Category: महान लेखकों की सामाजिक प्रेरणास्पद कहानियां, कवितायें और साहित्य का अध्ययन, प्रचार व प्रसार कर वापस दिलाइये मातृ भूमि भारतवर्ष की आदरणीय राष्ट्र भाषा हिन्दी के खोये हुए सम्मान को

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 23 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

एक चूकता है-एक की बन आती है। एक मरता है-एक के भाग्य जागते हैं। एक गिरता है-एक उठता है। एक बिगड़ता है-एक बनता है। एक ओर सूरज तेज को खोकर पश्चिम ओर डूबता है-दूसरी...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 24 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज तक मरकर कोई नहीं लौटा, पर जिसको हम मरा समझते हैं, उसका जीते जागते रहकर फिर मिल जाना कोई नई बात नहीं है। ऐसे अवसर पर जो आनन्द होता है-वह उस आनन्द से...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 25 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बासमती के मारे जाने पर दो चार दिन गाँव में बड़ी हलचल रही, थाने के लोगों ने आकर कितनों को पकड़ा, मारनेवाले को ढूँढ़ निकालने के लिए कोई बात उठा न रखी, पर बासमती...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 26 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज दस बरस पीछे हम फिर बंसनगर में चलते हैं। पौ फट रहा है, दिशाएँ उजली हो रही हैं, और आकाश के तारे एक-एक कर के डूब रहे हैं। सूरज अभी नहीं निकला है,...

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 1 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बटोही ने जो कुछ आँखों देखा, कानों सुना, वह सब बातें उसको चकरा रही थीं, दुखी बना रही थीं, और सता रही थीं, पर इस घड़ी वह बहुत ही अनमना हो रहा था, वह...

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 2 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पहला ठाट ललकि ललकि लोयनन तेहि, लखि लखि होहु निहाल। लाली इत उत की लहत, लहे जीव जेहि लाल। एक ग्यारह बरस की लड़की अपने घर के पास की फुलवारी में खड़ी हुई किसी...

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 3 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आठवाँ ठाट बटोही ने जो कुछ आँखों देखा, कानों सुना, वह सब बातें उसको चकरा रही थीं, दुखी बना रही थीं, और सता रही थीं, पर इस घड़ी वह बहुत ही अनमना हो रहा...

कविताएँ – कविता संग्रह (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

फूल और काँटा फूल और काँटा हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता । मेह...

लेख – करुणरस (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

करुणरस द्रवीभूत हृदय का वह सरस-प्रवाह है, जिससे सहृदयता क्यारी सिंचित, मानवता फुलवारी विकसित और लोकहित का हरा-भरा उद्यान सुसज्जित होता है। उसमें दयालुता प्रतिफलित दृष्टिगत होती है, और भावुकता-विभूति-भरित। इसीलिए भावुक-प्रवर-भवभूति की भावमयी...

कविता – वैदेही-वनवास – उपवन रोला (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

लोक-रंजिनी उषा-सुन्दरी रंजन-रत थी। नभ-तल था अनुराग-रँगा आभा-निर्गत थी॥ धीरे-धीरे तिरोभूत तामस होता था। ज्योति-बीज प्राची-प्रदेश में दिव बोता था॥1॥ किरणों का आगमन देख ऊषा मुसकाई। मिले साटिका-लैस-टँकी लसिता बन पाई॥ अरुण-अंक से छटा...

कविता – वैदेही-वनवास – चिन्तित चित्त चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध के राज मन्दिरों मध्य। एक आलय था बहु-छबि-धाम॥ खिंचे थे जिसमें ऐसे चित्र। जो कहाते थे लोक-ललाम॥1॥ दिव्य-तम कारु-कार्य अवलोक। अलौकिक होता था आनन्द॥ रत्नमय पच्चीकारी देख। दिव विभा पड़ जाती थी मन्द॥2॥...

कविता – वैदेही-वनवास – मन्त्रणा गृह चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मन्त्रणा गृह में प्रात:काल। भरत लक्ष्मण रिपुसूदन संग॥ राम बैठे थे चिन्ता-मग्न। छिड़ा था जनकात्मजा प्रसंग॥1॥ कथन दुर्मुख का आद्योपान्त। राम ने सुना, कही यह बात॥ अमूलक जन-रव होवे किन्तु। कीर्ति पर करता है...

कविता – वैदेही-वनवास – वसिष्ठाश्रम तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवधपुरी के निकट मनोरम-भूमि में। एक दिव्य-तम-आश्रम था शुचिता-सदन॥ बड़ी अलौकिक-शान्ति वहाँ थी राजती। दिखलाता था विपुल-विकच भव का वदन॥1॥ प्रकृति वहाँ थी रुचिर दिखाती सर्वदा। शीतल-मंद-समीर सतत हो सौरभित॥ बहता था बहु-ललित दिशाओं...

कविता – वैदेही-वनवास – सती सीता ताटंक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रकृति-सुन्दरी विहँस रही थी चन्द्रानन था दमक रहा। परम-दिव्य बन कान्त-अंक में तारक-चय था चमक रहा॥ पहन श्वेत-साटिका सिता की वह लसिता दिखलाती थी। ले ले सुधा-सुधा-कर-कर से वसुधा पर बरसाती थी॥1॥ नील-नभो मण्डल...

कविता – वैदेही-वनवास – कातरोक्ति पादाकुलक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रवहमान प्रात:-समीर था। उसकी गति में थी मंथरता॥ रजनी-मणिमाला थी टूटी। पर प्राची थी प्रभा-विरहिता॥1॥ छोटे-छोटे घन के टुकड़े। घूम रहे थे नभ-मण्डल में॥ मलिना-छाया पतित हुई थी। प्राय: जल के अन्तस्तल में॥2॥ कुछ...

कविता – वैदेही-वनवास – मंगल यात्रा मत्तसमक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध पुरी आज सज्जिता है। बनी हुई दिव्य-सुन्दरी है॥ विहँस रही है विकास पाकर। अटा अटा में छटा भरी है॥1॥ दमक रहा है नगर, नागरिक। प्रवाह में मोद के बहे हैं॥ गली-गली है गयी...