Category: महान लेखकों की सामाजिक प्रेरणास्पद कहानियां, कवितायें और साहित्य का अध्ययन, प्रचार व प्रसार कर वापस दिलाइये मातृ भूमि भारतवर्ष की आदरणीय राष्ट्र भाषा हिन्दी के खोये हुए सम्मान को

नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 8 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

सप्तमांक ( स्थान-देवी के मन्दिर का निकटवर्ती उद्यान) ( महारानी रुक्मिणी अपनी अनामा और अनाभिधाना प्रभृति सखियों के साथ राक्षसों की कोट में मत्तगजगति से मन्द-मन्द जा रही हैं ) अनामा- सखी अनाभिधाने! देख!...

नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 9 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अष्टमांक ( स्थान-जनवासे का बाहरी प्रान्त) ( बहुत से सूरमे खड़े और शिशुपाल , शाल्व , दन्तवक्र , जरासन्ध इत्यादि बहुत से वीर बैठे हैं) (एक दूत का प्रवेश) दू.- (हाथ जोड़कर काँपते हुए)...

नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 10 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

नवमांक ( स्थान-रणभूमि का बहि:प्रान्त) ( भगवान श्रीकृष्ण , सारथी एवं महारानी रुक्मिणी सहित एक रथ विराजमान) श्रीकृ.- (नेपथ्य की ओर देखकर) सारथी! देखो, पद्म व्यूह रचकर खड़ी यादवों की सेना को बली शाल्वादि...

नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 11 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दशमांक श्रीरुक्मिणीपरिणयनाटक का एक अतिरिक्त अंक (स्थान-शय्याभवन) (भगवान श्रीकृष्ण एक सुकोमल तल्प पर बिराजमान, व्यजनहस्ता रुक्मिणी समीप दण्डायमान) (सुलोचना व सुनैना दो परिचारिकाओं का प्रवेश) सुलो.- सखी सुनयने! आज कैसा आनन्द का दिन है,...

पत्र – पगली का पत्र (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तुम कहोगे कि छि:, इतनी स्वार्थ-परायणता! पर प्यारे, यह स्वार्थ-परायणता नहीं है, यह सच्चे हृदय का उद्गार है, फफोलों से भरे हृदय का आश्वासन है, व्यथित हृदय की शान्ति है, आकुलता भरे प्राणों का...

आत्मकथा – रोग का रंग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बाबू बंकिमचन्द्र चटर्जी बंगाल के एक बड़े प्रसिद्ध उपन्यास लेखक हैं। उन्होंने बंगला में ‘विष वृक्ष’ नाम का एक बड़ा ही अनूठा उपन्यास लिखा है। उसमें कालिदास की एक बड़ी मनोमोहक कहानी है-आप लोग...

आत्मकथा – रोग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

हम कौन हैं, आप यह जानकर क्या करेंगे। फिर हम आप से छिप कब सकते हैं, आपकी हमारी जान-पहचान बहुत दिनों की है। हमने कई बार आप से मीठी-मीठी बातें की हैं, आपका जी...

आत्मकथा – जी का लोभ (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जिन दिनों माघ के महीने में मेरा स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था, उन्हीं दिनों की बात है, कि एक दिन दो घड़ी रात रहे मेरी नींद अचानक टूट गयी। इस घड़ी रोग का पारा...

आत्मकथा – घबराहट (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जब किसी बीमार के जी में यह बात बैठ जाती है कि अब बचना कठिन है, तो उसमें घबराहट का पैदा हो जाना कुछ आश्चर्य नहीं। अपने दुख को देखकर मैं भी बहुत घबराया,...

आत्मकथा – झाड़फूँक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आजकल एक विचार फैला हुआ है-जो बात चटपट समझ में न आ जावे, या दलीलों से जो पूरी तौर पर साबित न की जा सके, या जिसका प्रभाव ठीक-ठीक हम न जान सकें, वह...

आत्मकथा – पूजा-पाठ (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पूजा-पाठ आजकल का एक ढंग यह भी है कि पहले तो हमारे मन की जितनी बातें नहीं हैं, उनको हम मानना नहीं चाहते, और यदि किसी कारण से हमको उन्हें मानना पड़ता है, तो...

आत्मकथा – तन्त्र यन्त्र (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तन्त्र यन्त्र मैं समझता हँ इस ग्रन्थ के पढ़नेवालों में कितने लोग ऐसे होंगे, जो तन्त्र का नाम पढ़ते ही मुँह बना लेंगे और ग्रन्थ को अपने हाथ से दूर फेंक दें, तो भी...

आत्मकथा – दान पुण्य (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दान पुण्य मेरा विचार है कि ”न देने से देना अच्छा है”। कोई आकर हम से कुछ माँगता है, तो हम उसको क्या देते हैं। एक दो पैसे। जो हमारे लिए कुछ नहीं है,...

आत्मकथा – मृत्यु क्या है (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु क्या है जब किसी की बीमारी बढ़ जाती है, और वह समझ लेता है कि अब बचने की आशा नहीं, तो सब ओर से हटकर उसका जी यह सोचने लगता है कि मृत्यु...

आत्मकथा – मृत्यु का भय (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का भय मृत्यु क्या है? यह आप लोगों ने समझ लिया। जैसा हमें बतलाया गया है, उससे पाया जाता है कि मृत्यु कोई ऐसी वस्तु नहीं है, कि जिससे कोई डरे। यह सच...

आत्मकथा – मृत्यु का प्रभाव (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का प्रभाव संसार में आज जो अमन दिखलाई पड़ रहा है, धुली हुई चाँदनी सी शान्ति जो चारों ओर छिटकी हुई है। जब आप यह जानेंगे कि इसमें सबसे अधिक श्रेय मृत्यु का...