गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 19 (सुसन्तति के लिए गायत्री साधना)

· April 13, 2015

cropped-gayatribannerश्री परमानन्द जी ढावर, पंढारी लिखते हैं कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन जिसका होगा उसमें सन्तानोत्पत्ति की स्वाभिव क्षमता होगी। शरीर या मन को रोगी होने के कारण ही सन्तानोपत्ति में बाधा पड़ती है।

चाहे विशेष रूप से कोई विशेष बीमारी न मालूम पड़े पर उत्पादक अंगों में कोई सूक्ष्म खराबी ऐसी हो सकती हे, जो प्रजनन शकित कुठित कर दे। आमतौर पर सन्तान न होने का दोष स्त्रियों पर ही थोपा जाता है, पर अनेक बार स्वस्थ दिखने वाले पुरुषों के उत्पादक तत्व इतने दूषित होते हैं कि उनसे सन्तानोत्पत्ति नहीं हो सकती।

गायत्री परम सात्विक शक्ति है। उसकी स्थापना शरीर में होने से एक अदृश्य रीति से शरीर के सूक्ष्म अंगों की शुद्घि आरम्भ हो जाती है। अनेक बार मानसिक गड़बड़ी का शरीर के गुप्त संस्थानों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। मृगी रोग अक्सर गर्भाशय में उत्पन्न होंने वाली दूषित वायु के कारण होता है।

जैसे शरीर दोष का मस्तिष्क् पर प्रभाव पड़ता है, वैसे ही मानसिक दोषों का प्रभाव शरीर पर पड़ता है कई बार क्रोधी, लोभी, लम्पट, ईर्ष्यालु, संशयी, स्वार्थी मनुष्यों के अन्तराल में ऐसी ग्रन्थियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जो सन्तान के मार्ग में रोड़ा सिद्घ होती हैं।

सात्विकता का आह्वन करने से गुप्त मन और सूक्ष्म शरीर में छिपी हुई बीमारियाँ और खराबियाँ शुद्घ होती हैं। गायत्री का अवलम्बन लेने से भातरी संस्थानों की सफई आरम्भ हो जाती है और वे बाधाएँ हट जाती हैं जो सन्तानोत्पत्ति में बाधक होती हैं।

प्राचीन साल में सन्तानहीनों को ऋषि लोग ऐसे ही उपाय बताते थे। राजा दलीप के सन्तान न होने पर अपनी धर्मपत्नी सहित वशिष्ठ जी के आश्रय में गौ-सेवा और आत्मिक साधना की थी।

राजा दशरथ ने सन्तान के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करके सन्तान पाई थी। इस प्रकार अगणिक व्यक्तियों को आम्कि उपायों से सन्तानें प्राप्त हुईं हैं। माता-पिता की गायत्री साधना का प्रभाव सन्तान पर अवश्य पड़ता है। अभिमन्यु ने माता के गर्भ में रहकर पिता से चक्रव्यूह विद्या सीख ली थी। इस प्रकार की न्यूनाधिक शक्ति सभी गर्भस्थ बालकों में होती है।

गर्भावस्था के दिनों में यदि माता-पिता गायत्री उपासना किया करें तो उसकी सन्तान अवश्य ही स्वस्थ, सुन्दर, दीर्घजीवी और बुद्घिमान होगी। हमारी कन्या छोटेपन से ही गायत्री उपासना करती है।

उसको दानों पुत्र चि. भगवती प्रसाद और चि. माताप्रसाद बड़े सौम्य प्रकृति के चतुर एवं सुन्दर शरीर के हैं। ऐसे अच्छे बालकों को पाकर सभी लोग बड़े पसन्न और सन्तुष्ट हैं। जन्म-पत्री बनाने वाले पंडित जी का कहना है कि दोनों ही बड़े भाग्यवान तथा पुरुषार्थी होंगे। कई बार पूर्व जन्मों के पापों के फलस्वरूप सन्तान नहीं होती। ऐसे पाप यदि साधारण हों तो उनका प्रायश्चित थोड़े से गायत्री तप द्वारा भी हो जाता है।

यदि पाप ऐसे हों जो कई जन्म तक दु:ख देने वाले हों तो एक जन्म की साधना से उन सबका प्रश्श्चित हो जाता है और अगले जन्म के लिए इस प्रकार बाधायें शेष नहीं रहतीं।

इस युग में बढ़ी हुई जनसंख्या के कारण संसार में भारी संकट आया हुआ है, इसलिये युग धर्म यह है कि सन्तान पैदा न की जाय या कम से कम हो। जिन्हें ईश्वर ने सन्तान नहीं दी है उन्हें आज के युग में अपने आपको परम सौभाग्यशाली समझना चाहिए और सन्तान के पालन-पोषण में जितना धन और समय लगना पड़ता उतना स्वास्थ्य साधन, स्वाध्याय, पुण्य, परमार्थ, सेवा या आत्म-कल्याण में लगाना चाहिए जिससे अपना वास्तविक हित साधन हो।

भगवान जिस पर प्रसन्न होते हैं कई बार उनहें भी सन्तानहीन रखते हें ताकि अनेक झंझटों से बचते हुऐ अपने जीवन का निर्द्वन्द होकर सदुपयोग कर सकें। फिर भी जिन्हें संतति सुख की अभिलाषा हो, अपने गर्भस्थ बच्चों को उत्तम बनाते की जो माता-पिता इच्छा रखते हों, उनहें गायत्री की श्रद्घापूर्वक साधन करनी चाहिए, परिणाम अवश्य ही आशाजनक होगा।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

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