Category: महान लेखकों की सामाजिक प्रेरणास्पद कहानियां, कवितायें और साहित्य का अध्ययन, प्रचार व प्रसार कर वापस दिलाइये मातृ भूमि भारतवर्ष की आदरणीय राष्ट्र भाषा हिन्दी के खोये हुए सम्मान को

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – कल्पलता – (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

विभुता-विभूति प्रेम-प्रलाप भरे हैं उसमें जितने भाव, मलिन हैं, या वे हैं अभिराम, फूल-सम हैं या कुलिश-समान, बताऊँ क्या मैं तुझको श्याम! हृदय मेरा है तेरा धााम। गए तुम मुझको कैसे भूल, किसलिए लूँ...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पवित्रा पर्व – (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पर्व और उत्सव मनुष्य का कार्य क्षेत्रा बड़ा विस्तृत है और उसमें उसकी तन्मयता अद््््भुत है। कारण यह है कि सांसारिकता का बन्धान ऐसा है कि वह मनुष्य को अधिाकतर कार्यरत रखता है, क्योंकि...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – भूमिका – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

कुछ समय से विचारशील जनों के मन में यह बात आने लगी है कि देश में एक भाषा और एक लिपि होने की बड़ी जरूरत है, और हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि ही इस...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – पूर्ववर्ती काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

विषयारंभ हिंदी भाषा की उत्‍पत्ति का पता लगाने, और उसका थोड़ा भी इतिहास लिखने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं। क्‍योंकि इसके लिए पतेवार सामग्री कहीं नहीं मिलती। अधिकतर अनुमान ही के आधार पर इमारत खड़ी...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – प्राकृत-काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

आर्य लोगों की सबसे पुरानी भाषा के नमूने ऋग्‍वेद में हैं ऋग्‍वेद के मंत्रों का अधिकांश आर्यों ने अपनी रोजमर्रा की बोल-चाल की भाषा में निर्माण किया था। इसमें कोई संदेह नहीं। रामायण, महाभारत...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – अपभ्रंश-काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – आधुनिक काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

परिमार्जित संस्‍कृत जैसा कि लिखा जा चुका है कि प्रारंभिक, किंवा पहली, प्राकृत से संबंध रखने वाली कई एक भाषाएँ या बोलियाँ थीं। उनका धीरे-धीरे विकास होता गया। भारत की वर्तमान भाषाएँ उसी विकास...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – उपसंहार – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

आज तक‍ कुछ लोगों का ख्‍याल था कि हिंदी की जननी संस्‍कृत है। यह बात भारत की भाषाओं की खोज से गलत साबित हो गई। जो उद्गम-स्‍थान परिमार्जित संस्‍कृत का है, हिंदी जिन भाषाओं...

निबंध – अशोक के फूल – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

अशोक में फिर फूल आ गए है। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्‍पों के मनोहर स्‍तबकों में कैसा मोहन भाव है। बहुत सोच समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्‍पों को छोड़कर सिर्फ पाँच को ही...

निबंध – आपने मेरी रचना पढ़ी ? – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

हमारे साहित्यिकों की भारी विशेषता यह है कि जिसे देखो वहीं गम्भीर बना है, गम्भीर तत्ववाद पर बहस कर रहा है और जो कुछ भी वह लिखता है, उसके विषय में निश्चित धारणा बनाये...

निबंध – आम फिर बौरा गए – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

वसंतपंचमी में अभी देर है, पर आम अभी से बौरा गए। हर साल ही मेरी आँखें इन्‍हें खोजती हैं। बचपन में सुना था कि वसंतपंचमी के पहले अगर आम्रमंजरी दिख जाय तो उसे हथेली...

निबंध – देवदारु – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

पता नहीं किसने इस पेड़ का नाम देवदारु रख दिया था, नाम निश्चय ही पुराना है, कालिदास से भी पुराना, महाभारत से भी पुराना। सीधे ऊपर की ओर उठता है, इतना ऊपर कि पासवाली...

निबंध – भीष्म को क्षमा नहीं किया गया – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

मेरे एक मित्र हैं, बड़े विद्वान, स्‍पष्‍टवादी और नीतिमान। वह इस राज्‍य के बहुत प्रतिष्ठित नागरिक हैं। उनसे मिलने से सदा नई स्‍फूर्ति मिलती है। यद्यपि वह अवस्‍था में मुझसे छोटे हैं, तथापि मुझे...

निबंध – शिरीष के फूल – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

जहाँ बैठके यह लेख लिख रहा हूँ उसके आगे पीछे, दाएँ-बाएँ, शिरीष के अनेक पेड़ हैं। जेठ की जलती धूप में, जबकि धरित्री निधूर्म अग्निकुंड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों...

लेख – नाखून क्यों बढ़ते हैं ? – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। अल्पज्ञ पिता बड़ा दयनीय जीव होता है। मेरी लड़की ने उस दिन पूछ लिया कि नाखून क्यों बढते हैं, तो मैं कुछ सोच...

लेख – धर्म और पाप – (लेखक – आचार्य चतुरसेन शास्त्री)

भारत धर्म-प्रधान देश है और मनुष्य पाप का चोर है, इसलिए धर्म और पाप की बिना सहायता लिए मैं मानने वाला आदमी नहीं हूँ। मैं अपनी अंतरात्मा में भली भाँति जानता हूँ कि पाप...