लेख – संक्षिप्त समीक्षा – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· May 26, 2014

RamChandraShukla_243172अब तक जो कुछ लिखा गया उसमें जायसी की इन विशेषताओं और गुणों की ओर मुख्यत: ध्यान गया होगा –

(1) विशुद्ध प्रेममार्ग का विस्तृत प्रत्यक्षीकरण – लौकिक प्रेमपथ के त्याग, कष्टसहिष्णुता तथा विघ्नबाधाओं का चित्रण कर के कवि ने भगवत्प्रेम की उस साधना का स्वरूप दिखाया है जो मनुष्य की वृत्तियों को विश्व का पालन और रंजन करनेवाली उस परम वृत्ति में लीन कर सकती है।

 

(2) प्रेम की अत्यंत व्यापक और गूढ़ भावना – लौकिक प्रेम के उत्कर्ष द्वारा जायसी को भगवत्प्रेम की गंभीरता का निरूपण करना था इससे वियोगवर्णन में सारी सृष्टि वियोगिनी की अनुभूति में योग देती दिखाई गई है। जिस प्रेम का आलंबन इतना बड़ा है – अनंत और विश्वव्यापक है – उसके अनुरूप प्रेम की व्यंजना के लिए एक मनुष्य का क्षुद्र हृदय पर्याप्त नहीं जान पड़ता; इससे कहीं-कहीं वियोगिनी सारी सृष्टि के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई पड़ती है। उसकी ‘प्रेमपीर’ सारे विश्व की ‘प्रेमपीर’ सी लगती है।

 

(3) मर्मस्पर्शिनी भावव्यंजना – प्रेम या रति भाव के अतिरिक्त स्वामिभक्ति, वीरदर्प, पतिव्रत तथा और छोटे-छोटे भावों की व्यंजना अत्यंत स्वाभाविक और हृदयग्राही रूप में जायसी ने कराई है; जिससे उनके हृदय की उदात्त वृत्ति और कोमलता का परिचय मिलता है।

 

(4) प्रबंधसौष्ठव – पद्मावत की कथावस्तु का प्रवाह स्वाभाविक है। केवल कुतूहल उत्पन्न करने के लिए घटनाएँ इस प्रकार कहीं नहीं मोड़ी गई हैं जिससे बनावट या अलौकिकता प्रकट हो। किसी गुण का उत्कर्ष दिखाने के लिए भी घटना में अस्वाभाविकता जायसी ने नहीं आने दी है। दूसरी बात यह है कि वर्णन के लिए जायसी ने मनुष्यजीवन के मर्मस्पर्शी स्थलों को पहचान कर रखा है। परिणाम वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे संसार में दिखाई पड़ते हैं। कर्मफल के उपदेश के लिए उनकी योजना नहीं की गई है। पद्मावत में राघवचेतन ही का चरित्र खोटा दिखाया गया है; पर उसकी कोई दुर्गति कवि ने नहीं दिखाई। राघव का उतना ही वृत्तांत आया है जितने का घटनाओं को ‘कार्य’ की ओर अग्रसर करने में योग है।

 

(5) वर्णन की प्रचुरता – जायसी के वर्णन बहुत विस्तृत हैं – विशेषत: सिंहलद्वीप, नखशिख, भोज, बारहमासा, चढ़ाई और युद्ध के – जिनसे उनकी जानकारी और वस्तुपरिचय का अच्छा पता लगता है। कहीं तो इतनी वस्तुएँ गिनाई गई हैं कि जी ऊब जाता है।

 

(6) प्रस्तुत अप्रस्तुत का सुंदर समन्वय – पद्मावत की अन्योक्तियों और समासोक्तियों में प्रस्तुत अप्रस्तुत का जैसा सुंदर समन्वय देखा जाता है वैसा हिंदी के कम कवियों में पाया जाता है। अप्रस्तुत की व्यंजना के लिए जो प्रस्तुत वस्तुएँ काम में लाई गई हैं और प्रस्तुत की व्यंजना के लिए जो अप्रस्तुत वस्तुएँ सामने रखी गई हैं, वे आवश्यकतानुसार कहीं बोधवृत्ति में सहायक होती हैं और कहीं भावों के उद्दीपन में। योगसाधकों के मार्ग की जो व्यंजना चित्तौरगढ़ के प्रस्तुत वर्णन द्वारा कराई गई है, वह रोचक चाहे न हो पर ज्ञानप्रद अवश्य है। इसी प्रकार ‘कँवल जो बिगसा मानसर बिनु जल गएउ सुखाइ’ वाले दोहे में जो जल बिना सूखे कमल का अप्रस्तुत दृश्य सामने रखा गया है वह सौंदर्य की भावना के साथ-साथ दया और सहानुभूति के भाव को उद्दीप्त करता है।

 

(7) ठेठ अवधी का माधुर्य – जायसी ने संस्कृत के सुंदर पदों की सहायता के बिना ठेठ अवधी का भोला-भाला माधुर्य दिखाया है, इसका वर्णन पूर्व प्रकरण में आ चुका है।

 

जिस प्रकार जायसी के उपर्युक्त गुणों और विशेषताओं की ओर पाठक का ध्यान गए बिना नहीं रह सकता उसी प्रकार इन नीचे लिखे त्रुटियों की ओर भी –

 

(1) पुनरुक्ति – ‘पद्मावत’ में एक ही भाव, एक ही उपमा, कहीं-कहीं तो एक ही वाक्य में न जाने कितनी जगह और कितनी बार आई है। सूर और चाँद के जोड़े से तो शायद ही कोई पृष्ठ खाली मिले। पद्मावती के नखशिख का जो वर्णन सूए ने रत्नसेन से किया है, प्राय: वही राघवचेतन अलाउद्दीन के सामने दुहराता है। प्राय: वे उपमाएँ और उत्प्रेक्षाएँ फिर आई हैं; कुछ थोड़ी सी दूसरी हों तो हों। सूखे सरोवर के फटने का भाव तीन जगह लाया गया है। इसी प्रकार और बहुत-सी पुनरुक्तियाँ हैं जिनके कारण पाठकों को कभी- कभी विरक्ति हो जाती है।

 

(2) अरोचक और अनपेक्षित प्रसंगों का सन्निवेश – रत्नसेन पद्मावती समागम के वर्णन में राजा का रसायनी प्रलाप और शतरंज के मोहरों और चालों की बंदिश, नागमती पद्मावती विवाद के भीतर फूल पौधों के नामों की अनावश्यक योजना इसी प्रकार की है। सोलह श्रृंगार और बारह आभरणों का वर्णन तथा ज्योतिष का लंबा-चौड़ा यात्राविचार केवल जानकारी प्रकट करने के लिए जोड़े हुए जान पड़ते हैं। ये किसी काव्य के प्रकृत अंग कदापि नहीं हो सकते। पद्मिनी, चित्रिणी आदि चार प्रकार की स्त्रियों के वर्णन भी कामशास्‍त्र के ग्रंथ में ही उपयुक्त हो सकते हैं। काव्य कामशास्‍त्र नहीं है।

 

(3) वर्णनों में वस्तुनामावली का अरोचक विस्तार – रत्नसेन के विवाह और बादशाह की दावत के वर्णन में पकवानों और व्यंजनों की लंबी सूची, बगीचे के वर्णन में पौधों के नाम ही नाम, युद्ध यात्रा आदि के वर्णन में घोड़ों की जातियों की गिनती से पाठक का जी ऊबने लगता है। वर्णन का अर्थ गिनती नहीं है।

 

(4) अनुचितार्थत्व – कई जगह श्रृंगार के प्रसंग में नायक रत्नसेन रावण कहा गया है – ऐसा हिंदी के कुछ सूफी कवियों ने भी, शायद ‘रावण’ का अर्थ रमण करनेवाला मानकर, किया है। पर इस शब्द से ‘रुलानेवाले’ रावण की ओर ही ध्यान जाता है। रावण बड़ा भारी प्रतापी और शूरवीर रहा हो, पर मनोहर नायक के रूप में कवि परंपरा से उसकी प्रसिद्धि नहीं है। वह हीन और दुष्ट पात्र ही प्रसिद्ध है।

 

(5) न्यूनपदत्व – भाषा पर विचार करते समय विभक्तियों, कारकचिह्नों, संबंधवाचक सर्वनामों और अव्ययों के लोप के ऐसे उदाहरण दिए जा चुके हैं जिनके कारण अर्थ में गड़बड़ी होती है।

 

(6) च्युतसंस्कृति –

 

इसका एक उदाहरण दिया जाता है –

 

दसन देखि कै बीजु लजाना।

 

हिंदी में चरित्रकाव्य बहुत थोड़े हैं। व्रजभाषा में तो कोई ऐसा चरितकाव्य नहीं जिसने जनता के बीच प्रसिद्धि प्राप्त की हो। पुरानी हिंदी के पृथ्वीराजरासो, बीसलदेवरासो, हम्मीररासो आदि वीरगाथाओं के पीछे चरितकाव्य की परंपरा हमें अवधी भाषा में मिलती है। व्रजभाषा में केवल ब्रजवासीदास के व्रजविलास का कुछ प्रचार कृष्णभक्तों में हुआ, शेष रामरसायन आदि जो दो एक प्रबंधकाव्य लिखे गए वे जनता को कुछ भी आकर्षित न कर सके। केशव की रामचंद्रिका का काव्यप्रेमियों में आदर रहा पर इसमें प्रबंधकाव्य के वे गुण नहीं हैं जो होने चाहिए। चरितकाव्य में अवधी भाषा को ही सफलता हुई और अवधी साहित्य में हम जायसी के उच्च स्थान का अनुमान कर सकते हैं।

 

बिना किसी निर्दिष्ट विवेचनपद्धति के यों ही कवियों की श्रेणी बाँधना और एक कवि को दूसरे कवि से छोटा या बड़ा कहना हम एक बहुत भोंड़ी बात समझते हैं। जायसी के स्थान का निश्चय करने के लिए हमें चाहिए कि हम पहले अलग-अलग क्षेत्र निश्चित कर लें। सुभीते के लिए यहाँ हम हिंदी काव्य के दो ही क्षेत्रविभाग कर के चलते हैं – प्रबंध क्षेत्र और मुक्तक क्षेत्र। इन दोनों क्षेत्रों के भीतर भी कई उपविभाग हो सकते हैं। यहाँ मुक्तक क्षेत्र से कोई प्रयोजन नहीं जिसके अंतर्गत केशव, बिहारी, भूषण, देव, पद्माकर आदि कवि आते हैं। प्रबंध क्षेत्र के भीतर हम कह चुके हैं, दो काव्य सर्वश्रेष्ठ हैं – ‘रामचरितमानस’ और ‘पद्मावत’। दोनों में ‘रामचरितमानस’ का पद ऊँचा है, यह हम स्थान-स्थान पर दिखाते भी आए हैं और सबको स्वीकृत भी होगा। अत: समग्र प्रबंधक्षेत्र के विचार से हम कह सकते हैं कि प्रबंधक्षेत्र में जायसी का स्थान तुलसी से दूसरा है। और जीवनगाथा – और इस व्यवस्था के अनुसार रासो आदि को वीरगाथा के अंतर्गत, मृगावती, पद्मावती आदि को प्रेमगाथा के अंतर्गत तथा रामचरिमानस को जीवनगाथा के अंतर्गत रखते हैं तो प्रेमगाथा की परंपरा के भीतर (जिसमें कुतुबन, उसमान, नूरमुहम्मद आदि हैं) जायसी का नंबर सबसे ऊँचा ठहरता है। मृगावती, चंद्रावती, चित्रवली आदि को बहुत कम लोग जानते हैं, पर ‘पद्मावत’ हिंदी साहित्य का एक जगमगाता रत्न है।

 

यदि कोई इसके विचार का आग्रह करे कि प्रबंध और मुक्तक इन दो क्षेत्रों में कौन क्षेत्र अधिक महत्त्व का है, किस क्षेत्र में कवि की सहृदयता और भावुकता की पूरी परख हो सकती है, तो हम बार-बार वही बात कहेंगे जो गोस्वामी जी की आलोचना में कह आए हैं अर्थात् प्रबंध के भीतर आई हुई मानवजीवन की भिन्न-भिन्न दशाओं के साथ जो अपने हृदय का पूर्ण सामंजस्य दिखा सके वही पूरा और सच्चा कवि है। प्रबंध क्षेत्र में तुलसीदास जी का जो सर्वोच्च आसन है, उसका कारण यह है कि वीरता, प्रेम आदि जीवन का कोई एक ही पक्ष न ले कर उन्होंने संपूर्ण जीवन को लिया है और उसके भीतर आनेवाली अनेक दशाओं के प्रति अपनी गहरी अनुभूति का परिचय दिया है। जायसी का क्षेत्र तुलसी की अपेक्षा परिमित है पर प्रेमवेदना उनकी अत्यंत गूढ़ है।

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