती है अतः अक्सर धार्मिक ग्रंथो के प्रकाशक ऋषि सत्ता का रूपांकन अपनी कल्पना के आधार पर एक वृद्ध के रूप में कर देते हैं !

इसके अलावा ऋषि सत्ता किसी अनुयायी को किस रूप में दिखेंगे यह बहुत कुछ उस अनुयायी की श्रद्धा रुपी भावना पर भी निर्भर करता है, जैसे श्री कृष्ण को कोई बाल रूप में भजता है तो कोई गोपी भाव से प्रियतम के रूप में तो कोई पिता के रूप में तो कोई गुरु के रूप में, अर्थात यह लोकोक्ति एकदम सही है कि, जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी !

उम्मीद है पाठकों की इस शंका का समाधान हो गया होगा | आईये अब सुनतें हैं परम आदरणीय ऋषि सत्ता का दुर्लभ सत्य वृत्तांत, उन्ही की वाणी में ]-

भू-लोक (पृथ्वी) से अन्यान्य उच्च लोकों में जाते समय अंतरिक्ष लोक पड़ता है ! इसी अन्तरिक्ष लोक में एक दिव्य नगरी है “चाक्षुषमति” | चाक्षुषमति की विशेषता ये है कि ये ब्रह्माण्ड में ऐसे कोण पर स्थित है कि यहाँ से (ध्यानावस्था में) ब्रह्माण्ड के तीनों लोकों को सहज ही देखा जा सकता है !

एक बार चाक्षुषमति से गुजरते हुए, मुझे उस नगर में एक साधारण स्त्री एक वस्त्र का प्रक्षालन करती हुई दिखाई दी | उस सामान्य से दृश्य में भी मुझे ‘कुछ’ असाधारण प्रतीत हुआ !

मै कौतूहल वश उन देवी के पास गया और उनसे पूछा कि “आप किसका वस्त्र धो रही हैं ?”

उन्होंने अत्यंत सहज तरीके से उत्तर दिया “अपने पति का” !

मैंने फिर प्रश्न किया “आपके पति कहाँ हैं ?” इसके उत्तर में उन्होंने अपने दाहिने हाँथ से दाएँ तरफ इशारा किया !

मैंने उधर देखा, तो मुझे थोड़ी दूरी पर एक भवन और एक विशाल आकार की मूर्ती दिखाई दी !

मैंने दोबारा उनसे पूछा तो उन्होंने पूर्ववत, वैसे ही इशारा किया !

अब मै उस घर और मूर्ती की तरफ बढ़ चला | निकट जाने पर पता चला कि वो मूर्ती, स्वयं महादेव की एक विशालकाय मूर्ती थी जो पार्वतीआसन में समाधिस्थ थी !

मै थोड़ी देर तक उस मूर्ती को निहारता रहा | तत्पश्चात मै स्वयं उस मूर्ती में प्रवेश कर गया | उस मूर्ती के अन्दर प्रविष्ट होते ही मैंने उसी आसन में समाधि लगाईं, जिसमे की वो मूर्ती समाधिस्थ थी !

समाधि लगाते ही मुझे अपने चारो तरफ समूचा ब्रह्माण्ड घूमता हुआ दिखाई पड़ा | उस समय मै ही ब्रह्माण्ड की धुरी था, जिसके चारो तरफ पूरा ब्रह्माण्ड घूम रहा था !

मैंने उस समय हर तरफ सिर्फ “मैं” को देखा, कभी एक जलचर के रूप में तो कभी नभचर के रूप में और कहीं मनुष्य, देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि के रूप में | उस समय में वास्तव में, मैं ही दुनिया भर के सभी सुखों और दुखों को भोग रहा था | “मैं” यानी ब्रह्म !

मुझे भान हुआ कि वास्तव में जो स्त्री उस वस्त्र को धो रही थी वह शुद्ध माया थी | सृष्टि निर्माण के समय से ही ब्रह्म, वस्त्र (आवरण) के रूप में अशुद्ध माया या ‘अविद्या’ को धारण करता है और ब्रह्म से ‘जीव’ बन जाता जाता है | ब्रह्माण्ड के जीवन काल तक ब्रह्म ही जीव के रूप में समस्त सुखों और दुखों को भोगता है और उसकी प्रेयसी महामाया (शुद्ध माया), निरंतर उसके अविद्या रुपी वस्त्रों का प्रक्षालन करती रहती है !

अंत काल में जब ब्रह्म के स्वच्छ एवं शुद्ध वस्त्र (आवरण) पर अविद्या का लेश मात्र भी अंश शेष नहीं रह जाता तो वह अपनी प्रेयसी अर्थात शुद्ध माया को धारण करता है और चिदानंद कहलाता है !

मूर्ती से बाहर निकल कर मैंने उन देवी को प्रणाम किया और उन्हें धन्यवाद दिया | उन्होंने बताया की जीव के रूप में ब्रह्म जितने रूप ग्रहण करता है, माया भी उतने ही रूप ग्रहण करती है कभी अशुद्ध तो कभी शुद्ध माया के रूप में | शुद्ध माया द्वारा अशुद्ध माया रुपी वस्त्रो का प्रक्षालन ही समस्त ब्रह्मांडों का कार्य-व्यापार है !

इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि जीव चाहे मानव हो या चीटी, सर्प हो या सूअर, सभी ईश्वर के ही व्यक्त रूप हैं इसलिए जब तक किसी भी जीव से अमर्यादित आचरण ना हो, तब तक उसे कष्ट देना मतलब साक्षात् ईश्वर को ही कष्ट देना है और साथ ही साथ यह भी निष्कर्ष सत्यान्वित होता है कि किसी भी जरूरतमंद की निःस्वार्थ सेवा करना मतलब साक्षात् ईश्वर की ही सेवा करने के समान महान पुण्यदायक है !

(ऋषि सत्ता से सम्बंधित अन्य आर्टिकल्स तथा अन्य महत्वपूर्ण हिंदी आर्टिकल्स एवं उन आर्टिकल्स के इंग्लिश अनुवाद को पढ़ने के लिए, कृपया नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें)-

ऋषि सत्ता की आत्मकथा (भाग – 1): पृथ्वी से गोलोक, गोलोक से पुनः पृथ्वी की परम आश्चर्यजनक महायात्रा

ऋषि सत्ता की आत्मकथा (भाग – 3): सज्जन व्यक्ति तो माफ़ कर देंगे किन्तु ईश्वर कदापि नहीं

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ऋषि सत्ता की आत्मकथा (भाग 5): अदम्य प्रेम व प्रचंड कर्मयोग के आगे मृत्यु भी बेबस है

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Is it possible to interact with aliens?

Are American Scientists telling the complete truth about Bermuda Triangle ?

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Our research group finds U.F.O. and Aliens’ footprints

How aliens move and how they disappear all of sudden

Who are real aliens and what their specialties are

Why satellites can not see some meteorites before they fall down

(आवश्यक सूचना- विश्व के 169 देशों में स्थित “स्वयं बनें गोपाल” समूह के सभी आदरणीय पाठकों से हमारा अति विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि आपके द्वारा पूछे गए योग, आध्यात्म से सम्बन्धित किसी भी लिखित प्रश्न (ईमेल) का उत्तर प्रदान करने के लिए, कृपया हमे कम से कम 6 घंटे से लेकर अधिकतम 72 घंटे (3 दिन) तक का समय प्रदान किया करें क्योंकि कई बार एक साथ इतने ज्यादा प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हो जातें हैं कि सभी प्रश्नों का उत्तर तुरंत दे पाना संभव नहीं हो पाता है ! वास्तव में “स्वयं बनें गोपाल” समूह अपने से पूछे जाने वाले हर छोटे से छोटे प्रश्न को भी बेहद गंभीरता से लेता है इसलिए हर प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर प्रदान करने के लिए, हम सर्वोत्तम किस्म के विशेषज्ञों की सलाह लेतें हैं, इसलिए हमें आपको उत्तर देने में कभी कभी थोड़ा विलम्ब हो सकता है, जिसके लिए हमें हार्दिक खेद है ! कृपया नीचे दिए विकल्पों से जुड़कर अपने पूरे जीवन के साथ साथ पूरे समाज का भी करें निश्चित महान कायाकल्प)-

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