स्वयं बने गोपाल

उपन्यास – कर्मभूमि – 5-1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

यह हमारा लखनऊ का सेंटल जेल शहर से बाहर खुली हुई जगह में है। सुखदा उसी जेल के जनाने वार्ड में एक वृक्ष के नीचे खड़ी बादलों की घुड़दौड़ देख रही है। बरसात बीत...

उपन्यास – कर्मभूमि – 5-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘यह क्यों नहीं कहते तुममें गैरत नहीं है?’ ‘आप तो मुसलमान हैं। क्या आपका फर्ज नहीं है कि बादशाह की मदद करें?’   ‘अगर मुसलमान होने का यह मतलब है कि गरीबों का खून...

उपन्यास – गबन -1-1- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

बरसात के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई हैं । रह – रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है । अभी तीसरा पहर है ; पर ऐसा मालूम हों...

उपन्यास – गबन -1-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिमट गई। रमा ने पूछा–क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं?   जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा–कुछ नहीं, एक स्वप्न देख रही...

उपन्यास – गबन – 2 -1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

ग्यारह महाशय दयानाथ को जब रमा के नौकर हो जाने का हाल मालूम हुआ, तो बहुत खुश हुए। विवाह होते ही वह इतनी जल्द चेतेगा इसकी उन्हें आशा न थी। बोले–‘जगह तो अच्छी है।...

उपन्यास – गबन – 2 -2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमेश ने मुस्कराकर कहा, ‘अच्छा, यह किस्सा तो हो चुका, अब यह बताओ, उसने तुम्हें रूपये किसलिए दिए! मैं गिन रहा था, छः नोट थे, शायद सौ-सौ के थे।’ रमानाथ-‘ठग लाया हूं।’   रमेश-‘मुझसे...

उपन्यास – गबन – 3 -1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

इक्कीस   अगर इस समय किसी को संसार में सबसे दुखी, जीवन से निराश, चिंताग्नि में जलते हुए प्राणी की मूर्ति देखनी हो, तो उस युवक को देखे, जो साइकिल पर बैठा हुआ, अल्प्रेड...

उपन्यास – गबन – 3 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

अट्ठाईस जब से रमा चला गया था, रतन को जालपा के विषय में बडी चिंता हो गई थी। वह किसी बहाने से उसकी मदद करते रहना चाहती थी। इसके साथ ही यह भी चाहती...

उपन्यास – गबन – 4 – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

उसी दिन शव काशी लाया गया। यहीं उसकी दाह-क्रिया हुई। वकील साहब के एक भतीजे मालवे में रहते थे। उन्हें तार देकर बुला लिया गया। दाह-क्रिया उन्होंने की। रतन को चिता के दृश्य की...

उपन्यास – गबन – 4 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पैंतीस रूदन में कितना उल्लास, कितनी शांति, कितना बल है। जो कभी एकांत में बैठकर, किसी की स्मृति में, किसी के वियोग में, सिसक-सिसक और बिलखबिलख नहीं रोया, वह जीवन के ऐसे सुख से...

उपन्यास – गबन – 5 – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

इकतालीस रतन पत्रों में जालपा को तो ढाढ़स देती रहती थी पर अपने विषय में कुछ न लिखती थी। जो आप ही व्यथित हो रही हो, उसे अपनी व्यथाओं की कथा क्या सुनाती! वही...

उपन्यास – गबन – 5 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

अड़तालीस सारे दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधाकारमय घाटियां सामने आ जातीं, कभी आशा की लहराती हुई हरियाली । ज़ोहरा गई भी होगी ? यहां से तो बडे।...

उपन्यास – गोदान – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी दे कर अपनी स्त्री धनिया से कहा – गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूँ। जरा मेरी लाठी दे दे। धनिया के दोनों हाथ...

उपन्यास – गोदान – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रांत के गाँव हैं। जिले का नाम बताने की कोई जरूरत नहीं। होरी बेलारी में रहता है, रायसाहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल पाँच मील का अंतर...

उपन्यास – गोदान – 3 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

होरी अपने गाँव के समीप पहुँचा, तो देखा, अभी तक गोबर खेत में ऊख गोड़ रहा है और दोनों लड़कियाँ भी उसके साथ काम कर रही हैं। लू चल रहीं थी, बगुले उठ रहे...

उपन्यास – गोदान – 4 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

होरी को रात-भर नींद नहीं आई। नीम के पेड़-तले अपने बाँस की खाट पर पड़ा बार-बार तारों की ओर देखता था। गाय के लिए नाँद गाड़नी है। बैलों से अलग उसकी नाँद रहे तो...