कहानी – भाग्य का फेर

· April 16, 2013

1images (3)गुणाढ्य राजा सातवाहन का मन्त्री था। भाग्य का ऐसा फेर कि उसने संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों भाषाओं का प्रयोग न करने की प्रतिज्ञा कर ली थी और विरक्त होकर वह विन्ध्यवासिनी के दर्शन करने विन्ध्य के वन में आ गया था।

विन्ध्यवासिनी ने उसे काणभूति के दर्शन करने का आदेश दिया। उसके साथ ही गुणाढ्य को भी पूर्वजन्म का स्मरण हो आया और वह काणभूति के पास आकर बोला, पुष्पदन्त ने जो बृहत्कथा तुम्हें सुनायी है, उसे मुझे भी सुना दो, जिससे मैं भी इस शाप से मुक्त होऊँ और तुम भी।

उसकी बात सुनकर काणभूति ने प्रसन्न होकर कहा, मैं तुम्हें बृहत्कथा तो अवश्य सुनाऊँगा पर पहले मैं तुम्हारे इस जन्म के वृत्तान्त को सुनना चाहता हूँ। काणभूति के अनुरोध पर गुणाढ्य ने अपनी कथा सुनायी, जो इस प्रकार थी –

प्रतिष्ठान प्रदेश में सुप्रतिष्ठित नाम का नगर है। वहाँ सोमशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहा करता था। उसके वत्स और गुल्म नामक दो पुत्र तथा श्रुतार्था नाम की एक कन्या थी। कालक्रम से सोमशर्मा और उसकी पत्नी दोनों का निधन हो गया। वत्स तथा गुल्म अपनी छोटी बहन का लालन पालन करते रहे। एक बार उन्हें पता चला कि उनकी बहन गर्भवती है। पूछने पर श्रुतार्था ने बताया कि नागराज वासुकि के भाई कीर्तिसेन ने एक बार उसे स्नान के लिए जाते देखा था और उन्होंने उसके ऊपर मुग्ध होकर उससे गान्धर्व विवाह कर लिया था। दोनों भाइयों ने कहा, इसका क्या प्रमाण है? श्रुतार्था ने नागकुमार का स्मरण किया। तुरन्त नागकुमार वहाँ प्रकट हो गया। उसने दोनों भाइयों से कहा, तुम्हारी यह बहन शापभ्रष्ट अप्सरा है और मैंने इससे विवाह किया है। इससे पुत्र उत्पन्न होगा, तब तुम दोनों की और इसकी शाप से मुक्ति हो जाएगी।

समय आने पर श्रुतार्था को पुत्र की प्राप्ति हुई। मैं (गुणाढ्य) वही पुत्र हूँ। मेरे जन्म के कुछ समय पश्चात् ही शाप से मुक्त हो जाने के कारण मेरी माता और फिर मेरे दोनों मामा भी चल बसे। मैं बच्चा ही था। फिर भी किसी तरह अपने शोक से उबरकर मैं विद्या की प्राप्ति के लिए दक्षिण की ओर चल दिया। दक्षिणापथ में रहकर मैंने सारी विद्याएँ प्राप्त कीं।

बहुत समय के बाद अपने शिष्यों के साथ उस सुप्रतिष्ठित नगर में लौटा तो मेरे गुणों के कारण वहाँ मेरी बड़ी प्रतिष्ठा हुई। राजा सातवाहन ने मुझे अपनी सभा में आमन्त्रित किया। मैं अपनी शिष्य मण्डली के साथ वहाँ गया। वहाँ भी मेरी बड़ी आवभगत हुई। राजा ने अपने मन्त्रियों से मेरी प्रशंसा सुनी तो उसने प्रसन्न होकर मुझे अपना एक मन्त्री नियुक्त कर दिया। वसन्त का समय था। राजा सातवाहन अपनी सुन्दर रानियों के साथ राजमहल की वापी (बावड़ी) में जलक्रीड़ा कर रहे थे। जिस तरह जल में उतरे श्रेष्ठ और मतवाले हाथी पर उसकी प्रेयसी हथिनियाँ अपनी सूँडों में जलभर कर पानी की फुहारें छोड़ती हैं, वैसे ही वे रानियाँ राजा के ऊपर पानी छींट रही थीं और राजा भी प्रसन्न होकर उन पर पानी के छींटे उछाल रहा था। एक रानी ने बार-बार अपने ऊपर पानी के तेज छींटे पड़ने से परेशान होकर राजा से कहा, मोदकैस्ताडय।

राजा ने इस संस्कृत वाक्य का अर्थ समझा कि मुझे मोदकों (लड्डुओं) से मारो और उसने तुरन्त अपने सेवकों को ढेर सारे लड्डू लाने का आदेश दिया। यह देख वह रानी हँस पड़ी और बोली, हे राजन्, यहाँ जलक्रीड़ा के समय लड्डुओं का क्या काम। मैंने तो यह कहा था कि मुझे उदक से मत मारो। आपको तो संस्कृत व्याकरण के सन्धि के नियम भी नहीं आते हैं, न आप किसी वाक्य का प्रकरण के अनुसार अर्थ ही लगा पाते हैं। वह रानी व्याकरण की पण्डित थी। उसने राजा को ऐसी ही खरी-खोटी सुना दी और बाकी लोग मुँह छिपाकर हँसने लगे। राजा तो लाज से गड़ गया। वह जल से चुपचाप बाहर निकला। तब से वह न किसी से बोले, न हँसे। उसने तय कर लिया कि या तो पाण्डित्य प्राप्त कर लूँगा या मर जाऊँगा। उस दिन राजा न किसी से मिला, न भोजन किया, न सोया। मन्त्री शर्ववर्मा ने मुझे बताया, महाराज की रानियों में वह जो विष्णु-शक्ति की बेटी है, वह बड़ी पण्डिता बनी फिरती है। उसने हमारे महाराज का अपमान कर दिया है। वैसे व्याकरण पढ़ने की और पण्डित बनने की तो उनकी इच्छा बहुत समय से है, अब रानी की बात और लग गयी है। अगले दिन मैं और शर्ववर्मा राजा से मिलने गये। राजा के सामने हम कुछ देर तक बैठे रहे। राजा कुछ भी न बोला।

मैंने पूछा, महाराज क्या बात है, अकारण आप उदास क्यों दिख रहे हैं? तब भी राजा ने कुछ उत्तर न दिया। तब शर्ववर्मा ने राजा को किस्सा सुनाते हुए कहा, महाराज, आज मैंने सपने में देखा कि एक कमल आकाश से गिरा, उसके साथ कोई देवकुमार प्रकट हुआ, उसने कमल को खिला दिया, कमल के खिलते ही उसमें से श्वेतवस्त्रधारिणी एक देवी निकली और वह सीधे आपके मुख में चली गयी। इतना देखा और मैं जाग गया। महाराज, अब मैं समझ गया। वह देवी वास्तव में सरस्वती थी, और उसने आपके मुख में वास करना आरम्भ कर दिया था – इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। शर्ववर्मा की गप्प सुनकर राजा थोड़ा-सा मुस्कराया। फिर बोला, मैं मूर्ख हूँ। विद्या के बिना मुझे यह लक्ष्मी अब बिलकुल भी नहीं भाती। तुम लोग बताओ कि कोई व्यक्ति परिश्रम करे, तो कितने समय में व्याकरण सीख सकता है? मैंने कहा, राजन्, व्याकरण तो सभी विद्याओं का दर्पण है। नियम है कि बारह वर्ष तक व्याकरण का अध्ययन नियमित करना चाहिए, तभी व्याकरण आता है।

पर मैं आपको छह वर्ष में व्याकरण का ज्ञान करा दूँगा। यह सुनते ही शर्ववर्मा डाह के साथ बोल पड़ा, हे महाराज, मैं आपको छह महीने में व्याकरण का ज्ञान करा दूँगा। मैंने कहा, राजन्, यह तो असम्भव है। यदि शर्ववर्मा छह महीने में आपको व्याकरण सिखा दे, तो मैं संस्कृत, प्राकृत और देशी भाषा तीनों का त्याग कर दूँगा। शर्ववर्मा बोला, और मैं ऐसा न कर पाया, तो बारह वर्ष तक तुम्हारी पादुकाएँ माथे पर धारण करूँगा। स्वामी कुमार की कृपा से प्राप्त कातन्त्र व्याकरण के सहारे शर्ववर्मा ने राजा को छह महीने में विद्याओं में पारंगत बना दिया। सारे राष्ट्र में उत्सव मनाया गया। घर-घर पर पताकाएँ फहरा रही थीं। राजा ने अपार धन-सम्पदा देकर शर्ववर्मा की पूजा की और उसे नर्मदा के तट पर भृगुकच्छ (भड़ौच) देश का राजा बना दिया। विष्णुशक्ति की पुत्री जिस रानी के कहने पर राजा को विद्याभ्यास की लगन लगी थी, उसे राजा ने अपनी पटरानी बना लिया। मैंने भी तीनों भाषाएँ छोड़कर मौन धारण कर लिया और फिर विन्ध्यवासिनी के दर्शन करने निकल पड़ा।

देवी विन्ध्यवासिनी के कहने पर ही मैं तुमसे मिलने आया हूँ। विन्ध्य के वन में रहकर वहाँ के पुलिन्दों से मैंने यह पिशाच भाषा सीखी है, जिसमें मैं अब बोल रहा हूँ। अब तुम मुझे बृहत्कथा सुनाओ, जिसे मैं इसी पैशाची भाषा में लिखूँगा। उसके बाद मेरी शापमुक्ति हो जाएगी। गुणाढ्य के द्वारा इस प्रकार अपनी कथा सुनाने पर काणभूति ने भी उसे वररुचि से सुनी हुई बृहत्कथा सुनायी। गुणाढ्य ने उस बृहत्कथा को सात वर्षों में सात लाख छन्दों में पैशाची (प्राकृत) में लिखा। उस घोर वन में स्याही न मिलने के कारण मनस्वी गुणाढ्य ने अपने रक्त से ही वह विशाल कथा लिख डाली। लिखते-लिखते जब वह अपनी कथा पढ़ने लगता, तो सुनने के लिए सिद्ध विद्याधरों का जमघट आकाश में लग जाता। इस प्रकार गुणाढ्य की पूरी कथा लिखी गयी, उस महाकथा को काणभूति ने सुना और गुणाढ्यकृत बृहत्कथाग्रन्थ को देखा।

सुनकर और देखकर वह शाप से मुक्त हो गया। उसके साथ रहने वाले पिशाच भी उस कथा को सुनकर दिव्यलोक में पहुँच गये। अब गुणाढ्य ने सोचा-देवी पार्वती ने मेरी शापमुक्ति का उपाय बताते हुए कहा था कि मुझे इस कथा का प्रचार करना होगा। तो मैं इसके प्रचार के लिए क्या करूँ, इसे किसको अर्पित करूँ? गुणदेव और नन्दिदेव ये दो शिष्य गुणाढ्य के साथ थे। वे उससे बोले, इस महान काव्य को अर्पित करने के लिए राजा सातवाहन से बढ़कर और दूसरा उचित पात्र कौन हो सकता है। जैसे वायु एक झकोरे में फूल की सुगन्ध को दूर-दूर तक फैला देता है, ऐसे ही वे इस कथा का प्रसार करेंगे। गुणाढ्य को भी यह सुझाव पसन्द आया।

वह अपने शिष्यों को लेकर प्रतिष्ठानपुर की ओर चल पड़ा। नगर में पहुँचकर गुणाढ्य तो नगर के बाहर एक बगीचे में टिक गया और अपने शिष्यों को राजा के पास भेजा। शिष्यों ने राजा सातवाहन को बृहत्कथा की पुस्तक बताते हुए कहा कि यह गुणाढ्य की कृति है। राजा ने उस पुस्तक का वृत्तान्त सुनकर कहा, एक तो सात लाख श्लोकों में इतना लम्बा यह पोथा है, तिस पर नीरस पिशाच भाषा में लिखा हुआ और लिखावट मनुष्य के रक्त से की गयी है। धिक्कार है ऐसी कथा को। दोनों शिष्य चुपचाप पुस्तक उठाकर गुणाढ्य के पास लौट आये और अपने गुरु को राजा के व्यवहार की बात जस की तस बता दी। यह सब सुनकर गुणाढ्य बहुत खिन्न हुआ। वह उस बगीचे के पास ही एक ऊँची चट्टान पर बैठ गया तथा चट्टान के नीचे उसने एक अग्निकुण्ड बनवाया। जब अग्निकुण्ड में आग दहकने लगी।

तो गुणाढ्य ने अपनी बृहत्कथा पढ़ना आरम्भ किया। शिष्य आँखों में आँसू भरकर यह दृश्य देखते रहे। गुणाढ्य आसपास के वन में रहने वाले मृगों और पशु-पक्षियों को कथा सुनाते हुए एक-एक पन्ना आग में झोंकने लगा। वह कथा सुनाता जाता और सुनाये हुए भाग के पन्ने एक-एक कर जलाता जाता। वन के पशुओं और पक्षियों ने आहार त्याग दिया। वे गुणाढ्य के आस-पास स्तब्ध होकर आँखों में आँसू भर कर बृहत्कथा सुनते रहे। इस बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यों ने परीक्षा करके बताया, सूखा मांस खाने से राजा को रोग लग गया है। पाकशाला के रसोइयों को बुलाकर डाँटा गया, तो उन्होंने कहा, इसमें हमारा क्या दोष? बहेलियों से जैसा मांस हमें मिलता है,

वैसा हम पकाते हैं। बहेलियों को बुलाकर पूछा गया, तो उन्होंने बताया, नगर के पास ही पहाड़ की चोटी पर एक ब्राह्मण बैठा हुआ है। वह पोथी का एक-एक पन्ना पढ़ता जाता है और आग में फेंकता जाता है। वन के सारे प्राणी इकट्ठे होकर निराहार रहकर उसकी कथा को सुन रहे हैं। इसलिए उनका मांस ऐसा हो गया है। राजा को इस बात का पता चला, तो उसे बड़ा कौतूहल हुआ। वह उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ गुणाढ्य अपनी कथा सुना रहा था। इतने समय से वन में रहने के कारण गुणाढ्य की देह पर जटाएँ बढ़कर लटक आयी थीं, मानो कुछ शेष बचे शाप के धुएँ की लकीरों ने उसे घेर रखा हो। आँसू बहाते शान्त बैठे पशुओं और पक्षियों के बीच गुणाढ्य कथा पढ़ रहा था।

राजा ने उसे पहचाना, प्रणाम किया और सारा वृत्तान्त पूछा। यह जानकर कि गुणाढ्य वास्तव में शिव के गण माल्यवान का अवतार है, राजा उसके चरणों पर गिर पड़ा और शिव के मुख से निकली उस दिव्य कथा को माँगने लगा। गुणाढ्य ने कहा, राजन्, एक-एक लाख श्लोकों के सात खण्डों वाले इस ग्रन्थ के छह लाख श्लोक मैं जला चुका। एक लाख श्लोकों का यह अन्तिम सातवाँ खण्ड बचा है, जिसमें राजा नरवाहनदत्त की कथा है। इसे ले जाओ। यह कहकर बृहत्कथा का शेष भाग राजा सातवाहन को सौंपकर गुणाढ्य ने उससे और अपने शिष्यों से विदा ली और योग से अपना देह त्यागकर शापमुक्त होकर पूर्वपद को प्राप्त किया। राजा सातवाहन बृहत्कथा की बची हुई पोथी लेकर नगर आया। उसने गुणाढ्य के शिष्यों गुणदेव और नन्दिदेव का मान-सम्मान करके उनकी सहायता से बृहत्कथा का अपनी भाषा में अनुवाद कराया और इस कथापीठ की रचना की। फिर तो यह कथा प्रतिष्ठानपुर में और उसके पश्चात् सारे भूमण्डल में प्रसिद्ध होती चली गयी।

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