निबंध – चलिये गाँवों की ओर (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

· December 20, 2012

download (3)जिन्‍हें काम करना है, वे गाँवों की तरफ मुड़ें। शहरों में काम हो चुका। शहर के लोगों को उतनी तकलीफ भी नहीं। शहरों में देश की सच्‍ची आबादी रहती भी नहीं। देश भर में फैलते हुए छोटे-छोटे गाँवों के छोटे-छोटे झोंपड़े ही देश की सच्‍ची संतति के निवास स्‍थान हैं। उनके जगाने का अभी तक बहुत कम प्रयत्‍न हुआ है। इस वर्ष जब कि महात्‍मा गांधी देश की फूट और आपस की लड़ाई को मिटाने का प्रयत्‍न करेंगे, स्‍वराजी लोग कौंसिलों में अपनी युद्ध-कला दिखावेंगे, नेता लोग कौंसिल की मेंबरियों और सरकारी नौकरियों और अधिकरों के बँटवारे की चिंता में रत रहेंगे, तेज लोग सरकार से भिड़ने के उपाय को खोजते फिरेंगे, साधारण काम करने वालों को चाहिए कि इधर-उधर न भटकें, वे देश के गाँवों की छिपी हुयी शक्ति का संगठन करें। इस बात की शिकायत है कि बेलगाँव-कांग्रेस ने देश के सामने कोई ऐसा राजनीतिक काम नहीं रखा, जिसमें देश की बिखरी हुयी ताकतें लग जातीं, और जिसके करने से, हम अपने राजनैतिक क्षेत्र में आगे बढ़ सकते। नि:संदेह हमारे इस समय के काम में, कोई बात ऐसी नहीं है, जिसके आधार पर, हम सरकारी सत्‍ता से भिड़ सकें। परंतु देश का शासन देश के आदमियों के हाथों में न होने के कारण सरकारी सत्‍ता से हर समय भिड़े रहने की आवश्‍यकता होने पर भी, ऐसा कर सकना हर समय संभव नहीं है। हमारे पिछले तीन वर्ष इस सत्‍ता से लड़ाई लड़ने में कटे। साधारण दृष्टि से देखने वाला यह कहेगा कि हमारे हाथों में कुछ भी नहीं आया, परंतु बात ऐसी नहीं है। हम अपने क्षेत्र में, पहले से आज बहुत आगे बढ़े हुए हैं, सरकारी सत्‍ताधारियों को बहुत पीछे हटना पड़ा है। इस समय हमारा और आगे बढ़ सकना, इसलिए कठिन ही नहीं, असंभव-सा है कि हम आगे बहुत बढ़ आये हैं, हमने अपने पीछे की तैयारी अधूरी छोड़ रखी है। यदि हमारे पीछे पूरी तैयारी हो, तो हमें पीछे मुड़ना ही न पड़े। इस समय केवल आगे बढ़ने ही की धुन रखना भूल है। उसके लिए अधिक चटपटे और गरम साधनों की आवश्‍यकता समझना भ्रम है। नशे द्वारा शरीर में तेजी कब तक कायम रखी जा सकती है? इसके लिए तो शराब की बोतल की अपेक्षा पौष्टिक भोजन स्‍थायी रूप से अधिक हितकर होगा। नशे के प्रयोग से पहले जो क्षणिक तत्‍परता दिखायी देती है, वह तत्‍परता भी उसके बारम्‍बार प्रयोग से शेष नहीं रह जाती। आगे चलकर एक ऐसी अवस्‍था पहुँच जाती है, जबकि तेज से तेज नशा भी तेजी पैदा नहीं करता। देश की दशा इस समय कुछ ऐसी ही है। हमारी धारणा है कि इस समय उग्र से उग्र साधन भी हृदय को अधक काल तक लक्ष्‍य की ओर लगाये न रख सकेगा। हर तरह से आवश्‍यकता इसी बात की है कि तुरंत के लाभ का विचार त्‍याग करके दूर के लाभ की बात पर ध्‍यान दिया जाये और उसके लिए, अपनी शक्तियाँ भरपूर लगा दी जायें। गाँवों के लिए काम करना तुरंत लाभदायक सिद्ध न होगा, परंतु कुछ दिनों तक उसे कर लेने के बाद कार्यकर्ता देखेंगे कि वह कितना अधिक लाभदायक है और उसकेक कारण, हमारी कितनी अधिक शक्ति बढ़ गयी। यह खेद की बात है कि कांग्रेस ने गाँवों का कोई स्‍पष्‍ट कार्यक्रम तय नहीं किया। तो भी, प्रत्‍येक जिले और प्रांत के लोग अपनी जरूरत के अनुसार उसे सहज में तैयार कर सकते हैं। गाँवों में वाचनालय और पुस्‍तकालय स्‍थापित करके गाँव वालों को इस बात के जानने का मौका दिया जा सकता है कि दुनिया में क्‍या हो रहा है, दूसरे क्‍या कर रहे हैं और हमें क्‍या करना चाहिए? गाँवों में जमींदार और किसान और अन्‍य समुदायों को मिलाकर उन्‍हें इस योग्‍य बनाया जा सकता है कि वे मिलकर अन्‍यायों से अपनी रक्षा करें। एकता स्‍थापित करने के पश्‍चात् पंचायतें कायम हो सकती हैं, जिनमें गाँव की सब जातियों के प्रतिनिधि हों और जो अपने मामलों को अदालतों में न जाने दें। यदि पंचायतों से मामले तय होने लगें तो देहात वाले अदालत के बेजा खर्च की जे़रबारी से बच जायें। गाँवों में चर्खा चल सकता है और खद्दर बन सकता है। यदि वहाँ खद्दर बनने लगे, तो गाँव का पैसा गाँव में रहे और लोगों की खुशहाली बढ़े। गाँव वालों को अछूतों के साथ अच्‍छे व्‍यवहार करने की शिक्षा देने की आवश्‍यकता है। गाँवों के युवक स्‍वयंसेवक बनकर गाँवों की सेवा के लिए तैयार किए जा सकते हैं। गाँवों में मिल-जुलकर कुछ नये ढंग के साथ राष्‍ट्रीय और धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों के किये जाने की भी आवश्‍यकता है। इन कामों के लिए कुछ पैसे की आवश्‍यकता पड़ेगी। गाँव वाले गरीब हैं, किंतु यदि युक्ति से काम लिया जाये, तो अपने खर्च के लिए वे पैसे निकाल सकते हैं। घर-घर धर्म-घट रखा दिये जाएँ। रोज उसमें मुट्ठी भर अन्‍न या आटा छोड़ दिया जाये। हर पंद्रहवें दिन कार्यकर्ता धर्म-घट की आमदनी इकट्ठा करे। उसे बेच कर पैसे खरे कर लें। इस पैसे को अपनी कमेटी की राय से गाँव के संगठन के काम में लगावें। हमें आशा है कि गाँवों में काम करने की जरूरत पर देश का पूरा ध्‍यान जायेगा और लोग आगे की तैयारी के लिए गाँवों के संगठन के काम को इस समय अपना मुख्‍य काम समझेंगे।

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