केवल हर सम्बन्धों रिश्तों को धर्मपूर्वक निभाने भर से ही स्वर्ग मिल जाता है

· October 5, 2015

images (1)महाभारत का युद्ध जीतने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने निष्कण्टक राज्य किया। अश्वमेध-सहित अनेक बृहद् यज्ञों का अनुष्ठान भी किया। संन्यास लेने का समय आया तो उन्होंने अपना सब राजपाट परीक्षित को सौंप दिया और स्वयं तप करने के लिए निकल गये।

उनके भाइयों ने भी उनका अनुकरण किया और उनके साथ ही वे भी वन को चले गये।

जिस समय पाण्डव राजधानी छोड़कर वन को जा रहे थे, एक कुत्ता उनके पीछे-पीछे चलने लगा। उसे वापस करने का यत्न किया गया, किन्तु निष्फल। पाण्डव जहाँ-जहाँ गये, कुत्ता उनके पीछे ही रहा। उन्होंने उसको अपना ही साथी मान लिया और उसके भोजन आदि की व्यवस्था करते रहे।

पाण्डवों ने घोर तपस्या की। अन्त में जब संसार त्यागने का समय आया, तो उनकी तपस्या के फलस्वरूप उन्हें स्वर्ग में जाने का वर प्राप्त हो गया।

सभी जानते हैं कि स्वर्ग या नरक कोई विशेष लोक नहीं है। शुभ कार्यों से परलोक सुधरता है, सद्गति होती है, सुख-लोक मिलता है अर्थात् अच्छे परिवार में जन्म होता है। सुख-लोक को ही स्वर्ग कहा जाता है। इस काल्पनिक कथा में जिस विषय पर प्रकाश डाला गया है, वह मनन और चिन्तन की प्रेरणा देता है।

सो पाण्डव स्वर्ग के द्वार पर जा पहुँचे।

स्वर्ग के अधिपति इन्द्र ने उनका सम्मान करते हुए कहा, ”धर्मराज! स्वर्ग में आपका स्वागत है।”

युधिष्ठिर-सहित जब पाण्डव आगे बढ़े तो वह कुत्ता भी उनके साथ था। इन्द्र ने कुत्ते को आगे बढ़ने से रोक दिया। चार पाण्डव आगे चले गये। युधिष्ठिर ने इन्द्र से कहा, ”देवराज! यह तो तब से ही हमारे साथ है जब हम राजपाट छोड़कर वन के लिए चले थे। इतने वर्षों तक हम तपस्या में रहे। यह भी सदा हमारे साथ रहा। अब तो यह एकाकी है। यह यहाँ से अकेला अब कहाँ जाएगा?”

देवराज कहने लगे, ”किन्तु धर्मराज! यह तो स्वर्ग में रहने का अधिकारी नहीं है। यह अधम है, तभी तो श्वान-योनि को प्राप्त हुआ है। इसे आप किस प्रकार अन्दर ले जाने की बात करते हैं?”

युधिष्ठिर बोले, ”देवराज! यदि यह अन्दर नहीं जा सकता तो मैं भी अन्दर नहीं जाऊँगा। मैं इसके साथ ही रहूँगा अथवा यह कि यह मेरे साथ ही रहेगा।”

देवराज दुविधा में पड़ गये। वे कुछ सोच नहीं पा रहे थे। तब युधिष्ठिर ने कहा, ”यह श्वान मेरे आश्रित है, आश्रित को छोड़कर मैं अकेला स्वर्ग नहीं जाऊँगा। हाँ, इसके लिए मैं अपने पुण्य अर्पित कर सकता हूँ।”

युधिष्ठिर का इतना महान त्याग देखकर देवराज इन्द्र मान गये और उन्होंने उस कुत्ते को भी उन्हें अपने साथ ले जाने की अनुमति दे दी।

आश्रय में आया निःसहाय जीव भी एक सम्बन्ध में बध जाता है अतः इस सम्बन्ध का भी धर्म पूर्वक निर्वहन जरूरी है !

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