गायत्री मन्त्र की सत्य चमत्कारी घटनाये – 16 (गायत्री के अनुग्रह का परिचय)

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cropped-gayatribannerश्री अम्बाशंक गोविन्द जी व्यास, जूनगढ़ ने लिखा है कि परिस्थितियोंवश में स्कूली शिक्षा बहुत ही कम प्राप्त कर सका। कक्षा चार उत्तीर्ण करने के बाद रोटी कमाने की चिन्ता हुई और 12 रुपया मासिक की नौकरी पर लग गया। बड़ा परिवार छोटी नौकरी, अल्प शिक्षा, सहायकों का अभाव, इस प्रकार की विपत्रताओं से घिरे होने पर कोई मार्ग न सूझता था, उस समय मैंने गायत्री माता का आश्रय लिया। भगवती का आंचल पकडऩे पर मुझे नया प्रकाश प्राप्त हुआ, नया मार्ग सूझा। मैंने कुछ अंग्रेजी सीखी, टेलीग्राफी सीखी, तारबाबू की परीक्षा दी और पास हो गया।
इतने पर भी रेलवे की नौकरी मिलना मेरे लिए कठिन था। सबसे बड़ी बाधा तो उस अंग्रेजी डाक्टर की थी जो रेलवे की नौकरी में बहुत अच्छे स्वास्थ के लोगों को लेने का कट्टर पक्षपाती था। वह कमजोर लोगों को हरगिज पास नहीं करता था। मेरा स्वास्थ्य पहले से ही दुर्बल था, उन दिनों तो मैं बीमारी से उठा था, इसलिये और भी कमजोर हो रहा था। घोर निराशा के वातावरण में मैंने भी एक तारबाबू की खाली जगह के लिये अर्जी दी। ऐसी 15 अर्जी और थीं। हम 16 उम्मीदवार डाक्टरी मुआइने के लिये पेश हुए।
मेजर हेन्स बहुत ही उग्र स्वभाव के थे, पक्षपात करना उनकी प्रकृति में ही न था। शेष सभी उम्मीदवार मुझसे स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छे थे। मैं मन ही मन माता का जप और ध्यान करने लगा। डाक्टर ने 15 उम्मीदवार नावास कर दिये और मुझे पूर्ण स्वस्थ होने और फिट होने का प्रमाण-पत्र दे दिया इस प्रमाण से हर कोई आश्चर्य-चकित था पर मैं जानता था कि माता की कृपा से दूनिया में सब कुछ सम्भव है। मुझे तारबाबू की नौकरी मिल गई। अंग्रेजी की भी योग्यता दिन-पर-दिन बढ़ती गई।मेरे ऊपर छोटे से लेकर बड़े अफसरों तक की विशेष कृपा रहती थी और समय-समय पर सभी का अनुग्रह प्राप्त होता रहता था।
इस प्रकार मैं उन्नति करते-करते स्टेशन मास्टर के पर पहुंच गया। एक बार मैं गार्ड के डिब्बे में से नीचे उतर रहा था तो रेल के तेज रफ्तार पकड़ लेने के कारण मैं बुरी तरह गिरा। टंकी के खम्भे से बुरी तरह टकराया। ठोकर खाकर फिर फुट बोर्ड पर ओंधे मुंह गिरा और उससे धक्का खाकर फिर पटरी पर गिर पड़ा। इस प्रकार की घटना घटित होने पर आमतौर से किसी का प्राण बचना कठिन है, पर गायत्री की कृपा से मैं कुछ घण्टे बेहोश रहकर और मामूली चोट खाकर ही अच्छा हो  गया। मेरे पिताजी गायत्री के परम भक्त थे। वे अन्तिम समय केवल चार दिन तक बहुत ही मामूली बीमार रहे थे।
मृत्यु से दो दिन पूर्व उन्होंनेपास बैठे हुए लोगों से कहा कि- देखो सामने वह कैसी सुन्दर लड़की खड़ी है और मुझ से कर रही है दो दिन बाद तुम मेरे घर चलना मैं भी उस समय मौजूद था। मैंने कहा यहां तो कोई लड़की नहीं है आपको व्यर्थ ही भ्रम हो रहा है। वे यह कहते हुए चुप हो गये कि इन्हें तुम नहीं देख सकते यह गायत्री माता है, मुझे तीसरे दिन इनके धाम को जाना है।
तीसरे दिन ब्रह मुहूर्त में गायत्री का जप करते-करते उनका शरीर शान्त हो गया। एक बार मैं 42 दिन के टाइफाइड से मरते-मरते बचा। डाक्टर जबाब दे चुके थे और श्वांस निकलने की प्रतीक्षा की जा रही थी, उस बेहोशी में ही माता ने मुझे दर्शन देकर अभयदान दिया और मृतक से जीवित हो गया। एक बार मेरी नौकरी छूट गई थी, पर कुछ समय बाद ही टेलीग्राफी शिक्षक के पर पर मेरी फिर नियुक्ति हो गई। ऐसे अनेकों अवसर मैंने अपने जीवन में देखे हैं जिनसे यह अटूट विश्वास हो गया कि गायत्री उपासक को सदैव सुख-शान्ति की ही प्राप्ति होती है।

सौजन्य – शांतिकुंज गायत्री परिवार, हरिद्वार

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