कविता – राजा-गजपति-संवाद खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

· February 18, 2015

RamChandraShukla_243172मासेक लाग चलत तेहि वाटा । उतरे जाइ समुद के घाटा॥

रतनसेन भा जोगी जती । सुनि भेंटै आवा गजपती॥

 

जोगी आपु, कटक सब चेला। कौन दीप कहँ चाहहिं खेला॥

 

”आए भलेहि, मया अब कीजै । पहुनाई कहँ आयसु दीजै”॥

 

”सुनहु गजपती उतर हमारा । हम्ह तुम्ह एकै, भाव निनारा”॥

 

नेवतहु तेहि नहिं जेहि यह भाऊ। जो निहचै तेहि लाउ नसाऊ॥

 

इहै बहुत जौ बोहित पावौं । तुम्ह तैं सिंघलदीप सिधाावौं॥

 

”जहाँ मोहि निजु जाना, कटक होउँ लेइ पार।

 

जौं रे जिऔं तौ बहुरौं, मरौं तो ओहि के बार” ॥1॥

 

गजपति कहा ”सीस पर माँगा। बोहित नाव न होइहि खाँगा”॥

 

ए सब देउँ आनि नव गढ़े । फूल सोइ जो महिसुर चढ़े॥

 

पै गोसाइँ सन एक बिनाती । मारग कठिन जाब केहि भाँती॥

 

सात समुद्र असूझ अपारा । मारहिं मगर मच्छ घरियारा॥

 

उठै लहरि नहिं जाइ सँभारी। भागिहि कोइ निबहै बैपारी॥

 

तुम सुखिया अपने घर राजा । जोखिउँ एत सहहु केहि काजा॥

 

सिंघलदीप जाइ सो कोई। हाथ लिए आपन जिउ होई॥

 

खार, खीर, जल, दधिा, उदधिा, सुर, किलकिला अकूत।

 

को चढ़ि नाँघै समुद ए, है काकर अस बूत?॥2॥

 

”गजपति यह मन सकती सीऊ। पै जेहि पेम कहाँ नहिं जीऊ”॥

 

जो पहिले सिर दै पगु धारई। मूए केर मीचु का करई?॥

 

सुख त्यागा, दुख साँभर लीन्हा । तब पयान सिंघल मुहँ कीन्हा॥

 

भौंरा जान कबँल कै प्रीती । जहि पहँ बिथा पेम कै बीती॥

 

औ जैइ समुद पेम कर देखा । तेइ एहि समुद बूँद करि लेखा॥

 

सात समुद सत कीन्ह सँभारू। जौं धारती, का गरुअ पहारू?॥

 

जौ पै जीउ बाँधा सत बेरा । बरु जिउ जाइ फिरै नहिं फेरा॥

 

रंगनाथ हौं जा कर, हाथ ओहि के नाथ।

 

गहे नाथ सो खैंचै, फेरे फिरै न माथ॥3॥

 

पेम समुद जो अति अवगाहा । जहाँ न बार न पार न थाहा॥

 

जो एहि खीर समुद महँ परे। जीउ गँवाइ हंस होइ तरे॥

 

हौं पदमावति कर भिखमंगा । दीठि न आव समुद औ गंगा॥

 

जेहि कारन गिउ काथरि कंथा। जहाँ सो मिलै जावँ तेहि पंथा॥

 

अब एहि समुद परेउँ होइ मरा । मुए केर पानी का करा?॥

 

मर होइ बहा कतहु लेइ जाऊ। आहि के पंथ कोउ धारि खाऊ॥

 

अस मैं जानि समुद महँ परऊँ । जौ कोइ खाइ बेगि निसतरऊँ॥

 

सरग सीस, धार धारती, हिया सो पेम समुंद॥

 

नैन कौड़िया होइ रहे, लेइ लेइ उठहिं सो बुँद ॥4॥

 

कठिन वियोग जाग दुख दाहू। जरतहि मरतहि ओर निबाहू॥

 

डर लज्जा तहँ दुवौ गवाँनी। देखै किछु न आग नहिं पानी॥

 

आगि देखि वह आगे धाावा । पानि देखि तेहि सौंह धाँसावा॥

 

अस बाउर न बुझाए बूझा । जेहि पथ जाइ नीक सो सूझा॥

 

मगरमच्छ डर हिये न लेखा । आपुहि चहै पार भा देखा॥

 

औ न खाहि ओहि सिंघ सदूरा । काठहु चाहि अधिाक सो झूरा॥

 

काया माया संग न आथी । जेहि जिउ सौंपा सोई साथी॥

 

जो किछु दरब अहा सँग, दान दीन्ह संसार।

 

ना जानी केहि सत सेंती, दैव उतारै पार॥5॥

 

धानि जीवन औ ताकर हीया । ऊँच जगत मह जाकर दीया॥

 

दिया सो जप तप सब उपराहीं । दिया बराबर जग किछु नाहीं॥

 

एक दिया ते दसगुन लहा । दिया देखि सब जग मुख चहा॥

 

दिया करै आगे उजियारा । जहाँ न दिया तहाँ ऍंधिायारा॥

 

दिया मँदिर निसि करै ऍंजोरा । दिया नाहिं घर मूसहिं चोरा॥

 

हातिम करन दिया जो सिखा । दिया रहा धार्मन्ह महँ लिखा॥

 

दिया सो काजु दुवौ जग आवा । इहाँ जो दिया उहाँ सब पावा॥

 

”निरमल पंथ कीन्ह तेइ, जेइ रे दिया किछु हाथ।

 

किछु न कोइ लेइ जाइहि, दिया जाइ पै साथ” ॥6॥

 

(1) गजपति=कलिंग के राजाओं की पुरानी उपाधिा जो अब तक विजयानगरम् (ईजा नगर) के राजाओं के नाम के साथ देखी जाती है। खेला चाहहिं=मन की मौज में जाना चाहते हैं। लाउ=लाव, लगाव, प्रेम।

 

(2) सीस पर माँगा=आपकी माँग या आज्ञा सिर पर है। खाँगा=कमी। किलकिला=एक समुद्र का नाम। अकूत=अपार। बूत=बूता, बल।

 

(3) यह मन…सीऊ=यह मन शक्ति की सीमा है। साँभर=संबल, राह का कलेवा। बेरा=नाव का बेड़ा। रंगनाथ हौं=रंग या प्रेम में। जोगी हूँ-जिसका नाथ=नकेल, रस्सी। माथ=सिर या रुख तथा नाव का अग्रभाग।

 

(4) हंस = (क) शुध्द आत्मस्वरूप, (ख) उज्ज्वल हंस। मर=मरा, मृतक। कौड़िया=कौड़िल्ला नाम का पक्षी जो पानी में से मछली पकड़कर फिर ऊपर उड़ने लगता है।

 

(5) सदूरा=शार्दूल, एक प्रकार का सिंह। आथी=अस्ति, है। सेंती=से।

 

(6) दीया=(क) दिया हुआ, दान (ख) दीपक।

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