लकवा का परम लाभकारी इलाज योग व प्राणायाम से

palsy paralysis benumb paralyse paralyze lakawa lakava nervous system spinalcord stroke nerve injury cerebral palsy disease yoga asana yogasana pranayama ayurveda neuropathy parkinsonsवास्तव में लकवा प्रकृति के द्वारा बनाई गयी क्रूरतम बीमारियों में से एक है क्योंकि अगर लकवे का असर शरीर पर ज्यादा हो तो आदमी अपने निजी कार्य जैसे खाना, पीना, कपड़े पहनना, नहाना, मल मूत्र का त्याग करना आदि के लिए भी हर समय किसी ना किसी की दया पर ही निर्भर रहता है !

लकवे का आज के मॉडर्न साइंस में कोई भी निश्चित इलाज नहीं है इसलिए अक्सर देखा गया है कि जिन्हें लकवा मारता है उन्हें एलोपैथी (अंग्रेजी दवाओं) से इलाज करवाने पर कोई ख़ास लाभ तो मिलता नही है अलबत्ता लम्बे समय तक लकवे की एलोपैथिक दवाओं को खाने से उसके साइड इफेक्ट्स की वजह से लीवर, किडनी, हार्ट आदि की कई नयी समस्याएं पैदा हो जाती हैं, जिससे पूरा शरीर जर्जर, कमजोर, निस्तेज व बूढ़ा दिखने लगता है !

तो क्या लकवा का कोई भी निश्चित इलाज नहीं है ?

बिल्कुल है, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि अनंत वर्ष पुराने परम आदरणीय हिन्दू धर्म के मोस्ट साइंटिफिक योग आयुर्वेद के ग्रन्थों में दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों अर्थात ऋषि मुनियों द्वारा किसी भी बीमारी के इलाज का वर्णन विस्तार से ना किया गया हो, लेकिन समस्या यह है कि अधिकाँश ऐसे दुर्लभ ग्रन्थ क्रूर मुगलकाल व अंग्रेजों के शासनकाल में नष्ट कर दिए गए, अतः अब ऐसी जानकारियाँ सिर्फ दिव्य दृष्टि प्राप्त संत महापुरुषों के सान्निध्य से ही प्राप्त की जा सकती है !

ऐसे ही एक दिव्य दृष्टिधारी संत की “स्वयं बनें गोपाल” समूह के प्रति अगाध कृपा की वजह से हमें यह जानकारी प्राप्त हुई है कि लकवा का परम लाभकारी इलाज है,- “अनुलोम विलोम प्राणायाम” व “चन्द्रभेदी प्राणायाम” !

सबसे पहले जानिये कि योग विज्ञान के अनुसार किसी मानव को लकवा मारता कब है ?

जैसा कि “स्वयं बनें गोपाल” समूह ने पूर्व के लेखों में भी इस बात का खुलासा किया है कि शरीर में सर्वत्र ब्लड के अतिरिक्त, प्राण वायु की भी महीन अदृश्य पर्त हमेशा बहती रहती है और लकवा किसी भी अंग में तभी मारता है जब उस अंग में ब्लड तो पहुचता हैं लेकिन प्राण वायु समुचित मात्रा में नहीं पहुच पा रही होती है !

अतः योग विज्ञान अनुसार अगर किसी लकवा ग्रस्त अंग में फिर से समुचित मात्रा में प्राण वायु पहुचने लगे तो वह अंग लकवा के प्रभाव से धीरे धीरे मुक्त होकर फिर से एकदम स्वस्थ (पहले जैसा) निश्चित होने लगेगा !

शरीर में सर्वत्र प्राण वायु सही मात्रा में पहुचती रहे इसके लिये “अनुलोम विलोम” प्राणायाम से बड़ा कोई दूसरा एक्सपर्ट है ही नहीं क्योंकि अनुलोम विलोम प्राणायाम शरीर की 72000 नाड़ियों में मौजूद अवरोधों को दूर करते हुए उनमे प्राण की गति अबाध करता है !

अतः परम आदरणीय संत अनुसार अगर कोई भी लकवा ग्रस्त स्त्री/पुरुष प्रतिदिन 1000 बार अनुलोम विलोम प्राणायाम करे तो पूरी उम्मीद है कि मात्र 6 महीने में ही वह लकवा बिमारी से पूर्णतः मुक्त हो जाएगा चाहे उसके शरीर का कितना ही बड़ा हिस्सा लकवाग्रस्त हो चुका हो !

जैसा कि अनुलोम विलोम प्राणायाम करने के लिए अपना दाहिना हाथ उपर उठाकर, उसके अंगूठे से बायीं नाक व बीच की दोनों अँगुलियों (अनामिका व मध्यमा) से दाहिनी नाक बार बार दबानी पड़ती है लेकिन किसी लकवा ग्रस्त व्यक्ति के अगर दाहिने हाथ में लकवा मारा हुआ हो तो वह यह काम बाएं हाथ से भी बिल्कुल कर सकता है !

और अगर किसी आदमी के दोनों हाथों में लकवा मारा हुआ हो, तो भी उसे बिल्कुल भी घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह बिना हाथ का इस्तेमाल किये हुए भी, सिर्फ ध्यान युक्त अनुलोम विलोम प्राणायाम करके भी पूरा लाभ निश्चित प्राप्त कर सकता है ! उस आदमी को अनुलोम विलोम प्राणायाम मानसिक ध्यान द्वारा करने के लिए सबसे पहले यह ध्यान करते हुए सांस को नाक के बाएं छेद से खीचने की कोशिश करनी चाहिए कि सांस उसके नाक के बाए छेद से ही अंदर आ रही है ! और फिर यह ध्यान करते हुए नाक के दायें छेद से सांस को बाहर निकालने का प्रयास करना चाहिए कि सांस दाए छेद से ही बाहर जा रही है ! उसके बाद अब यही पूरी प्रक्रिया उलट कर करना चाहिये अर्थात दायें छेद से अंदर आ रही है और बाएं छेद से बाहर निकल रही है !

शायद कुछ लोगों को इस बात पर भरोसा ना हो लेकिन यह सौ प्रतिशत सत्य है कि कोई भी आदमी सिर्फ इस तरह ध्यान का अभ्यास करके कुछ ही समय में सांस को अपने मनचाहे नाक के छेद से अंदर ले सकता है और बाहर निकाल भी सकता है और वो भी हाथ या बिना किसी भी अन्य चीज का सहारा लिए हुए !

अतः इस तरह “बिना हाथ का इस्तेमाल किये हुए सिर्फ मानसिक ध्यान से अनुलोम विलोम प्राणायाम” करने से भी, “हाथ के इस्तेमाल युक्त अनुलोम विलोम प्राणायाम” के समान ही लाभ निश्चित मिलता है !

अगर कोई लकवा ग्रस्त व्यक्ति बैठ कर अनुलोम विलोम प्राणायाम करने में सक्षम ना हो तो वह पीठ के बल सीधे लेटकर भी इस प्राणायाम को कर सकता है ! प्राणायाम के समय गर्दन भी एकदम सीधी तभी रह पाएगी जब बहुत मुलायम गद्दे पर नहीं लेटा जाए ! (ध्यान रहे कि अक्सर लोग गर्दन सीधा करने के चक्कर में, या तो गर्दन थोड़ा ऊपर आसमान की ओर उठा देतें हैं या थोड़ा जमीन की ओर नीचे झुका देतें हैं, जो कि गलत है) !

पहले ही दिन 1000 बार अनुलोम विलोम नहीं करना चाहिए नहीं तो चक्कर, सिर दर्द आदि समस्या हो सकती है ! अनुलोम विलोम का अभ्यास धीरे धीरे अपने शरीर की क्षमता के हिसाब से रोज या हफ्ते में बढ़ाते जाना चाहिए !

अनुलोम विलोम प्राणायाम, कपालभाति व भस्त्रिका की तुलना में काफी सौम्य प्राणायाम है और इसको करने में पेट पर ज्यादा दबाव भी नहीं पड़ता है इसलिए इसको करने से, मात्र आधा से पौन घंटे पहले तक कोई तरल खाद्य पदार्थ (जैसे चाय, पानी आदि) और 2 से 3 घंटे पहले तक कोई सॉलिड खाद्य पदार्थ (जैसे लंच, डिनर आदि) नहीं खाना पीना चाहिए ! इस प्राणायाम को करने के 15 – 20 मिनट बाद ही कुछ भी खाना पीना चाहिए !

रोज 1000 बार अनुलोम विलोम के अलावा चन्द्रभेदी प्राणायाम भी करना चाहिए ! चंद्र्भेदी प्राणायाम को रोज कम से कम 10 बार से लेकर अधिकतम जितना चाहें उतना किया जा सकता है !

palsy paralysis benumb paralyse paralyze lakawa lakava nervous system spinalcord stroke nerve injury cerebral palsy disease yoga asana yogasana pranayama ayurveda neuropathy parkinsonsचंद्र्भेदी प्राणायाम और अनुलोम विलोम प्राणायाम में अंतर यह होता है कि अनुलोम विलोम प्राणायाम में बार बार नाक के अलग अलग छेदों से सांस लेकर छोड़ी जाती है जबकि चन्द्र भेदी प्राणायाम में हमेशा सिर्फ नाक के बाएं छेद से ही धीरे धीरे सांस अंदर खीचतें हैं और फिर जितनी देर तक आसानी से संभव हो सांस को अंदर रोकतें हैं (अर्थात कुम्भक करतें हैं) और फिर उसके बाद नाक के दायें छेद से सांस को धीरे धीरे बाहर निकाल देतें हैं !

यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अनुलोम विलोम प्राणायाम करते समय कुम्भक (अर्थात सांस रोकना) नहीं करते हैं जबकि चन्द्रभेदी प्राणायाम करते समय करतें हैं !

लकवा के मरीज को चन्द्र भेदी प्राणायाम करते समय, कुम्भक के दौरान यह मानसिक भावना करना चाहिए कि प्राण वायु लकवा ग्रस्त अंग में जाकर, उस अंग को तेजी से ठीक कर रही है !

लकवा के मरीज को हर वक्त सिर्फ लेटकर या बैठकर आराम ही नहीं करते रहना चाहिए, बल्कि जितना आसानी से संभव हो उतना शारीरिक मेहनत (जैसे टहलना, हाथ पैर हिलाना, या कोई भी आसानी से हो सकने वाला योगासन आदि) भी समय समय पर करते रहना चाहिए !

निष्कर्ष यही है कि लकवा पूरी तरह से वात (वायु) जनित रोग है अतः प्राण वायु को कुपित करने वाले सभी परहेजों (प्राण वायु को कुपित करने वाले सभी परहेजों को जानने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें- मांसपेशी के खिचाव गठिया नस चढ़ना साल पड़ना तनाव के दर्द का आसान घरेलू उपाय ) को करने के साथ साथ उपर्युक्त लिखे तीन काम (अनुलोम विलोम प्राणायाम, चन्द्रभेदी प्राणायाम और रेग्युलर यथासंभव एक्सरसाइज) को ऊपर बताये गये तरीके से करने पर लकवा चाहे शरीर के कितने भी ज्यादा अंगों को बर्बाद कर चुका हो, निश्चित धीरे धीरे ठीक होने लगेगा और ईश्वरीय कृपा रही तो मात्र 6 महीने में ही लकवा नाम की बिमारी से पूरी तरह मुक्ति मिल सकती है वो भी बिना किसी अन्य दवा की मदद लिए हुए !

(आवश्यक सूचना – “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान की इस वेबसाइट में प्रकाशित सभी जानकारियों का उद्देश्य, सत्य व लुप्त होते हुए ज्ञान के विभिन्न पहलुओं का जनकल्याण हेतु अधिक से अधिक आम जनमानस में प्रचार व प्रसार करना मात्र है ! अतः “स्वयं बनें गोपाल” संस्थान अपने सभी पाठकों से निवेदन करता है कि इस वेबसाइट में प्रकाशित किसी भी यौगिक, आयुर्वेदिक, एक्यूप्रेशर तथा अन्य किसी भी प्रकार के उपायों व जानकारियों को किसी भी प्रकार से प्रयोग में लाने से पहले किसी योग्य चिकित्सक, योगाचार्य, एक्यूप्रेशर एक्सपर्ट तथा अन्य सम्बन्धित विषयों के एक्सपर्ट्स से परामर्श अवश्य ले लें क्योंकि हर मानव की शारीरिक सरंचना व परिस्थितियां अलग - अलग हो सकतीं हैं)



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