सर्प बदले केचुल तो सर्पासन क्या करे ?

· January 9, 2017

(आवश्यक सूचना- विश्व के 169 देशों में स्थित “स्वयं बनें गोपाल” समूह के सभी आदरणीय पाठकों से हमारा अति विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि आपके द्वारा पूछे गए योग, आध्यात्म से सम्बन्धित किसी भी लिखित प्रश्न (ईमेल) का उत्तर प्रदान करने के लिए, कृपया हमे कम से कम 6 घंटे से लेकर अधिकतम 72 घंटे (3 दिन) तक का समय प्रदान किया करें क्योंकि कई बार एक साथ इतने ज्यादा प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हो जातें हैं कि सभी प्रश्नों का उत्तर तुरंत दे पाना संभव नहीं हो पाता है ! वास्तव में “स्वयं बनें गोपाल” समूह अपने से पूछे जाने वाले हर छोटे से छोटे प्रश्न को भी बेहद गंभीरता से लेता है इसलिए हर प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर प्रदान करने के लिए, हम सर्वोत्तम किस्म के विशेषज्ञों की सलाह लेतें हैं, इसलिए हमें आपको उत्तर देने में कभी कभी थोड़ा विलम्ब हो सकता है, जिसके लिए हमें हार्दिक खेद है ! कृपया नीचे दिए विकल्पों से जुड़कर अपने पूरे जीवन के साथ साथ पूरे समाज का भी करें निश्चित महान कायाकल्प)-

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क्या आप “स्वयं बनें गोपाल” समूह द्वारा अपने शहर/कॉलोनी(मोहल्ले) या अपने किसी भी सरकारी या प्राईवेट संस्थान/ऑफिस(कार्यालय) आदि में, अति पवित्र व मोक्षदायिनी धार्मिक गाथाएं, प्राचीन हिन्दू धर्म के वेद पुराणों व अन्य ग्रन्थों में वर्णित जीवन की सभी समस्याओं (जैसे- कष्टसाध्य बीमारियों से मुक्त होकर चिर यौवन अवस्था प्राप्त करने का तरीका) के समाधान करने के लिए परम आश्चर्यजनक रूप से लाभकारी व उपयोगी साधनाएं व ज्ञान आदि से सम्बन्धित नॉलेज ट्रान्सफर सेमीनार (सभा, सम्मेलन, वार्तालाप, शिविर आदि), कार्यक्रमों व एक्जीबिशन (प्रदर्शनी) आदि का आयोजन करवाकर, पूरी तरह से निराश लोगों में फिर से नयी आशा की किरण जगाना चाहते हों, तो कृपया इसी लिंक पर क्लिक करें

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अनंत वर्ष पुराने हिन्दू धर्म के ऋषि मुनियों ने ईश्वरीय कृपा से जो जो अब तक अविष्कार कियें हैं उन्हें आज के खोखले मॉडर्न साइंस के वैज्ञानिक (यहाँ तक कि नासा के भी) अपना पूरा जोर लगाकर ठीक से समझ तक नहीं पा रहें हैं तो इनके द्वारा इससे एडवांस खोज कर पाने की उम्मीद ही रखना बेईमानी है इसलिए कभी कभी ऐसा भी सुनने को मिलता है कि कुछ बड़े विदेशी विज्ञान शोध संस्थानों ने अपनी कुछ गुप्त टीमों (जिसमे वैज्ञानिकों से लेकर तेजतर्रार गुप्तचर भी शामिल हैं) को भारत में आदरणीय संत समाज के पीछे गुप्त भेष में लगा रखा है ताकि उन्हें उनसे कुछ दुर्लभ जानकारी मिल सके लेकिन ऐसे नादान लोगों को यह नहीं पता कि भारतीय सनातन धर्म परम्परा में ज्ञान कभी भी पैसे, खुशामद या दबाव से नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ पात्रता से ही प्राप्त किया जा सकता है और इस पात्रता में तीन गुण मुख्य है,- सदा सच बोलने की आदत, मांस मछली अंडा आदि बिल्कुल ना खाने की आदत और बिना किसी स्वार्थ के हर उचित पात्र की मदद के लिए सदैव तैयार रहने की आदत !

वास्तव में ज्ञान होता ही है मुफ्त में सबको बाटने के लिए जिससे अधिक से अधिक दुखी, परेशान व जिज्ञासु लोगों को उसका लाभ मिल सके लेकिन कुछ ज्ञान ऐसे भी होतें है जो किसी कुपात्र के हाथों में पड़ जाए तो अनर्थ भी हो सकता है इसलिए संत समाज ऐसे ज्ञान को सिर्फ सुपात्रों को ही देने में उत्सुक रहतें है अतः ऐसे संवेदनशील ज्ञान के अलावा, सर्वहित के अन्य जितने भी ज्ञान होतें हैं उस पर सुपात्र व कुपात्र सभी का समान अधिकार होता है इसलिए ऐसे ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों में मुफ्त में बाटकर परोपकार का बेशकीमती पुण्य कमाने से किसी को भी, कभी भी बिल्कुल नहीं चूकना चाहिए क्योकि सृष्टी के अटल कर्मफल सिद्धांत के अनुसार, किसी के द्वारा कभी भी किये गए छोटे से छोटे अच्छे कार्यों का फल भी उचित समय आने पर उसे सूद समेत वापस मिल कर ही रहता है !

हम यहाँ बात कर रहें है, बहुत ही साधारण से दिखने वाले आसन, – सर्पासन की, जिसे भुजंगासन भी कहतें हैं !

देखा जाय तो इसे करने वाले अधिकाँश लोग यही सोचतें है कि इस आसन से ज्यादा से ज्यादा पीठ दर्द में आराम मिलेगा, शरीर लचीली बनी रहेगी, शायद पेट की समस्याओं में भी आराम मिल जाए आदि आदि !

पर वास्तविकता इससे कई गुना परे है क्योकि वैदिक काल में भगवान् शिव की कृपा से ऋषि पतंजलि ने जो इस सर्पासन का आविष्कार किया है, उसमें सर्प की सबसे बड़ी खूबी अर्थात अपने से ही अपने शरीर का बार बार नवीनीकरण करना, विद्यमान है !

सर्प अपनी शरीर का बार बार नवीनीकरण (अर्थात कायाकल्प) केंचुल बदल कर करता है, उसी तरह सर्पासन का लम्बे समय तक नियमित अभ्यास करने वाला योगी अपने शरीर का नवीनीकरण अपने मणिपूरक चक्र को जगा कर करता है !

सर्पासन के लम्बे नियमित अभ्यास से निश्चित रूप से मणिपूरक चक्र जागृत होने लगता है और हर स्त्री पुरुष के नाभि में अदृश्य रूप से स्थित इसी मणिपूरक चक्र में अमृत का वास होता है और जब मणिपूरक चक्र धीरे धीरे जागृत होने लगता है तब इसी मणिपूरक चक्र से धीरे धीरे अमृत का स्राव होने लगता है जिससे व्यक्ति पहले कुछ सालों में अजर होता है (अर्थात उसके सभी शारीरिक रोगों का नाश होता है) फिर अगले कई सालों में अमर होने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है (अमर व्यक्ति सिर्फ अपनी इच्छा से ही प्राण त्याग सकता है, लेकिन अमर होने की प्रक्रिया बहुत ही लम्बी होती है और विरले ही लोग इस अवस्था को प्राप्त कर पातें हैं) !

सर्पासन का नियमित अभ्यास करने से चिर यौवन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है (जो शरीर के अजर होने का ही एक अनिवार्य हिस्सा है) जिससे व्यक्ति की झुर्रियां, मुंहासे, सफ़ेद बाल या गंजापन, आँखों की रौशनी में कमी, कमजोर मसूढ़े, कमजोर पाचन शक्ति, कम हो गये शारीरिक बल में भी क्रमशः सुधार आने लगता है !

यहाँ तक कि, असमय पूरी तरह से नपुंसक हो चुके मानवों में भी फिर से नए सिरे से यौवन के गुण (जैसे वीर्य आदि का पुनरुत्पादन, शिथिल यौनांगो में पुनः उत्तेजना आदि) उभरने लगतें हैं ! सर्पासन करने के बाद इसका विपरीत आसन अर्थात शलभासन को भी कुछ देर तक करना जरूरी होता है ! शलभासन से जननांगो और मूलाधार चक्र पर विशेष अच्छा प्रभाव पड़ता है (शलभासन का चित्र बगल में देखें) !

किसी भी आसन की सिद्धि लगभग 3 घंटे 36 मिनट तक प्रतिदिन लगाने से मानी जाती है लेकिन सर्पासन को 3 घंटा 36 मिनट तक लगा पाने का स्टेमिना विकसित करने में जल्दीबाजी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए नहीं तो पीठ या गर्दन में खिचांव भी आ सकता है !

सर्पासन करने में कई लोग अक्सर गलती करतें हैं कि हाथों पर जोर देकर शरीर को ऊपर उठातें हैं जबकि यह गलत है ! शरीर को ऊपर बिना हाथों पर जोर दिए हुए उठाना चाहिए जो कि शुरू शुरू में किसी भी योगाभ्यासी से ज्यादा नहीं हो पाता है लेकिन बाद में धीरे धीरे नाभि के ऊपर का पूरा शरीर, ऊपर निश्चित उठने लगता है ! हाथों को सीने के बगल में ही रखना चाहिए ना कि आगे या पीछे !

ध्यान रहे कि सर्पासन में नाभि के ऊपर का हिस्सा उठातें है और शलभासन में नाभि के नीचे का हिस्सा ऊपर उठातें है ! सर्पासन या शलभासन की शुरुआत करते समय पूरक करके कुम्भक करतें हैं मतलब सांस अंदर खींच कर पेट में ही रोके रहतें है !

सर्पासन लगाने से ना केवल मणिपूरक चक्र ही जागृत होता है बल्कि यह कुण्डलिनी शक्ति को भी जगाने में सहायक है परन्तु ईश्वर दर्शन और ईश्वर का शाश्वत सानिध्य प्रदान कराने वाली कुण्डलिनी शक्ति जागरण प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए सर्पासन के साथ साथ कुछ अन्य बेहद सरल आसन भी करने होतें है जो हैं –

महामुद्रा, पश्चिमोत्तानासन और वज्रासन !

इन तीन आसनों के भी चित्र ऊपर दिये गएँ हैं और इनकी विस्तृत विधि जानने के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें तथा इनमे से वज्रासन को दोनों वक्त खाने के बाद भी लगाया जा सकता है बाकि अन्य आसनों को सुबह खाली पेट या रात में खाना खाने के आधे घंटे पहले भी लगा सकतें हैं-

जानिये हर योगासन को करने की विधि

जानिये हर प्राणायाम को करने की विधि


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