सबसे बड़ा वैरागी

5957028558_54796a6dc7_oश्रीमत् भागवत पुराण में भगवान दत्तात्रेय सर्प की निर्मोही पन से प्रभावित थे इसलिए वे सर्प की निर्मोहीपन, निरासक्ति और संग्रह न करने की इच्छा को अनुकरणीय मानते थे।

क्योकि सर्प कभी भी अपने रहने की बिल बनाने के लिए चिंतित नहीं रहता, उसे जहा भी उसके रहने के लिए थोड़ी सी भी ठीक जगह मिल जाती है वो वहा पर कुछ समय रहता है और फिर आगे बढ़ जाता है।

ना कोई परिवार बना कर निभाता है ना उसको हर समय साथ रहने के लिए किसी साथी की जरुरत है। पूरी जिंदगी वो अकेला ही बिना किसी स्थान के बंधन में बंधे एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहता है। सर्प का यह व्यवहार उन वैरागी सन्तों से कम नहीं है जो कुछ भी संग्रह करने में विश्वास नहीं रखते और अपने आप को पूरी तरह से भगवान की इच्छा के हवाले छोड़ देते है।

ऐसे वैरागी संतो का मानना है की, उनका 24 घंटे सिर्फ यही काम है की वो सिर्फ प्रभु भक्ति में लीन रहे बाकि प्रभु अगर चाहते है की वो जिन्दा रहे तो उनके खाने पीने का इन्तेजाम प्रभु खुद करेंगे इसलिए उनको भिक्षा में जो कुछ थोड़ा – बहुत खाने पीने को मिल जाता है उसी से काम चला लेते है।

जबकि कुछ सन्त और ज्यादा कटटर होते है और वो अपने खाने पीने के लिए किसी के आगे हाथ भी नहीं फैलाते और कहते है की भगवान अगर चाहते है की हम जिन्दा रहे तो हमारे खाने पीने का सामान हमारे पास खुद किसी से भिजवाये हम किसी से मांगने नहीं जायेंगे। ऐसे संतो का भगवांन अपने में विश्वास परखने के लिए कई बार बहुत कड़ी परीक्षा लेते है और इन्हे कई – कई दिन भूखा प्यासा रहना पड़ सकता है।

अनत्वोगत्वा निष्कर्ष यह है की किसी भी सांसारिक चीज के संग्रह का लाभ है क्या जब वो सांसारिक चीज को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने में हमारी जिंदगी के अति कीमती और सीमित क्षण, उस अनन्त ऐश्वर्य शाली ईश्वर को छोड़ कर तुच्छ नाशवान सांसारिक चीज में लगे !

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