अखंड यौवन को बेहद आसानी व जल्दी से प्रदान करने में सक्षम हैं ये यौगिक क्रियाएं

अब घर बैठे हुए ही अपनी कठिन शारीरिक, मानसिक, आर्थिक समस्याओं के लिए तुरंत पाईये ऑनलाइन/टेलीफोनिक समाधान विश्वप्रसिद्ध “स्वयं बनें गोपाल” समूह के बेहद अनुभवी एक्सपर्ट्स द्वारा, इसी लिंक पर क्लिक करके



“स्वयं बनें गोपाल” समूह आज आप सभी के लिए, परम आदरणीय ऋषि सत्ता द्वारा प्राप्त योग सम्बन्धित कुछ ऐसी दुर्लभ जानकारियों को प्रस्तुत कर रहा है जिनका उचित तरीके से अभ्यास करने से कोई भी स्त्री/पुरुष बहुत ही कम समय में अपने खोये हुए सुन्दरता युक्त यौवन को फिर से प्राप्त कर सकता है और साथ ही साथ अपने यौवन को आजीवन बरकरार भी रख सकता है !

यह तो सभी लोगों की इच्छा होती है कि वे हमेशा युवा बना रहे और यह कोई काल्पनिक इच्छा भी नहीं है क्योकि इसके एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने योग की सहायता से ना केवल अपने शरीर का खोया हुआ यौवन वापस पाया है बल्कि अपने शरीर की, मॉडर्न मेडिकल साइंस द्वारा लाइलाज मानी जाने वाली कई बीमारियों से हमेशा के लिए मुक्ति भी पायी है !

योग से शरीर कितना युवा व स्वस्थ बना रह सकता है इसके एक प्रसिद्ध उदाहरण हैं श्री बाबा रामदेव जिनके शरीर के अद्भुत ओज व तेज के बारे में सही अंदाजा शायद टेलीविजन स्क्रीन पर देखने से दर्शकों को ना लग पाता हो लेकिन अगर कोई भी आदमी, श्री रामदेव जी को प्रत्यक्ष रूप से थोड़ी दूर से देखता है वो बिना आश्चर्यचकित हुए नहीं रह सकता है क्योकि लगभग 56 वर्ष की आयु में भी उनकी अंगकान्ति (यानी त्वचा की चमक व कसावट) एकदम युवाओं वाली है वो भी बिना किसी मेकअप के !

श्री बाबा रामदेव की दाढ़ी के कुछ बाल सफ़ेद प्रतीत होतें हैं लेकिन प्राप्त जानकारी अनुसार उसके पीछे मुख्य वजह उन्हें जन्मजात मिली वात समस्या है ! दुनिया का हर स्त्री/पुरुष अपने पूर्वजो से कोई ना कोई ना शरीरिक समस्या लेकर पैदा होता है जो समय आने पर परिलक्षित होती है लेकिन प्राप्त जानकारी अनुसार बाबा रामदेव की वात समस्या शुरू से ही इतनी भयंकर थी कि उन्हें बचपन में ही लकवा मार गया था ! लकवे के इलाज के दौरान ही उनका परिचय योग – आयुर्वेद से हुआ, जिसकी मदद से उन्होंने ना केवल अपनी लकवे की बिमारी को ठीक किया बल्कि आज लगभग 56 वर्ष की अवस्था में भी वो एकदम युवा बनें हुए हैं !

कई ऐसी अनुवांशिक बीमारियों होती हैं जिन्हें ठीक करना बहुत ही कठिन होता है (ऐसी अनुवांशिक बीमारियों को ही ज्योतिष शास्त्र में अकाट्य प्रारब्ध कहते हैं) और कुछ चिकित्सकों का कहना है कि एक मानव अपने जीवन में जितनी भी तरह की बीमारियाँ को झेलता है उनमें से अधिकाँश अनुवांशिकी ही होती हैं (यानी ज्योतिष शास्त्र की ये बात भी सही है कि मानवों के वर्तमान जीवन पर उसके पूर्व जन्मों के कर्मो अर्थात प्रारब्ध का बहुत गहरा असर होता है) ! खैर समस्या चाहे कितनी भी कठिन हो हमें लगातार पुरुषार्थ करते रहना चाहिए उसे हरा देने की ! और इसी पुरुषार्थ का नतीजा भविष्य के लोग देखे सकेंगे जब श्री रामदेव जी अपने इस दावे को भी सच करके दिखाएँगे जिसमें संभवतः उन्होंने कहा था कि वे कम से कम 200 साल तक जिन्दा रहेंगे वो भी हमेशा युवा बने रहकर !

वैसे आजकल लोग युवा दिखने के लिए जिन शार्ट कट्स का इस्तेमाल कर रहें हैं उसके परिणाम बहुत ही घातक होतें हैं जैसे- आजकल ऐसे मंहगे मेकअप के सामान मार्केट में हर जगह उपलब्ध हैं जिनका इस्तेमाल करने से कोई बूढ़ा आदमी भी कुछ देर के लिए काफी जवान दिख सकता है और विचित्र बात ये है कि ऐसे मेकअप का उपयोग ना केवल नकली फ़िल्मी दुनिया वाले बल्कि आम जनता में भी उपस्थित कई स्त्री/पुरुष धड़ल्ले से रोज कर रहें हैं जिसकी वजह से उनकी त्वचा रोज पहले से ज्यादा बदसूरत होती जा रही है ! ऐसे ही रोज मेकअप करने वाले लोगों के बारे में चुटकुले सुनने को मिलते हैं कि अगर वे किसी दिन बिना मेकअप के अपने परिवार वालो के सामने चलें जाएँ तो उनके परिवार वाले ही उन्हें पहचानने से इन्कार कर देंगे !

इसलिए इससे पहले की त्वचा परमानेंट रूप से कुरूप हो जाए, बुद्धिमानी इसी में हैं कि हर तरह के मेकअप को करना तुरंत छोड़ देना चाहिए और अगर त्वचा पर कुछ लगाने की इच्छा हो तो सिर्फ घर में बनी हुई दूध, मलाई, बेसन, हल्दी, तेल, घी, मुल्तानी मिटटी आदि देशी चीजों का उबटन ही लगाना चाहिए ! निम्नलिखित योग को करने से त्वचा में रोज जो सुधार आएगा वो रोज मेकअप करने से बर्बाद भी होता जाएगा इसलिये अगर निन्मलिखित योग का पूरा फायदा लेना हो तो, हिम्मत करके हर तरह के मेकअप को करना तुरंत छोड़ देना चाहिए या जब सिर्फ बेहद जरूरी हो तभी मेकअप करना चाहिए ! जो रोज मेकअप करतें हैं अगर वो मेकअप ना करें तो शुरू में कुछ दिनों तक उनकी त्वचा बुरी दिख सकती है लेकिन इन सब से बिना घबराए हुए अगर कोई निन्मलिखित तरीके से योग करे तो धीरे – धीरे कुछ दिनों में उसकी त्वचा फिर से अपने सुन्दर रूप को प्राप्त कर सकती है !

अब सबसे पहले ये समझिये कि यौवन केवल जवान दिखने का नाम नहीं है बल्कि जवानी महसूस करने का भी है ! इसे आसान तरीके से इस तरह से समझिये कि जब आपकी उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच में थी तब उस समय आप कैसा महसूस करते थे ? जाहिर सी बात है कि सभी लोग इसके जवाब में यही कहेंगे की उस समय दिल में हर समय एक अनजाना एक्साईटमेंट (उत्साह) महसूस होता था जिसकी वजह से बिना कारण के भी हर छोटी – छोटी बात पर हंसी आती थी ! बस इसी को कहते हैं सच्चा यौवन !

इसी वजह से आपने देखा होगा कि ऐसे हंसमुख लोग जिन्हें हर छोटी – छोटी बात पर हंसी आती है वे जल्दी बूढ़े होते ही नहीं हैं जबकि गुस्सैल व मनहूस बने रहने वाले लोग हमेशा अपनी उम्र से ज्यादा के दिखाई देते हैं ! मन की प्रसन्नता का शरीर की जवानी से सीधा सम्बन्ध होता है और इस रहस्य का भरपूर फायदा उठाते हैं फ़िल्मी दुनिया के एक्टर्स जो अपने निजी जीवन में भी हर समय छोटी – छोटी बात पर नकली/असली हंसी हँसते रहतें हैं ताकि वे लम्बे समय तक युवा बने रह सकें ! हँसी चाहे नकली भी हो तब भी शरीर के स्वास्थ्य पर बहुत ही अच्छा असर डालती है ! ऐसे बहुत से सत्य उदाहरण है जिसमे मरीजो ने बिना किसी दवा के, सिर्फ “लॉफिंग थेरेपी” (laughing therapy यानी शरीर की क्षमता अनुसार अधिक से अधिक हँसना) की मदद से अपनी बेहद कठिन व लाइलाज बिमारियों को भी ठीक कर लिया, इसलिए सभी डॉक्टर्स कहते हैं “Laughter is the Best Medicine” (हंसी सर्वोत्तम दवा है) !

वास्तव में जवानी इतनी बेशकीमती चीज होती है कि आज बहुत से अरबपति लोग दिल से चाहते हैं कि कोई उनकी सारी दौलत ले ले और उन्हें फिर से जवान बना दे, लेकिन यह संभव नहीं है क्योकि यौवन को कभी भी दौलत से नहीं ख़रीदा जा सकता है बल्कि लम्बे समय तक अनुशासन युक्त दिनचर्या का पालन करने से प्राप्त किया जा सकता है ! और ज्यादातर लोग यही तो करते हैं कि कुछ दिन खूब जोर – शोर से योग अभ्यास करते हैं फिर कोई ना कोई बहाना बनाकर योग करना ही छोड़ देतें हैं ! पढ़े – लिखे लोग भी ऐसी बचकानी बाते सोचतें हैं कि योग कोई जादू की छड़ी है जो कुछ ही दिनों में, उनकी वर्षों की खराब दिनचर्या से बर्बाद हुई शरीर को फिर से एकदम स्वस्थ कर देगा !

अतः अगर यौवन का लाभ उठाना हो तो कृपया वही सज्जन निन्मलिखित योग को करें जिनमें बिना लापरवाही के कम से कम 3 महीने तक प्रतिदिन आधे से एक घन्टे तक निम्नलिखित योग अभ्यास को निभाने का सामर्थ्य हो ! सारांश रूप में समझिये कि, उचित तरीके से रोज मात्र आधा से एक घंटा तक 3 महीने तक निन्मलिखित योग अभ्यास को करने से आदमी 3 साल तक कम उम्र का दिखने लग सकता है और 6 महीने तक अभ्यास करने से 6 साल तक कम उम्र का दिख सकता है जबकि 2 साल तक रोज उचित विधि से करने पर फिर से युवा की तरह भी दिख सकता है !

परम आदरणीय ऋषि सत्ता ने मुख्यतः जिन दो योग अभ्यासों के बारे में बताया है उनके बारे में जानते तो बहुत से लोग होंगे लेकिन उन अभ्यासों को करने से कैसे अखंड यौवन प्रदान करने वाले अमृत तत्व की प्राप्ति होती है वो भी जानना महत्वपूर्ण है ! विडम्बना ये है कि ज्यादातर लोग दुर्लभ योग विद्याओं के बारे में सोचतें है कि या तो ये फिजिकल स्ट्रेचिंग जैसी बॉडी को फ्लेक्सिबल करने वाली कोई एक्सरसाइज है या इंटरनल हारमोंस को बैलेंस करने वाला कोई प्रोसेस ! जबकि वास्तविकता इससे बहुत ही ज्यादा परे है !

इसलिए प्राचीन काल में गुरुकुल में गुरु लोग हर योग के बारे में कई वर्षों तक बहुत गम्भीरता से अपने शिष्यों को समझाते रहते थे ताकि उनके शिष्य योग से चरम स्तर का लाभ यानी ईश्वरत्व की प्राप्ति भी कर सके ! यहाँ पर हम पाठको के ज्ञान वर्धन के लिए परम आदरणीय ऋषि सत्ता द्वारा बतायी गयी उन यौगिक क्रियाओं के गूढ़ रहस्यों के बारे में बता जरूर रहें हैं लेकिन उचित यही होगा कि पूर्ण लाभ के लिए उन यौगिक क्रियाओं का किसी ऐसे अनुभवी योगी के मार्गदर्शन में अभ्यास किया जाए जिसने खुद उन क्रियाओं से समुचित लाभ प्राप्त किया हो क्योकि जैसे किसी नौसिखिये को केवल बन्दूक चलाने की विधि के बारे में बताकर उससे शेर का शिकार नहीं करवाया जा सकता है, उसी तरह बिना गुरु मार्गदर्शन के अपेक्षित लाभ मिल पाना मुश्किल है (हालांकि वे यौगिक क्रियाएं करने में बेहद आसान व पूरी तरह से हानि रहित मानी जाती है इसलिए योग्य मार्गदर्शक ना मिलने पर सच्चे मन से योगीराज भगवान शिव को ही अपना गुरु मानकर योग करना शुरू किया जा सकता है और भगवान शिव के आशीर्वाद से सफलता निश्चित मिल सकती है) !

जैसा कि हमने पूर्व के आर्टिकल्स में भी बताया है कि अन्तहीन आश्चर्यों से भरे हम मानवों के शरीर में तालु प्रदेश में स्थित कपाल कुहर के पास से बहुत कम मात्रा में अमृत तत्व लगातार टपकता रहता है जो पेट की जठराग्नि से टकराकर लगातार भस्म भी होता रहता है जिसकी वजह से हमें उस अमृत तत्व का कोई लाभ नहीं मिल पाता है ! कपाल कुहर गले के टॉन्सिल के पास स्थित होता है और इसी से हर समय अमृत तत्व टपकता है जो की गले से गुजरती हुई सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए, पेट में स्थित खाना पचाने वाली अग्नि पर गिरकर जल जाता है और हमारे किसी काम नही आ पाता है !

ये सब प्रक्रिया सूक्ष्म शरीर में होती है, ना कि स्थूल शरीर में ! जैसा कि हमने पूर्व के कई आर्टिकल्स में भी बताया है कि स्थूल शरीर (यानी हाड़ मांस से बनी शरीर) की सारी प्रकियाओं का समन्वय सूक्ष्म शरीर (यानी उर्जा से बना हुआ अदृश्य शरीर) द्वारा ही होता है ठीक उसी तरह जैसे बिजली के उपकरणों के कार्यो का सम्पादन उनके अंदर अदृश्य रूप से विद्यमान विद्युत् ऊर्जा की वजह से हो पाता है !

तो जब कोई निन्मलिखित योगासनों का अभ्यास करता है तो कपाल कुहर से निकलने वाला वो अमृत तत्व जठराग्नि पर ना गिरकर, मस्तिष्क द्वारा अवशोषित होने लगता है जिससे शरीर का बहुत ही भला होता है ! अमृत तत्व को रोज अधिक से अधिक मात्रा में ग्रहण करने से शरीर धीरे – धीरे अखंड यौवन प्राप्त कर सकता है ! अखंड यौवन का मतलब होता है जीवन के अंतिम दिन तक जवान बने रहना !

निन्मलिखित योगासनों का अभ्यास करने से हमारा मस्तिष्क पहले ही दिन से अमृत तत्व का सेवन करना शुरू कर सकता है जिससे पहले ही दिन से त्वचा में थोड़ा सा सुधार जरूर देखा जा सकता है जो कि दिन ब दिन बढ़ता ही जा सकता है और कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक रूप से पूरे शरीर का स्वास्थ्य व यौवन लौटने लग सकता है {निन्मलिखित योगासनों का अभ्यास करने के दौरान कोई दिव्य अनुभूति या अहसास होना जरूरी नहीं है, लेकिन शरीर के स्वास्थ्य में (खासकर त्वचा में) पहले ही दिन से थोड़ा सुधार जरूर देखा जा सकता है} !

तो इस पूरी प्रक्रिया में मुख्यतः दो अभ्यास करने होतें हैं; पहला- चंद्र्भेदी प्राणायाम और दूसरा- उष्ट्रासन !

शायद इस घटना के बारे में आपने सुना हों कि चन्द्रमाँ देवता को स्वयं भगवान शिव ने अमृत प्रदान किया था पर शायद आप नहीं जानते हों कि अमृत के दाता चन्द्र देव, मानव शरीर के मस्तिष्क में ही वास करते हैं (क्योंकि “यत पिंडे तत ब्रह्माण्डे” अर्थात जो ब्रह्मांड में है वही शरीर में भी है) ठीक उसी तरह जैसे भगवान शिव के सिर पर चन्द्र देव विराजमान हैं (इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि “शिवोहम” यानी मै ही शिव हूँ ) ! इसी वजह से चन्द्रभेदी प्राणायाम, मानव मस्तिष्क में स्थित चन्द्र देव से अमृत तत्व का संकर्षण करने की अद्भुत क्षमता रखता है जिससे यौवन में जबरदस्त इजाफा होता है !

Symbolic Image (Photo by Alex Wong/Getty Images)

वास्तव में हमारा ब्रेन (मस्तिष्क) इतनी बड़ी अबूझ पहेली है कि इसे समझने के लिए विश्वस्तर पर कई प्रयास हो रहें है जैसे- अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल में ही विश्व के सबसे महंगे प्रोजेक्ट्स में से एक “ब्रेन इनिशिएटिव” (BRAIN Initiative; https://braininitiative.nih.gov/) की शुरुआत की थी ! आखिर विश्वभर के वैज्ञानिक इतनी मेहनत व अपार पैसा क्यों खर्च कर रहें हैं ब्रेन को समझने में, क्योकि हर दूरदर्शी व्यक्ति अंत में इसी निर्णय पर पहुँचता है कि दुनिया की हर तरह की समस्याओं का समाधान कहीं ना कहीं मानव मस्तिष्क की अनंत गहराईयों में पहले से ही छिपा हुआ है, बस जरूरत है उसे खोज निकालने की !

आज के वैज्ञानिकों को मॉडर्न साइंस के रूल्स को फॉलो करते हुए ब्रेन की असीमित शक्तियों को समझने में शायद असीमित समय लग जाए लेकिन इन बातों का उत्तर सृष्टि की शुरुआत में ही, दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों अर्थात ऋषि मुनियों ने परम आदरणीय हिन्दू धर्म के ग्रंथों में लिख रखा है कि मस्तिष्क अनंत शक्तिशाली इसलिए है क्योकि मस्तिष्क के ब्रह्मरंध्र (यानी सिर पर शिखा या चोटी रखने वाले स्थान पर) पर स्थित सहस्त्रार चक्र में भगवान् अनंत यानी शिव रहते हैं लेकिन वह शिव, शव के समान सुप्त अवस्था में रहते हैं जब तक कि उनकी शक्ति यानी कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र से जागकर उनसे मिलने नहीं आ जाती है !

चन्द्रभेदी प्राणायाम को रोज कम से कम 100 बार करना होता है ! इसे करने के लिए सबसे पहले पद्मासन या सुखासन में आराम से पालथी मारकर बैठ जाएँ ! रीढ़ की हड्डी एकदम सीधी रहनी चाहिए और चेहरा ठीक सामने होना चाहिए ! इसमें नाक के बाएं छेद को दाहिने हाथ की बीच की दोनों उँगलियाँ (यानी मिडिल व रिंग फिंगर) से बंद करना व खोलना चाहिए जबकि नाक के दाए छेद को दाहिने हाथ के अंगूठे से खोलना – बंद करना चाहिए !

साथ ही साथ यह भी ध्यान रहे कि गहरी सांस को हमेशा नाक के बाएं छेद से ही धीरे – धीरे अंदर खीचना है और जितनी देर तक स्वेच्छा से सांस को अंदर रोक सकें उतना देर तक रोकने के बाद, हमेशा नाक के दाहिने छेद से धीरे – धीरे बाहर निकाल देना है ! वैसे आम तौर पर यही माना जाता है कि सांस अंदर भरने (यानी पूरक), सांस अंदर रोकने (यानी कुम्भक) और सांस बाहर निकालने (यानी रेचक) में समय का 1:4:2 का अनुपात होना चाहिए यानी सांस अंदर लेने में अगर 10 सेकंड्स लगते हैं तो सांस को 40 सेकंड्स तक अंदर रोकना चाहिए और बाहर निकालने में 20 सेकंड्स लगना चाहिए !

लेकिन अगर आप शुरू में समय के इस नियम का पालन नहीं कर पा रहें हैं तो भी आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योकि इस नियम का बिना पालन किये भी आपको बहुत फायदा मिलेगा ! इसलिए अपने मन में बिना कोई शंका लाये हुए, आप सांस लेने, रोकने व निकालने में जितना अधिक से अधिक समय अपनी सुविधानुसार लगाना चाहे, बिल्कुल लगा सकतें हैं तब भी आपको बहुत ही ज्यादा फायदा निश्चित मिलेगा !

अगर किसी भी योग को करते समय यह मानसिक भावना की जाए कि पूरा शरीर बहुत स्वस्थ, मजबूत, युवा व सुंदर बनता जा रहा है तो वाकई में उस योग से मिलने वाला फायदा कई गुना बढ़ जाता है !

इसके अतिरिक्त चंद्र्भेदी प्राणायाम का जबरदस्त फायदा देखा गया है मन से सभी तरह की नकारात्मक भावनाओं (जैसे- क्रोध, निराशा, दुःख, ईर्ष्या, डर – घबराहट – बेचैनी आदि) को दूर करने में ! वेरी साइंटिफिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्रमा को मन का कारक बोला गया है ! जैसा की ऊपर भी बताया जा चुका है कि मन की भावनाओं का सीधा असर पड़ता है तन की सुन्दरता पर ! आज की डेट में कौन सा ऐसा आदमी होगा जिसके जीवन में बहुत सी समस्याएं ना हो लेकिन बुद्धिमान वही है जो अपनी समस्याओं के बारे में सोच – सोच कर अपने शरीर को खोखला नही करता रहता है !

नकारात्मक भावनाओं के नुकसान को जानने के बावजूद भी लोग बहुत चाहकर भी उनसे छुटकारा नहीं पा पाते हैं ! ऐसी भावनाएं अगर लम्बे समय तक मन में जमी रहें तो ना केवल विभिन्न मानसिक बीमारियाँ (जैसे- डिप्रेशन आदि) बल्कि विभिन्न शारीरिक बीमारियाँ (जैसे- हार्ट- लीवर – किडनी प्रॉब्लम्स, नपुंसकता, असमय बुढ़ापा आदि) भी पैदा करती हैं ! नकारात्मक भावनाओं का सबसे ज्यादा बुरा असर भारत के महानगरो और विदेशो में देखने को मिलता है जहाँ पर ज्यादातर लोग रिश्तों की जिम्मेदारियों से दूर रहकर अकेले, आजाद और फ्री लाइफ स्टाइल जीना पसंद करते हैं (जबकि एक दूसरे के लिए समर्पित जॉइंट फैमिली में डिप्रेशन के मरीज ना के बराबर मिलते हैं) !

अमेरिका व यूरोप की स्थिति तो इतनी खराब हो चुकी है कि वहां के बहुत से लोगों द्वारा अपनी मेंटल एंग्जायटी (मानसिक उन्मादीपन व निराशा) को मात्र कुछ घंटे तक कण्ट्रोल करने के लिए एलोपैथिक दवाओं (जिनके ना जाने कितने हानिकारक साइड इफेक्ट्स होते हैं) को रोज खाना आम बात हो चुकी है ! वास्तव में भगवान ने मानव मन को अकेला रहने के लिए बनाया ही नहीं है क्योकि अकेलापन इसे दीमक की तरह खोखला कर देता है इसलिए मानव मन को अधिकांश समय किसी ना किसी साथी के उचित सहारे की आवश्यकता होती है भले ही चाहे कोई गृहस्थ मानव हो या योगी !

जैसे– किसी निर्जन पहाड़ की बंद गुफा में हमेशा अकेले बैठकर ध्यान करने वाला योगी भी मन ही मन ईश्वर के साकार या निराकार रूप को सदा अपने साथ महसूस करने का प्रयास करता रहता है तभी वो योगी अकेलेपन के साइड इफेक्ट्स से बचा रहता है, नहीं तो कितनी बार ऐसी घटनाएँ सुनने की मिलती हैं जिसमे कोई सैनिक या कोई आदमी जंगल में रास्ता भटक जाने की वजह से कई वर्षों तक अकेले रहने को मजबूर हो गया और अंततः मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया ! इसलिए परम आदरणीय हिन्दू धर्म की सबसे प्रथम नीव मानी जाती है संस्कारी संयुक्त परिवार (जॉइंट फैमिली) को, जिसमें परिवार का हर सदस्य मानसिक रूप से हमेशा बहुत सुरक्षित महसूस करता है क्योकि ये केवल संस्कारी संयुक्त परिवार में ही संभव है कि किसी एक के दुःख को सभी आपस में बांटकर कम कर देतें हैं और किसी एक के सुख को बांटकर कई गुना बढ़ा देतें हैं !

वैसे तो तामसिक आहार व विहार भी एक बड़ा कारण है लोगों की विभिन्न तरह की मानसिक समस्याओं का लेकिन प्राप्त जानकारी अनुसार आज की डेट में मानसिक समस्याओं का सबसे बड़ा कारण हैं लोगों के जीवन का अकेलापन या खालीपन ! रिश्तों की जिम्मेदारियों को बंधन व बोझ समझकर उससे दूर रहना शुरू में अच्छा तो लगता है लेकिन बाद में जब उसके साइड इफेक्ट्स (जैसे अकेलापन ) झेलना पड़ता है तब रिश्तों की असली कीमत समझ में आती है ! भीड़ में घिरे होने के बावजूद भी कई लोग आज मानसिक रूप से एकदम अकेले पड़ गयें हैं इसलिए धीरे – धीरे उनके स्वभाव में चिडचिडापन, गुस्सा, झल्लाहट, निराशा, डर, बेचैनी, आत्मघातीपन बढ़ता जा रहा है जो कि उन्हें डिप्रेशन या साईकोपन की तरफ भी धकेल सकता है !

लोग अंदर से अकेले क्यों पड़ गयें हैं ! क्योकि ज्यादातर स्थितियों में देखा गया है कि जब लोग हमेशा अपनी वक्ती तौर की जरूरत, स्वार्थ, पसंद – नापसन्द के हिसाब से दूसरों से किसी भी तरह का रिश्ता बनाते हैं तो वो रिश्ता कुछ दिनों बाद टूट जाता है और वे फिर से रह जातें हैं अकेले ! जबकि परम आदरणीय हिन्दू धर्म में संयुक्त परिवार का कांसेप्ट इसलिए ही बनाया गया है ताकि बच्चे शुरू से ही एक दूसरे के साथ स्वार्थ रहित प्रेम से रहना सीखें ! और यही स्वार्थ रहित प्रेम से साथ रहने की बचपन की बेशकीमती शिक्षा, बच्चों द्वारा भविष्य में पूरी दुनिया को ही अपना परिवार मानकर (वसुधैव कुटुंबकम् ) विश्व निर्माण में अहम भूमिका निभाती है !

Symbolic Picture

अभी कोरोना काल में भी देखा गया कि जॉइंट फैमिली में रहने वाले लोग तुलनात्मक रूप से काफी सुखी थे इसलिए भारतवर्ष के बुद्धिमान प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने जॉइंट फैमिली के फायदों के बारे में यूनिवर्सिटीज में रिसर्च करने का आवाहन किया है जिसे जानने के लिए कृपया यह न्यूज़ पढ़ें– Research on ‘Impact of Joint Families in Fight Against COVID’: PM to Universities

यहाँ पर मानसिक समस्याओं के कारण, प्रभाव व निदान को इतना विस्तार से इसलिए समझाया जा रहा है ताकि लोग समझ सकें कि दिमाग में लम्बे समय तक चलने वाली गड़बड़ी, शरीर में भी गड़बड़ी पैदा कर देती है ! वैसे मानसिक उलझनों को दूर करने के लिए कई ज्योतिषी कुंडली के हिसाब से मोती पहनने की सलाह देते हैं लेकिन मार्केट में मिलने वाले मोती से पता नहीं फायदा होगा या नहीं, लेकिन यह तो तय है कि चंद्र्भेदी प्राणायाम करने से मन पर कण्ट्रोल बढ़ता जाता है जिससे मन पर नकारात्मक विचार प्रभावी नहीं होने पाते हैं और आदमी हमेशा मन में उत्साह व ख़ुशी महसूस करता रहता है !

अब जहाँ तक बात उष्ट्रासन की है तो ज्यादातर लोग इसके बारे में यही जानते हैं कि यह गर्दन व पीठ की जकड़न सम्बन्धित तकलीफों (जैसे सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस आदि ) में फायदेमंद है जबकि उष्ट्रासन का गुप्त सिद्धांत वही है जिसका ऊपर वर्णन किया गया है यानी कपालकुहर से गिरते हुए अमृत तत्व की दिशा को उष्ट्रासन पलट कर मस्तिष्क की तरफ कर देता है जिसकी वजह से धीरे – धीरे शरीर के सभी छोटे – बड़े रोगों का नाश होना शुरू हो जाता है और शरीर ताकतवर, सुंदर व युवा बनने लगता है !

उष्ट्रासन करने के लिए सबसे पहले घुटनों पर बैठे ! फिर गहरी सांस धीरे – धीरे अंदर भरते हुए, फोटो में दिखायी गयी स्थिति के अनुसार पीछे झुककर हाथों से पैर की एडियों को छूने की कोशिश करें ! जितना अधिक देर तक स्वेच्छा से सांस अंदर रोक सकें, उतनी देर तक पीछे झुके रहें ! फिर धीरे – धीरे सांस बाहर छोड़ते हुए वापस सीधे होकर घुटने पर बैठ जाएँ ! यह हुआ एक बार उष्ट्रासन ! इस तरह कम से कम 5 से 10 बार रोज करें ! हो सकता है शुरू में आप कुछ दिनों तक फोटो में दिखाई गयी स्थिति जितना पीछे ना झुक पायें पर धीरे – धीरे कुछ ही दिनों में आप भी उतना झुकने लगेंगे ! इसको करने में कभी भी जल्दीबाजी नहीं करना चाहिए नहीं तो पीठ या गर्दन में खिचाव आ सकता है !

अगर आप इन दोनों योग का असली फायदा चाहते हैं तो आप इन्हें रोज सुबह अमृत वेला में करिए ! अमृत वेला (ब्रह्म मूहूर्त) बोलते हैं सुबह 4 से 5 बजे के बीच के समय को ! अगर किन्ही कारणों से आप अमृत वेला में नहीं कर पाते हैं तो कोई बात नहीं आप जब भी करेंगे तब भी आपको बहुत लाभ मिलेगा ! याद रहे की योग प्राणायाम को नहाने के बाद ही करना बेहतर होता है और अगर ऐसा संभव ना हो तो योग करने के कम से कम आधे घंटे बाद ही नहाना चाहिए नहीं तो शरीर पर बुरा असर पड़ सकता है !

कुछ ठोस भोजन (जैसे – लंच, डिनर, ब्रेकफास्ट आदि ) खाया हो तो कम से कम 3 से 4 घंटे बाद और कोई लिक्विड सामान (जैसे– चाय, पानी, दूध आदि) पीया हो तो कम से कम 1 से 2 घंटे बाद ही कोई भी योगासन व प्राणायाम करना चाहिए ! आसन, प्राणायाम या किसी भी एक्सरसाइज के बाद कम से कम 20 मिनट तक कुछ नहीं खाना पीना चाहिए (बहुत प्यास लगे तो 1 – 2 घूँट पानी पी सकतें हैं) !

अखंड यौवन को प्राप्त करने व उसे हमेशा बरकरार रखने के लिए ऊपर वर्णित दोनों योग के अतिरिक्त आपको अपनी दिनचर्या में निन्मलिखित आसान आदतों का पालन करना भी आवश्यक है-

रोज सुबह सोकर उठते ही तुरंत 1 ग्लास पानी पीना, रोज जब भी फुर्सत मिले आधा घंटा तेज टहलना या कोई भी ऐसी हार्ड एक्सरसाइज करना जिसमें खूब पसीना निकलता हो, रोज सुबह नहाने से पहले पूरे शरीर की तेल से 10 -15 मिनट तक मालिश करना (मालिश किसी भी तेल से कर सकते हैं), शुद्ध दूध से बने हुए किसी भी खाद्य पदार्थ का रोज उचित मात्रा में सेवन करना (अगर भारतीय देशी नस्ल की गाय माता के दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी, मलाई, छेना आदि में से किसी का भी रोज उचित मात्रा में सेवन किया जाये तो कोलेस्ट्रॉल बिल्कुल नही बढ़ने पाता है लेकिन यौवन में जबरदस्त इजाफा होता है), रोज बहुत ज्यादा घी – तेल – मिर्च – मसाला आदि का सेवन ना करना, तामसिक भोजन जैसे- मांस मछली अंडा शराब बियर तम्बाखू सिगरेट बीड़ी आदि का सेवन बिल्कुल ना करना, शरीर में पानी की कमी ना होने देना, पेट में कब्ज ना होने देना इसलिए रोज सुबह शौच जाने का समय एकदम निश्चित रखना (मल, मूत्र रोकने से शरीर में कई तरह के टोक्सिन पैदा होतें हैं जिनसे असमय बुढ़ापा आता है), रात को जल्दी सोना और रोज कम से कम 6 से 8 घंटे तक जरूर सोना, शरीर में अंदरूनी या बाहरी तौर पर केमिकल्स (चाहे वो कोई साबुन, शैम्पू या क्रीम हो या कोई एलोपैथिक दवा हो) का कम से कम इस्तेमाल करना आदि !

ऐसा संभव नहीं है कि ऊपर बताये गये अभ्यास को उचित तरीके से करने पर लाभ ना मिल सके, इसलिए जैसे ही आपको लाभ मिलने लगे वैसे ही आप इस प्रक्रिया के बारे में दूसरे परेशान लोगों को भी बताना ना भूलें क्योकि आपके थोड़े से प्रयास से अगर किसी के हीन भावना से ग्रसित दुखी जीवन में फिर से आशा का सवेरा होता है तो इसका आपको बेशकीमती पुण्य जरूर मिलेगा जो आपके जीवन की उन्नति में अत्यंत सहायक साबित हो सकता है !

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