नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 8 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

download (4)सप्तमांक

( स्थान-देवी के मन्दिर का निकटवर्ती उद्यान)

( महारानी रुक्मिणी अपनी अनामा और अनाभिधाना प्रभृति सखियों के साथ राक्षसों की कोट में मत्तगजगति से मन्द-मन्द जा रही हैं )

अनामा- सखी अनाभिधाने! देख! राजनन्दिनी की इस समय प्रेम की तरंगों में क्या गति हो रही है। यद्यपि वह चलने के लिए पैर आगे को डालती हैं पर वे पीछे ही को पड़ते हैं। घूँघट की ओट से नेत्रों की गति रुकी हुई है। परन्तु जल ऊपर आये हुए मत्स्य की भाँति कभी-कभी वे इधर-उधर दृष्टि डालने में नहीं चूकते हैं। प्राणनाथ के संयोग सुखानुभव की आशा, और माता-पितादि के वियोग भय और आशंका से सन्ध्या कालीन एवं प्रात: कालीनसरोज समान प्यारी का मुख कैसा प्रसन्न और मलीन हो रहा है। हृदय के अनन्त अभिलाष मयंक में से मरीचि समान कैसे बाहर निकले पड़ते हैं (इतस्तत: दृष्टिनिक्षेप)

अनामा- सखी! राजनन्दिनी के हृदय की आकुलता का व्योरा तो तभी ज्ञात हो गया, जब उन्होंने पूजा समय शिवप्रिया के अंगों में चन्दन लगाने के पलटे अपने अंगों में लगा लिया, और फूलों की माला उनके गले में डालने के बदले आप पहिन लिया।

श्रीरु.- सखी! अब तो प्राणप्यारे से मिलने के लिए एक-एक पल चतुर्युग समान जान पड़ता है। हृदय का भाव वैसा ही हो रहा है जैसा उषाकाल में चकवी का होता है। नेत्र कहने ही में नहीं हैं, जो गति दूज के चाँद देखने के लिए संसार की होती है, उससे बढ़कर इनकी दशा जीवनाधार के दर्शनों के लिए है। पर हाय! यह नहीं जान पड़ता कि प्रियतम के इतना विलम्ब करने का क्या कारण है?

अनामा- राजनन्दिनी! यदि वे आ ही जावेंगे तो क्या करेंगे? क्या इन सह्स्त्रश: मेघनाद समकक्षी योद्धाओं के मध्य से तुमको ले जा सकेंगे?

श्रीरु.- सखी! मृगराज को मृगों के झुण्ड में पैठकर क्या अपना भक्ष्य लेने में विलम्ब होता है।

अनामा- (दूर से देखकर) सखी अनामे! वह देख! वायु का निरादर करते, स्ववेग सम्मुख दिनेसरथ की गति निंदनीय बनाते, विजय की ध्वजा उड़ाते, घंट घंटिध्वनि से दिङ्मण्डल को पूरित करते, किसका रथ आ रहा है?

अनामा- सखी। इस विषय को राजनन्दिनी से पूछ! क्योंकि प्रियतम के आने का समय प्यारी भली-भाँति जानती हैं। सूर्य के चिद्दों को नलिनी अच्छी तरह पहचानती है।

श्रीरु.- सखी! परीक्षा लेने की कौन आवश्यकता है। प्राणनाथ त्याग और कौन हो सकता है।

अनामा- यह कैसे?

श्रीरु.- मेरा मन कहे देता है, क्योंकि कोकिला के हृदय में आनन्द का संचार वसंतागम बिना कब हुआ है?

अनामा- कौन जाने! वसंत का प्रिय मित्र काम ही तुमारे धर्म की परीक्षा लेने के लिए न आ रहा हो।

अनामा- क्या वह नहुष शची, और धर्म वृन्दा की कथा नहीं जानता जो महारानी सी पतिव्रता के समीप आने का साहस करेगा।

अनामा- सत्य है! (रथ की ओर देखती है) सखी! रथ अब समीप आ गया, इस कारण हृदय में युगपत आनन्द और खेद का संचार होने से मेरी गति साँप-छछूँदर की सी हो रही है।

(रथ पर चढ़े भगवान श्रीकृष्ण का प्रवेश)

अनामा- (भगवान की छवि देखकर) हाय! हाय!! इन नेत्रों से न ऐसा स्वरूप कभी देखा न कानों से सुना। भगवान का अंग-अंग कैसा सुडौल है, मुख की कैसी शोभा है, पुष्प में से सरसरंग समान भगवान के प्रतिअवयवों से कैसा माधुर्य झलक रहा है। सिर के मुकुट कानों के कुण्डल की कैसी छटा है। घुघुरारी अलकैं मन को कैसा खींचे लेती हैं। क्या अनंग जो अनंग है भगवान श्रीकृष्ण की उपमा के योग्य निश्चित हो सकता है? क्या रमाहृदयबल्लभ जिनकी चार बाँहें हैं, मनमोहन के स्वरूप समान कहे जा सकते हैं? क्या भगवान स्वयंभू जिनके चार मुख हैं, इन कुलभूषण के सम्मुख पटतर पाने के लिए खड़े हो सकते हैं? क्या उमाप्राणनाथ भगवान शिव जिन के सर्पादि आभूषण हैं, यदुवंशनायक की समता पा सकते हैं? कदापि नहीं? उनमें ऐसी कोमलता, ऐसा माधुर्य, ऐसा सौन्दर्य कहाँ? यह अलौकिक मनोहारिणी शक्ति कहाँ?

अनामा- सखी! सत्य है! भगवान की तिरछी चितवन, मंद मुसुकान, कमलदल सी ऑंखें, कीर सी नासिका, कपोतवत ग्रीवा, किस को नहीं ठगतीं, उनका यह लोकमोहन स्वरूप किस को नहीं भाता। अहा! सुकुमारता तो फिसली पड़ती है। रूप उछला जाता है। हाय! विधना ने ऐसा सुन्दर रूप देखने के लिए अनन्त ऑंखें क्यों नहीं बनाईं! और जो केवल दो ही ऑंखें बनाईं तो उन पर पलक क्यों लगाया!

सवैया

नहिं हेरि कै नैनन धीरे अहै वह साँवरो रूप लख्यो ई चहैं।

लखि के मुसुकान अनूपम को छन प्रानहूं पापी न चैन लहैं।

हरिऔध न है बस में हिय आपनी कौन पै याकी बिथा को कहैं।

तन की गति जो है अरी सजनी कहु कौन उपाय कै ताको सहैं।

श्रीरु.- (स्वगत) आहा! सखियों के प्राणनाथ का स्वरूप इस प्रकार वर्णन करने से मेरे हृदय का कैसा भाव हो गया, जो प्रेम सूक्ष्म रूप से हृदय स्थल में विराजमान था वह अब ऊष्मा से वायु समान कैसा बढ़ गया, हृदयबल्लभ से मिलने की अभिलाषा देखते-ही-देखते मत्स्यावतार की भाँति कैसी कई गुनी हो गयी। जिन नेत्रों ने प्रियतम की दर्शनाशा को इतने काल तक संवरण कर रखा था, वह अब जीवनाधार का स्वरूप देखने के लिए खंजन समान कितने चंचल हो रहे हैं। जिस हृदय ने इतने दिवस तक धर्य का अवलम्बन करके अपना धर्म निबाहा था, वह अब प्राण प्यारे से मिलने के लिए बुभुक्षित व्यक्ति की भाँति कैसा आकुल हो रहा है। किन्तु कोई चिन्ता नहीं, प्यासे के लिए सरोवर पास है, भूखे के लिए समस्त व्यंजन आगे रखा है। फिर अब विलम्ब ही क्या है? प्राप्त वस्तु के लिए मनोवेदना कैसी?

( महारानी नेत्र उठाकर एक बार भगवान की छवि अवलोकनोपरान्त घूँघट डाल लेती हैं , सामन्तगण उनका अलौकिक सौन्दर्य देखकर जड़वत हो जाते हैं , अस्त्र-शस्त्र हाथों से छूट पड़ता है)

श्रीकृ.- अहा! असमय अचानक भगवान रोहिणीनाथ के प्रकाशित होने का क्या कारण था। छि: क्या निशाकर का प्रकाश ऐसा हो सकता है जो भगवान दिवाकर के प्रकाश को भी अपने ओपसन्मुख फीका बना देवे? कदापि नहीं। फिर क्या कारण है कि जिस काल वह ओप प्रकटित हुआ, दिनमणि का प्रकाश मंद पड़ गया। आहा! समझ गया, वह प्राणप्यारी के मुख मयंक का अलौकिक प्रकाश था, जिसका यह लोकोत्तर चरित्र था, और जिससे मेरी हृत्कलिका का तत्काल विकास हो गया। काले-काले राक्षसों की कोट में मत्त कुंजरवरगमन से इस ओर आती हुई प्राणाधिका की कैसी शोभा है, कैसा अद्भुत सौन्दर्य है! कैसा अपूर्ण लावण्य है। क्या बूढ़े विधाता से कभी ऐसा सुन्दर स्वरूप रचा गया होगा, ना ऐसा जान पड़ता है कि भगवान कुसुमायुध ने अपनी मदोन्मत्तारमणी रति को लज्जित करने के लिए अपने कोमल हाथों से इस अनोखे स्वरूप को बनाया है। प्यारी के उन्नत भू्र, रसीले नैन, सहज सौन्दर्यनिवास आनन, कैसे स्पृहणीय हैं! कैसे मनोरजंक हैं! प्रिया ने मेरी ओर केवल स्वाभाविक दृष्टिपात किया है, पर क्या मेरा आनन्द रजनीपति के उस काल के उस प्रमोद से कुछ कम है, जब भगवान रमानाथ ने बृन्दारकछन्द को अमिय पान कराने उपरान्त उसका घड़ा उन पर ढाल दिया था, किन्तु यह भी भ्रम है, क्योंकि-

पद

प्रिया छबि केवल मोहि न भावै।

बिहग कीट पसुहूँ लखि तियछबि हिय प्रमोद उपजावै।

मानि पद्मिनी चंचरीककुल मोर तडित सम जानी।

चन्दन सम सुबास तन को अति अहिकुल कहँ सुखदानी।

मुखमयंक सम लखि चकोर अरु मृगगन मोद बढ़ावैं।

प्रिया सिया इक रूप जानि जिय साखा मृग सिर नावैं।

कमला गुनि कुंजर सुख पावत हरि गिरिजा अनुमानी।

हरिऔध प्रमुदित मरालकुल रहत भारती मानी।

अनामा- (रुक्मिणी को लज्जिता देखकर) राजनन्दिनी! अब अपने प्राणनाथ से अशंक मिलने के परिवर्तन में तुमारा संकोच करना ऐसा है, जैसा किसी को भोजन का निमन्त्रण देकर भूखा रखना, और समय पर उस का ध्यान बिल्कुल भूल जाना, राजकन्यके! अब तुम को योग्य है कि तुम लज्जा को तिलांजलि देकर अपने प्रियतम से ऐसे मिल जाओ, जैसे लक्ष्मी भगवान विष्णु से और भगवती भागीरथी अकूपार से मिली हैं।

अनामा- सत्य है। यद्यपि हम लोगों का हृदय तुमारे वियोग की असह्यता से उद्विग्न हो रहा है, शोकोच्छ्वास के प्राबल्य से कण्ठरुद्धप्राय: होने से वाक्य स्फुरण असम्भव हो गया है। तथापि अपनी उद्विग्नतानिवारण के लिए हम तुमको इस अवसर पर चूक जाने की सन्मति कदापि नहीं देंगी। अब यह समय ऐसा ही है कि तुम अपने जीवनाधार से वाक्य गिरा, जल बीचि, समान मिल जाओ। नहीं तो अवसर पर चूक जाने से पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा।

श्रीरु.- सत्य है। (स्वगत) प्राणनाथ! यद्यपि यह लोक प्रसिद्ध विषय है कि जो वस्तु बिना परिश्रम हस्तगत हो जाती है, उसका मान यथोचित दृष्टि में नहीं होता, प्रतिष्ठा भी उसकी सामान्य होती है, तथापि मैंने इसका अणु मात्र भी ध्यान नहीं किया, और इस क्षणस्थायी शरीर को विधिनिषेध के चरणों की सेवा के लिए आपको अर्पण किया, अब इसका मान, सम्मान, आदर सत्कार केवल आपकी विवेचना पर निर्भर है, यदि दयासागर स्वपवित्र गृहस्थ दासिका समान भी मुझ चरणाश्रिता का सम्मान करेंगे तो मैं अपने जीवन को चरितार्थ समझूँगी। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस काल स्त्रीजनोचित संकोच मध्य में पड़ कर कुछ बाधक हुआ चाहता था किन्तु आनन्द का विषय है कि आदरणीया सखियों के सदुपदेश द्वारा उत्त्तेजित प्रेम के सम्मुख वह कृतकार्य न हो सका। जीवन सर्वस्व! लीजे अब यह दासी तन मन से आप पर न्यौछावर होती है, इसके मान-अपमान चक्र की डोरी आपके करकमलों में सादर समर्पित है (महारानी रुक्मिणी भगवान से मिलने के लिए हाथ बढ़ाती हैं, भगवान रथ को बढ़ा बायें हाथ से राजनन्दिनी का हाथ पकड़ रथ पर बिठा रथ को द्वारका की ओर हाँक देते हैं)

(जवनिका पतन)

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