गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 28 (प्रलोभन का पतन)

· April 27, 2015

cropped-gayatribannerपं. पूजा मिश्र, ठोरी बाजार, लिखते हैं कि हमारे यहाँ एक बड़े प्रसिद्घ महात्मा हो गए हैं। इनका असली नाम तो मालूम नहीं, पर उनको परमहंस जी कहा जाता था। ये भूमिहार ब्राहम्ण थे। प्रारम्भ में तो इन्होंने त्रिवेणी जंगल में दोन नामक ग्राम के पास तपस्या की, फिर रागपुर के समीप नरायनी नदी के किनारे गुफा बनाकर कठोर तप करने लगे। हमारे गाँव में भी उनका पर्दापण हुआ था। उनका तप तेज बड़ा ही प्रकाशवान था। बड़े-बड़े उनके आगे झुकते थे। परमहंस जी का वाक्य सदा सफल होता था। उनके मुख से जो शाप वरदान निकला वह निष्फल न गया।

जिस जंगल में वे तपस्या करते थे, उसमें एक बार एक मुसलमान अफसर शिकार खेलने आया। महात्माजी ने उससे कहा यह तपोभूमि है, यह पशुपक्षी आनन्दपूर्वक विचारण करते हैं यहाँ शिकार न मारो, पर उसने उनकी बात न मानी। बन्दूक चला कर एक जानवर मार लिया। जानवर को घोड़े पर लाद कर वह अफसर नारायणी नदी को पार करने के लिए चला तो घोड़े ने बड़ी जोर से छलांग मारी और वह शिकारी तत्काल मर गया।

महात्माजी के शाप से ही यह मृत्यु हुई थी। परमहंस जी की हमारे पिता पं. देवीप्रसाद जी विशेष सेवा करते थे। उनकी सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर परमहंस जी ने उन्हें गायत्री की साधना बताई थी और आशीर्वाद दिया था कि तुम्हारी आर्थिक दुर्दशा मिट जायगी, उन दिनों हमारे परिवार की बड़ी शोचनीय दशा थी। हजारों रुपया कर्ज चढ़ा हुआ था गुजर मुश्किल से होती थी। पिता जी ने परमहंस जी के आदेशानुसार गायत्री साधना आरम्भ की, धीरे-धीरे सुधरने लगी। उनके पुण्य प्रताप से माता का अनुग्रह हमें भी प्राप्त हुआ।

खेती जैसे साधारण काम से हमें असाधारण लाभ होने लगा अब हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है। विशुद्घ कृषि की आमदनी से 20 हजार रुपये के करीब बैंक मे जमा हैं। घर पर भी पशु, जेवन, अन्न, नकदी आदि से संतोषकजनक हाल हैं। महात्मा जी की प्रशंसा चारों ओर फै ली तो उनके अनेक भक्त और शिष्य हो गये। आधिक खुशामदियों से घिरे रहने और अधिक सेवा पूजा होने से उनका मत सांसारिक प्रयोजनों में ललचा गया। अब वे अपनी गायत्री तपस्या की ओर कम ध्यान देने लगे और सांसारिक बातों में अधिक रुचि बढ़ा ली। उनने बेतिया रियासत के  अधिकारियों से कृषि करने के  लिए जमीन माँगी, याचना करते ही तुरन्त एक अच्छी जमीन मिल गई और ठाठ से खेती होने लगी।

खूब आमदनी होने  लगी। खेती तथा भेंट पूजा से काफी धन आने लगा। उनका पुराना सारा तप तेज नष्ट हो गया। अपने जीवन के उत्तरार्ध में वे एक ब्राहम्ण कियान मात्र रह गये थे। जंगल में रहना और अधिक धन का संचय, इस परिस्थिति में भी उनने अपनी रक्षा की व्यवस्था नही की। फलस्वरूप एक दिन कुछ डाकू चढ़ आये और उनकी बुरी तरह मार-पीट करके उनकी सारी कमाई लूट ले गये। चोटें काफी गहरी थीं। गोरखपुर अस्पताल में भर्ती किये गय, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई। गायत्री एक महान् शक्ति है।

वह तपश्चर्या से प्रापत होती है। तप हीन, स्वार्थी मनुष्य उसके महान् लाभों से वंचित रहते हैं। परमहंस जी जब तक तपोनिष्ठ रहे, तब तक उनका आत्मबल ऐसा रहा जो तत्काल प्रभाव दिखाता था। उनके शाप से शिकारी उफसर को जान से हाथ धोना पड़ा और और उनके आर्शीवाद से हमारा परिवार बराबर फलता-पुलता चला आ रनहा है। इतना होते हुए भी जब उन्होंने लोगों की खुशामद में तपश्चर्या की संचित पूँजी बाँटनी शुरु कर दी और कष्ट साध्य साधनाओं से मुँह मोडऩे लगे तो उनका शक्ति भण्डार समाप्त हो गया और मामूली चोर डाकू उनको मारपीट कर सब कुछ छीन ले गये।

इस उदाहरण से हर गायत्री प्रेमी को शिक्षा लेनी चाहिए कि वह अपना वास्तविक कल्याण चाहता है तो अपनी साधना सम्पत्ति को दिन बढ़ाता चले। संसारिक प्रयोजन में तपोबल को खर्च करते चलना और उसे बढ़ाने में आलस्य करना किसी भी साधक के लिए पतन का कारण बन सकता है। परमहंस जी के स्वर्गवास के कुछ दिन पश्चात् हमारे पिता का भी स्वर्गवास हो गया। वे मरते समय अपने बालकों को भली प्रकार समझा गये थे कि गायत्री की उपासना मत छोडऩा। माता का आँचल पकड़े रहोगे तो कभी भूखे नंगे न रहोगे। हम लोग पिताजी के आदेश का अक्षरश: पालन करते चले आ रहे हैं ओर सब दृष्टिïयों में शान्तिमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

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