लेख – चमत्कारवाद – (लेखक – रामचंद्र शुक्ल )

· April 16, 2014

RamChandraShukla_243172काव्य के संबंध में ‘चमत्कार’, ‘अनूठापन’ आदि शब्द बहुत दिनों से लाए जाते हैं। चमत्कार मनोरंजन की सामग्री है, इसमें संदेह नहीं। इससे जो लोग मनोरंजन को ही काव्य का लक्ष्य समझते हैं वे यदि कविता में चमत्कार ही ढूँढ़ा करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पर जो लोग इससे ऊँचा और गंभीर लक्ष्य समझते हैं वे चमत्कार मात्र को काव्य नहीं मान सकते। ‘चमत्कार’ से हमारा अभिप्राय यहाँ प्रस्तुत वस्तु के अद्भुतत्व या वैलक्षण्य से नहीं जो अद्भुत रस के आलम्बन से होता है। ‘चमत्कार’ से हमारा तात्पर्य उक्ति के चमत्कार से है जिसके अंतर्गत वर्णविन्यास की विशेषता (जैसे अनुप्रास में), शब्दों की क्रीड़ा (जैसे श्लेजष, यमक आदि में), वाक्य की वक्रता या वचनभंगी (जैसे काव्यार्थापत्ति, परिसंख्या, विरोधभास, असंगति इत्यादि में) तथा अप्रस्तुत वस्तुओं का अद्भुतत्व अथवा प्रस्तुत वस्तुओं के साथ उनके सादृश्य या संबंध की अनहोनी दूरारूढ़ कल्पना (जैसे उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि में) इत्यादि बातें आती हैं।

चमत्कार का प्रयोग भावुक कवि भी करते हैं, पर किसी भाव की अनुभूति को तीव्र करने के लिए। जिस रूप या मात्रा में भाव की स्थिति है उसी रूप और उसी मात्रा में उसकी व्यंजना के लिए प्राय: कवियों को व्यंजना का कुछ असामान्य ढंग पकड़ना पड़ता है। बातचीत में देखा जाता है कि कभी कभी हम किसी को मूर्ख न कहकर ‘बैल’ कह देते हैं। इसका मतलब यह है कि उसकी मूर्खता की जितनी गहरी भावना मन में है वह ‘मूर्ख’ शब्द से नहीं व्यक्त होती। इसी बात को देखकर कुछ लोगों ने यह निश्चय किया कि यही चमत्कार या उक्तिवैचित्रय ही काव्य का नित्य लक्षण है। इस निश्चय के अनुसार कोई वाक्य, चाहे वह कितना ही मर्मस्पर्शी हो, यदि उक्तिवैचित्रयशून्य है तो काव्य के अंतर्गत न होगा और कोई काव्य जिसमें किसी भाव या मनोविकार की व्यंजना कुछ भी न हो पर उक्तिवैचित्रय हो, वह खास काव्य कहा जायगा। उदाहरण के लिए पद्माकर का यह सीधा सादा वाक्य लीजिए-

 

”नैन नचाय कही मुसकाय ‘लला फिर आइयो खेलन होरी’।”

अथवा मंडन का यह सवैया लीजिए-

अलि ! हौं तो गई जमुना – जल को, सो कहा कहौं,वीर ! विपत्ति परी।

घहराय कै कारी घटा उनई , इतनेई में गागर सीस धरी॥

रपट्यो पग, घाट चढ्यो न गयो, कवि मंडन ह्नै कै बिहाल गिरी।

चिरजीवहु नन्द को बारो अरी, गहि बाँह गरीब ने ठाढ़ी करी॥

इसी प्रकार ठाकुर की यह अत्यंत स्वाभाविक वितर्क-व्यंजना देखिए-

वा निरमोहिनी रूप की रासि जऊ उर हेतु न ठानति ह्वैहै।

बारहि बार बिलोकि घरी घरी सूरति तौ पहिचानति ह्वैहै॥

ठाकुर या मन की परतीति है, जो पै सनेह न मानति ह्वैहै।

आवत हैं नित मेरे लिए, इतनौ तो बिसेष कै जानति ह्वैहै॥

 

मंडन ने प्रेमगोपन के जो वचन कहलाए हैं वे ऐसे ही हैं जैसे जल्दी में स्वभावत: मुँह से निकल पड़ते हैं। उनमें विदग्धता की अपेक्षा स्वाभाविकता कहीं अधिक झलक रही है। ठाकुर के सवैये में भी अपने प्रेम का परिचय देने के लिए आतुर नए प्रेमी के चित्त के वितर्क की बड़े सीधे सादे शब्दों में, बिना किसी वैचित्रय या लोकोत्तर चमत्कार के, व्यंजना की गई है। क्या कोई सहृदय वैचित्रय के अभाव के कारण कह सकता है कि इनमें काव्यतव्च नहीं है?

 

अब इनके सामने उन केवल चमत्कारवाली उक्तियों का विचार कीजिए जिनमें कहीं कोई कवि किसी राजा की कीर्ति की धवलता चारों ओर फैलती देख यह आशंका प्रकट करता है कि कहीं मेरी स्त्री के बाल भी सफेद न हो जायँ1 अथवा प्रभात होने पर कौवों के काँव काँव का कारण यह भय बताना है कि कालिमा या अंधकार का नाश करने में प्रवृत्त सूर्य कहीं उन्हें काला देख उनका भी नाश न कर दे।2 भोज प्रबंध तथा और सुभाषित संग्रहों में इस प्रकार की उक्तियाँ भरी पड़ी हैं। केशव की रामचन्द्रिका में पचीसों ऐसे पद्य हैं जिनमें अलंकारों की भद्दी भरती के चमत्कार के सिवा हृदय को स्पर्श करनेवाली या किसी भावना में मग्न करनेवाली कोई बात न मिलेगी। उदाहरण के लिए पताका और पंचवटी के ये वर्णन लीजिए-

 

1. यथा यथा भोजयशो विवर्धाते सितां त्रिलोकीमिव कर्तुमुद्यतम्।

तथा तथा मे हृदयं विदूयते प्रियालकावलिधावलत्वशंकया॥

-भोजप्रबंध, 76॥

2. देखिए पीछे, पृष्ठ 8।

पताका

अति सुंदर अतिसाधु । थिर न रहति पल आधु॥

परम तपोमय मानि। दंडधारिणी जानि॥

पंचवटी

बेर भयानक सो अति लगै। अर्क समूह जहाँ जगमगै॥

पांडव की प्रतिमा सम लेखौ। अर्जुन भीम महामति देखौ॥

है सुभगा सम दीपति पूरी। सिन्दुर औ तिलकावलि रूरी॥

राजति है यह ज्यों कुलकन्या । धाय विराजति है सँग धन्या॥

 

क्या कोई भावुक इन उक्तियों को शुद्ध काव्य कह सकता है? क्या वे उसके मर्म का स्पर्श कर सकती हैं?

 

ऊपर दिए अवतरणों में हम स्पष्ट देखते हैं कि किसी उक्ति की तह में उसके प्रवर्तक रूप में यदि कोई भाव या मार्मिक अन्तर्वृत्ति छिपी है तो चाहे वैचित्रय हो या न हो, काव्य की सरसता बराबर पाई जाएगी । पर यदि कोरा वैचित्रय या चमत्कार है तो थोड़ी देर के लिए कुछ कुतूहल या मनबहलाव चाहे हो जाय पर काव्य की लीन करनेवाली सरसता न पाई जाएगी । केवल कुतूहल तो बालवृत्ति है। कविता सुनना और तमाशा देखना एक ही बात नहीं है। यदि सब प्रकार की कविता में केवल आश्चर्य या कुतूहल का ही संचार मानें तब तो अलग अलग स्थायी भावों की रसरूप में अनुभूति और भिन्न भिन्न भावों के आश्रयों के साथ तादात्म्य का कहीं प्रयोजन ही नहीं रह जाता।

 

यह बात ठीक है कि हृदय पर जो प्रभाव पड़ता है, उसके मर्म का जो स्पर्श होता है, वह उक्ति ही के द्वारा। पर उक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह सदा विचित्र , अद्भुत या लोकोत्तर हो-ऐसी हो जो सुनने में नहीं आया करती या जिसमें बड़ी दूर की सूझ होती है। ऐसी उक्ति जिसे सुनते ही मन किसी भाव या मार्मिक भावना (जैसे प्रस्तुत वस्तु का सौंदर्य आदि) आदि में लीन होकर एकबारगी कथन के अनूठे ढंग, वर्णविन्यास या पद प्रयोग की विशेषता, दूर की सूझ, कवि की चातुरी या निपुणता इत्यादि का विचार करने लगे, वह काव्य नहीं, सूक्ति है। बहुत से लोग काव्य और सूक्ति को एक ही समझा करते हैं। पर इन दोनों का भेद सदा ध्याआन में रहना चाहिए। जो उक्ति हृदय में कोई भाव जागरित कर दे या उसे प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की मार्मिक भावना में लीन कर दे, वह तो है काव्य। जो उक्ति केवल कथन के ढंग के अनूठेपन, रचनावैचित्रय, चमत्कार, कवि के श्रम या निपुणता के विचार में ही प्रवृत्त करे, वह है सूक्ति।

 

यदि किसी उक्ति में रसात्मकता और चमत्कार दोनों हों तो प्रधानता का विचार करके सूक्ति या काव्य का निर्णय हो सकता है। जहाँ उक्ति में अनूठापन अधिक मात्रा में होने पर भी उसकी तह में रहनेवाला भाव आच्छन्न नहीं हो जाता वहाँ भी काव्य ही माना जायगा। जैसे, देव का यह सवैया लीजिए-

 

साँसन ही में समीर गयो अरु ऑंसुन ही सब नीर गयौ गरि।

तेज गयो गुन लै अपनौ अरु भूमि गई तन की तनुता करि॥

देव जियै मिलिबेई की आस कै, आसहु पास अकास रह्यो भरि।

जा दिन तें मुखफेरि हरै हँसि हेरि हियो जो लियो हरि जू हरि॥

 

सवैये का अर्थ यह है कि वियोग में उस नायिका के शरीर को संघटित करनेवाले पंचभूत धीरे धीरे निकलते जा रहे हैं। वायु दीर्घ नि:श्वासों के द्वारा निकल गई, जलतत्वव सारा ऑंसुओं ही ऑंसुओं में ढल गया, तेज भी न रह गया-शरीर की सारी दीप्ति या कांति जाती रही, पार्थिव तत्वओ के निकल जाने से शरीर भी क्षीण हो गया, अब तो उसके चारों ओर आकाश ही आकाश रह गया है-चारों ओर शून्य दिखाई पड़ रहा है। जिस दिन से श्रीकृष्ण ने उसकी ओर मुँह फेरकर ताका है और मंद मंद हँसकर उसके मन को हर लिया है उसी दिन से उसकी यह दशा है।

इस वर्णन में देवजी ने विरह की भिन्न-भिन्न दशाओं में चार भूतों के निकलने की बड़ी सटीक उद्भावना की है। आकाश का अस्तित्व भी बड़ी निपुणता से चरितार्थ किया है। यमक, अनुप्रास आदि भी हैं। सारांश यह कि उनकी उक्ति में एक पूरी सावयव कल्पना है, मजमून की पूरी बंदिश है। पूरा चमत्कार या अनूठापन है। पर इस चमत्कार के बीच में भी विरह वेदना स्पष्ट झलक रही है, उसकी चकाचौंधा में अदृश्य नहीं हो गई है। इसी प्रकार मतिराम के इस सवैये की पिछली दो पंक्तियों में वर्षा के रूपक का जो व्यंग्यचमत्कार है वह भाव सबलता के साथ अनूठे ढंग से गुंफित है-

 

दोऊ अनंद सो ऑंगन माँझ विराजैं असाढ़ की साँझ सुहाई।

प्यारी के बूझत और तिया को अचानक नाम लियो रसिकाई॥

आई उनै मुँह में हँसी, कोहि तिया पुनि चाप सी भौंह चढ़ाई।

ऑंखिन ते गिरे ऑंसू के बूँद, सुहास गयो उड़ि हंस की नाई॥

 

इसके विरूद्ध बिहारी की उन उक्तियों में जिनमें विरहिणी के शरीर के पास ले जाते ही शीशी का गुलाबजल सूख जाता है;1 उसके विरह-ताप की लपट के मारे माघ के महीने में भी पड़ोसियों का रहना कठिन हो जाता है,2 कृशता के कारण विरहिणी साँस खींचने के साथ दो चार हाथ पीछे और साँस छोड़ने के साथ दो चार

 

1. औंधाई सीसी सुलखि विरह बरति बिललात।

बीचही सूखि गुलाब गौ, छींटौ छुई न गात॥

2. आड़े दै आले बसन जाड़े हूँ की राति।

साहसु ककै सनेह बस सखी सबै ढिग जाति॥

 

हाथ आगे उड़ जाती है,1 अत्युक्ति का एक बड़ा तमाशा ही खड़ा किया गया है। कहाँ यह सब मजाक कहाँ विरहवेदना!

 

यह कहा जा चुका है कि उमड़ते हुए भाव की प्रेरणा से अकसर कथन के ढंग में कुछ वक्रता आ जाती है। ऐसी वक्रता काव्य की प्रक्रिया के भीतर रहती है। उसका अनूठापन भावविधान के बाहर की वस्तु नहीं। उदाहरण के लिए दासजी की ये विरहदशासूचक उक्तियाँ लीजिए-

 

अब तौ बिहारी के वे बानक गए री,

तेरी तन दुति केसर को नैन कसमीर भो।

श्रौन तुव बानी स्वाति बूँदन के चातक भे,

साँसन को भरिबो द्रुपदजा को चीर भो।

हिय को हरष मरु धरनि को नीर भो,

री! जियरो मनोभव सरन को तुनीर भो।

एरी ! बेगि करिकै मिलापु थिर थापु ,

न तौ आपु अब चहत अतनु को सरीर भो॥

ऐसी ही भाव प्रेरित वक्रता द्विजदेव की इस मनोहर उक्ति में है-

तू जो कही,! सँखि लोनो सरूप, सो मो अँखियान को लोनी गई लगि।

 

प्रेम के स्फुरण की विलक्षण अनुभूति नायिका को हो रही है-कभी ऑंसू आते हैं, कभी अपनी दशा पर आप अचरज होता है, कभी हलकी सी हँसी आ जाती है कि अच्छी बला मैंने मोल ली। इसी बीच अपनी अन्तरंग सखी को सामने पाकर किंचित् विनोदचातुरी की भी प्रवृत्ति होती है। ऐसी जटिल अन्तर्वृत्ति द्वारा प्रेरित उक्ति में विचित्रता आ ही जाती है। ऐसी चित्तवृत्तियों के अवसर घड़ी घड़ी नहीं आया करते। सूरदासजी का ‘भ्रमरगीत’ ऐसी भावप्रेरित वक्र उक्तियों से भरा पड़ा है।

 

उक्ति की वहीं तक की वचनभंगी या वक्रता के संबंध में हमसे कुंतकजी का ‘वक्रोक्ति: काव्यजीवितम्’ मानते बनता है, जहाँ तक कि वह भावानुमोदित हो या किसी मार्मिक अन्तवृत्ति से संबद्ध हो; उसके आगे नहीं। कुंतकजी की वक्रता बहुत व्यापक है जिसके अंतर्गत वे वाक्यवैचित्रय की वक्रता और वस्तुवैचित्रय की वक्रता दोनों लेते हैं। सालंकृत वक्रता के चमत्कार ही में वे काव्यत्व मानते हैं। योरप में भी आजकल क्रोचे के प्रभाव से एक प्रकार का वक्रोक्तिवाद जोर पर है। विलायती वक्रोक्तिवाद लक्षणाप्रधान है। लाक्षणिक चपलता और प्रगल्भता में ही, उक्ति के अनूठे स्वरूप में ही, बहुत से लोग वहाँ कविता मानने लगे हैं। उक्ति ही काव्य होती है, यह तो सिद्ध बात है। हमारे यहाँ भी व्यंजक वाक्य ही काव्य माना जाता है। अबप्रश्नउ

 

1. इत आवति चलि जाति उत चली छसातक हाथ।

चढ़ी हिंडोंरैं सै रहै लगी उसासनु साथ॥

 

यह है कि कैसी उक्ति, किस प्रकार की व्यंजना करनेवाला वाक्य। वक्रोक्तिवादी कहेंगे कि ऐसी उक्ति जिसमें कुछ वैचित्रय या चमत्कार हो, व्यंजना चाहे जिसकी हो, या किसी ठीक ठीक बात की न भी हो। पर जैसा कि हम कह चुके हैं, मनोरंजन मात्र काव्य का उद्देश्य माननेवाले उनकी इस बात का समर्थन करने में असमर्थ होंगे। वे किसी लक्षणा में उसका प्रयोजन अवश्य ढूँढ़ेंगे।

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