श्री चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य तक लोगों ने इसकी विशेष सावधानी बरती

· January 27, 2016

kभारतवर्ष के प्राचीन ज्ञान, विज्ञान एवं इतिहास के विशिष्ट जानकार श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी बताते हैं कि प्राप्त अभिलेखों के अनुसार, प्राचीन भारत के महा यशस्वी सम्राट श्री चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के काल तक कर्म फल सिद्धान्त में लोगों का अखण्ड विश्वास था !

कर्मफल सिद्धान्त को इस उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है की जैसे आज के दौर में सबका यही जानना और मानना है की किसी एग्जाम (इम्तिहान, परीक्षा) में अच्छे नंबर तभी मिल सकते हैं जब ईमानदारी से पढाई की मेहनत की जाय !

ठीक इसी तरह श्री चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के ज़माने तक इस मान्यता का बहुत दिल से पालन किया जाता था की हमारे साथ अच्छा तभी होगा जब हम अच्छा काम करेंगे !

उस समय लोग इस बात पर पूर्ण विश्वास रखते थे की जो भी तकलीफ या बीमारी वो झेल रहे हैं तथा जिस भी सुख का आनन्द ले रहे हैं वो सब उनके खुद के ही इस जन्म या पूर्व जन्मो के कर्मों का फल हैं और इन फलों से वे पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं क्योंकि हर अच्छे बुरे कर्म का फल तो मिलना ही मिलना है इसलिए हर सम्भव कोशिश करते थे की उनसे कोई भी गलत काम ना होने पाय !

गुप्त काल तक, लोग पुनर्जन्म के सिद्धान्त को शाश्वत सत्य मानते थे क्योंकि वो इस सत्य को जानते थे की आत्मा भी परमात्मा की तरह अविनाशी और शाश्वत है इसलिए हर जीवात्मा ने अब तक अनन्त जन्म लिए हैं और आगे भी अनन्त जन्म लेगी ! इसलिए गुप्त काल तक किसी इंसान की कोई बड़ी इच्छा अगर उसके जीवन में पूर्ण नहीं हो पाती थी तो वो उस अधूरी इच्छा को अगले जन्म में पूर्ण करने के लिए इस जन्म में सत्कर्म करता था !

अय्याशी करने को अच्छा काम, आज के जमाने में माना जाता है और आज के अधिकाँश लोगों का बस यही उद्देश्य रहता है की बस जो जीवन मिला है उसमें जितना अधिक से अधिक हो सके एन्जॉय (मौज मस्ती) कर लेना चाहिए !

श्री चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के जमाने तक लोग अपनी इच्छा से ख़ुशी ख़ुशी अपने जीवन का कैरियर (भविष्य का व्यवसाय) तय करते थे ! जिस किसी को भी ज्ञान लेने और देने में रूचि रहती थी वह बड़ा होकर तपस्वी (ब्राह्मण) बनता था और जंगल के भयंकर और कठोर माहौल में रहकर ब्राह्मण धर्म (तप) का पालन करता था ! जिस किसी को देश की सुरक्षा की चिन्ता रहती थी वो बड़ा होकर सेना में भर्ती (क्षत्रीय) होता था ! जिसे धन व अन्न का उपार्जन कर देश के निर्माण व भरण पोषण कार्य में रूचि रहती थी वह बड़ा होकर वैश्य बनता था और जो बड़ा होकर दूसरों के लिए नौकरी चाकरी करना चाहता था वो कर्मचारी (शूद्र) बनता था !

उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, इनमे से कोई भी कैरियर बड़ा या छोटा, ऊँचा या नीचा नहीं माना जाता था क्योंकि ये सभी एक समाज के अति आवश्यक अंग थे जिन पर एक सुखी समाज की नीव टिकी रहती थी !

समय के साथ साथ इन नैतिक मूल्यों में गिरावट आती गयी और लोगो के मन में ये मान्यताएं धूमिल होती गयी की सिर्फ अच्छा करने से ही अच्छा होता है ! लोग अपने तुरन्त के छोटे छोटे फायदों के लिए भविष्य के बड़े नुकसान करने लगे !

धीरे धीरे काल के बढ़ते प्रवाह में लोगों ने इस सिद्धान्त को नकारना शुरू कर दिया जिसकी वजह से हजारों व्यक्तिगत, सामजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक नयी नयी समस्यायें पैदा होने लगी जो पहले इतने बड़े पैमाने पर नहीं हुआ करती थी !

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