एक माँ – पुत्र के विछोह की असीम पीड़ायुक्त संवाद

{नोट- पहली कविता “स्वयं बनें गोपाल” समूह से जुड़े हुए एक आदरणीय स्वयं सेवक द्वारा रचित है पर उन्होंने हमसे अपने नाम को प्रकाशित ना करने का अनुरोध किया है इसलिए हम उनकी कविता को “श्री अनाम” द्वारा लिखित नाम से प्रस्तुत कर रहें हैं !

पहली कविता के अंत में प्रकाशित दूसरी कविता श्री देवयानी जी की है जिनकी हम पहले भी कुछ कविताओं को प्रकाशित कर चुके हैं (उन कविताओं के लिंक्स नीचे दिए गएँ हैं) ! श्री अनाम जी की ही तरह श्री देवयानी जी भी “स्वयं बनें गोपाल” समूह के द्वारा दिया गया एक काल्पनिक नाम है क्योंकि श्री देवयानी जी ने भी हमसे निवेदन किया है उनकी कविताओं को उनके नाम के साथ प्रकाशित ना किया जाए}

(प्रथम कविता)- मम्मी, जब मै आया था, आपकी गोद में-

mamma mom momma mother mum mummy male female parents MA Mama ma mama boy son sonny pa papa pop dad daddy father family love affection care household kin name establishment coupleसौ दुःख मुझे खुद में रख के सहने के बाद

मुझे देख आप मुस्कुराई थी

मम्मी, जब मै आया था, आपकी गोद में

सारे काम ख़त्म करती, मुझको रोते उठाने को

आपको छोटी आँखों से देख के, सारी खुशिया मिल जाती

था यही आने को रो रहा

मै लेटा, बैठा, खड़ा हुआ, फिर धीरे धीरे चलने लगा

फिर वापस जल्दी से आके उसी गोंद में हसने को

जैसी किलकारी तब थी शायद, आपकी गोंद में आके

नहीं मिलनी वो खुशियों की चरम सीमा

तब आप फिर मुस्कुराई थी, मम्मी जब मै आया था, आपकी गोंद में

बड़ा हुआ, जब पहली बार स्कूल बैग टंगवाई थी

आपने मेरे कंधे पे

और छोड़ आई थी खुद से दूर कुछ 7 – 8 घंटों के लिए

तब रोयी थी आप, पर जब शाम को, बेटा आपका आ पंहुचा

तब आप फिर मुस्कुराई थी, मम्मी जब मै आया था

जीवन को पार लगना था, बढ़ने थे उम्र के साल

बचपन के दिन फिरने थे, आने थे यौवन के काल

होना था काल को क्रूर, होना था जिम्मेदारियों का एहसास

काल चक्र के क्रूर पाश को, ले जाना था आपसे दूर

जब जाता था आपसे दूर, पहली बार, क़दमों के डगमगाने को

जब आकर परदेश पहली बार, सिर छुपा कर रोया था सबके बीच

आप भी बहुत रोयी थी, जब चला गया था, आपकी गोंद से दूर

तब नहीं पता था फिर कभी नहीं आ पाउँगा

बहुत कुछ सपने मन में सजा के

दुनिया से नहीं बता के, आपके लिए बनाये थे

सोचा था ये सब सजा के आपको अपने हाथो से चढाऊंगा

कुछ भी कर पाया या कर पाउँगा, नहीं पता

पर पता चला अब वही सपने नहीं जाने देते आपके पास

मन की हेठी, मन का नैराश्य, मन का हठ उनको पाने का

उन सबको आपके लिए कर पाने का

इन सब में ही खो बैठा आपके पैरों का वो स्नेहिल सानिध्य

तब नहीं पता था, अब कभी नहीं आ पाउँगा

मन में है फिर आस, जब फिर से आके आपके पास

और शायद आप फिर मुस्कुरायेंगी, जब मै आऊंगा, आपकी…

द्वारा
“श्री अनाम”

(द्वितीय कविता)- ना जाने मैं कितनी बार गौरवान्वित हुई-

mamma mom momma mother mum mummy male female parents MA Mama ma mama boy son sonny pa papa pop dad daddy father family love affection care household kin name establishment coupleबेटा जब से ईश्वर ने अनमोल तोहफे के रूप में

तुम्हे मेरी गोद में डाला है

तब से खुशियों से सराबोर होती हुई

ना जाने मैं कितनी बार गौरवान्वित हुई

तुम्हारे अधरों की निश्छल मुस्कान ने

तुम्हारी नन्ही भोली आँखों से बरसते स्नेह रस ने

ना जाने कितनी बार मेरे दुःख अवसाद थकान

की पीड़ा को दूर कर मुझे हर्षित किया

धीरे धीरे तुम्हारे नन्हे कदम बड़े होते गये

और जिम्मेदारियों के एहसास तले

तुम मुझसे दूर होते गए

कभी पढ़ाई के लिए तो

कभी नौकरी के लिए

और मै खून के आंसू बहाते हुए

इस आस में जीती रही

कि अब मेरा बेटा मेरे पास आ जाएगा

हमेशा हमेशा के लिए

लेकिन तुम्हारी महत्वकांक्षाओं के सपने

आज भी तुम्हे मुझसे दूर ही किये हुए हैं

बेटा जब मै क्रूर काल के दिए हुए दंश

से बिंध कर टूट टूटकर बिखरती रही

उस समय मेरे “वो अपने”

जो मेरे बहुत करीब थे

मुझे छोड़ कर इसलिए दूर हो गए

कि कहीं इस गिरती हुई दीवार

का सहारा उन्हें ही ना बनना पड़े

तब तुमने ही अपने स्नेह

और सुरक्षा के घेरे में लेकर

मेरे अस्तित्व को शून्य में

विलीन होने से बचाया है

तुम्हारी पलकों पर सजे हुए

हर सपनों के सर्वोच्च आसन पर

मैं स्वयं को ही सदा देखकर

हर क्षण तृप्त होती रही

लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर

मैं अपने आँचल की छाँव में

तुम्हारे साथ चन्द लम्हें सुकून

के साथ गुजारना चाहती हूँ

क्योंकि ना जाने कब

निष्ठुर काल मेरे आँचल की छाँव को

mamma mom momma mother mum mummy male female parents MA Mama ma mama boy son sonny pa papa pop dad daddy father family love affection care household kin name establishment coupleतुमसे दूर आकाश के उस छोर पर

फेंक देगा जहाँ से लाख ढूँढने पर भी

तुम मुझे नहीं पाओगे !

द्वारा
“श्री देवयानी”

(श्री देवयानी की अन्य रचनाओं को पढने के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें)-

सिर्फ अपनी ख़ुशी की तलाश बर्बाद कर रही है अपने अंश की ख़ुशी

वो अनजाना कर्ज

माँ

सर्वे से पता चली ऐसी सीधी वजह, जिसे मानते बहुत लोग हैं, पर स्वीकारते कम लोग हैं

(आवश्यक सूचना – “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान की इस वेबसाइट में प्रकाशित सभी जानकारियों का उद्देश्य, सत्य व लुप्त होते हुए ज्ञान के विभिन्न पहलुओं का जनकल्याण हेतु अधिक से अधिक आम जनमानस में प्रचार व प्रसार करना मात्र है ! अतः “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान अपने सभी पाठकों से निवेदन करता है कि इस वेबसाइट में प्रकाशित किसी भी यौगिक, आयुर्वेदिक, एक्यूप्रेशर तथा अन्य किसी भी प्रकार के उपायों व जानकारियों को किसी भी प्रकार से प्रयोग में लाने से पहले किसी योग्य चिकित्सक, योगाचार्य, एक्यूप्रेशर एक्सपर्ट तथा अन्य सम्बन्धित विषयों के एक्सपर्ट्स से परामर्श अवश्य ले लें क्योंकि हर मानव की शारीरिक सरंचना व परिस्थितियां अलग - अलग हो सकतीं हैं)



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