कविता – मानसरोदक खंड – पदमावत – मलिक मुहम्मद जायसी – (संपादन – रामचंद्र शुक्ल )

· March 31, 2014

RamChandraShukla_243172एक दिवस पून्यो तिथि आई । मानसरोदक चली नहाई॥

पदमावति सब सखी बुलाई । जनु फुलवारि सबै चलि आई॥

 

कोइ चंपा कोइ कुंद सहेली । कोइ सु केत, करना, रस बेली॥

 

कोइ सु गुलाल सुदरसन राती । कोइ सोबकावरि-बकुचन भाँती॥

 

कोइ सु मौलसिरि, पुहपावती । कोइ जाही जूही सेवती॥

 

कोई सोनजरद, कोइ केसर । कोइ सिंगारहार नागेसर॥

 

कोइ कूजा सदबर्ग चमेली । कोई कदम सुरस रस बेली॥

 

चलीं सबै मालति सँग, फूलीं कवँल कुमोद।

 

बेधिा रहे गन गंधारब, बासपरमदामोद॥1॥

 

खेलत मानसरोवर गईं । जाइ पाल पर ठाढ़ी भईं॥

 

देखि सरोवर हँसैं कुलेली । पदमावति सौं कहहिं सहेली॥

 

ए रानी! मन देखु बिचारी । एहि नैहर रहना दिन चारी॥

 

जौ लगि अहै पिता कर राजू । खेलि लेहु जो खेलहु आजू॥

 

पुनि सासुर हम गवनब काली । कित हम, कित यह सरवर पाली॥

 

कित आवन पुनि अपने हाथा । कित मिलि कै खेलब एक साथा॥

 

सासु ननद बोलिन्ह जिउ लेहीं । दारुन ससुर न निसरै देहीं॥

 

पिउ पियार सिर ऊपर, पुनि सो करै दहुँ काह।

 

दहुँ सुख राखै की दुख, दहुँ कस जनम निबाह॥2॥

 

मिलहिं रहसि सब चढ़हिं हिंडोरी । झूलि लेहिं सुख बारी भोरी॥

 

झूलि लेहु नैहर जब ताईं । फिरि नहिं झूलन देइहिं साईं॥

 

पुनि सासुर लेइ राखिहि तहाँ । नैहर चाह न पाउब जहाँ॥

 

कित यह धाूप, कहाँ यह छाहाँ । रहब सखी बिनु मंदिर माहाँ॥

 

गुन पूछिहि और लाइहि दोखू । कौन उतर पाउब तहँ मोखू॥

 

सासु ननद के भौंह सिकोरे । रहब सँकोचि दुवौ कर जोरे॥

 

कित यह रहसि जो आउब करना । ससुरेइ अंत जनम दुख भरना॥

 

कित नैहर पुनि आउब, कित ससुरे यह खेल।

 

आपु आपु कहँ होइहि परब पंखि जस डेल॥3॥

 

सरवर तीर पदमिनी आई । खोंपा छोरि केस मुकलाई॥

 

ससिमुख, अंग मलयगिरि बासा । नागिन झाँपि लीन्ह चहुँ पासा॥

 

ओनई घटा परी जग छाहाँ । ससि कै सरन लीन्ह जनु राहाँ॥

 

छपि गै दिनहिं भानु कै दसा । लेइ निसि नखत चाँद परगसा॥

 

भूलि चकोर दीठि मुख लावा । मेघघटा महँ चंद देखावा॥

 

दसन दामिनी, कोकिल भाखी । भौंहैं धानुख गगन लेइ राखी॥

 

नैन ख्रजन दुइ केलि करेहीं । कुच नारँग मधाुकर रस लेहीं॥

 

सरवर रूप बिमोहा, हिये हिलोरहि लेइ।

 

पाँव छुवै मकु पावौं एहि मिस लहरहि देइ॥4॥

 

धारी तीर सब कंचुकि सारी । सरवर महँ पैठीं सब बारी॥

 

पाइ नीर जानौं सब बेली । हुलसहिं करहिं काम कै केली॥

 

करिल केस बिसहर बिस-भरे । लहरैं लेहिं कवँल मुख धारे॥

 

नवल बसंत सँवारी करी । होइ प्रगट जानहु रस भरी॥

 

उठी कोंप जस दारिवँ दाखा । भई उनंत पेम कै साखा।

 

सरिवर नहिं समाइ संसारा । चाँद नहाइ पैठ लेइ तारा॥

 

घनि सो नीर ससि तरई उईं । अब कित दीठ कमल औ कूईं॥

 

चकई बिछुरि पुकारै, कहाँ मिलौं, हो नाहँ।

 

एक चाँद निसि सरग महँ, दिन दूसर जल माहँ॥5॥

 

लागीं केलि करै मझ नीरा । हंस लजाइ बैठ ओहि तीरा॥

 

पदमावति कौतुक कहँ राखी । तुम ससि होहु तराइन्ह साखी॥

 

बादमेलि कै खेल पसारा । हार देह जो खेलत हारा॥

 

सँवरिहि साँवरि, गोरिहि गोरी । आपनि आपनि लीन्ह सो जोरी॥

 

बूझि खेल खेलहु एक साथा । हार न होइ पराए हाथा॥

 

आजुहि खेल, बहुरि कित होई । खेल गए कित खेलै कोई?॥

 

धानि सो खेल खेल सह पेमा । रउताई औ कूसल खेमा॥

 

मुहमद बाजी पेम कै, ज्यों भावै त्यों खेल।

 

तिल फूलहि के संग ज्यों होइ फुलायल तेल॥6॥

 

सखी एक तेइ खेल न जाना । भै अचेत मनिहार गवाँना॥

 

कवँल डार गहि भै बेकरारा । कासों पुकारौं आपन हारा॥

 

कित खेलै आइउँ एहि साथा । हार गँवाइ चलिउँ लेइ हाथा॥

 

घर पैठत पूँछब यह हारू । कौन उतर पाउब पैसारू॥

 

नैन सीप ऑंसू तस भरे । जानौ मोति गिरहिं सब ढरे॥

 

सखिन कहा बौरी कोकिला । कौन पानि जेहि पौन न मिला?॥

 

हार गँवाइ सो ऐसे रोवा । हेरि हेराइ लेइ जौं खोवा॥

 

लागीं सब मिलि हेरै, बूड़ि बूड़ि एक साथ।

 

कोइ उठी मोती लेइ, काहू घोंघा हाथ॥7॥

 

कहा मानसर चाह सो पाई । पारस रूप इहाँ लगि आई॥

 

भा निरमल तिन्ह पायँन्ह परसे । पावा रूप रूप के दरसे॥

 

मलय समीर बास तन आई । भा सीतल, गै तपनि बुझाई॥

 

न जनौं कौन पौन लेइ आवा । पुन्य दसा भै पाप गँवावा॥

 

ततखन हार बेगि उतिराना । पावा सखिन्ह चंद बिहँसाना॥

 

बिगसा कुमुद देखि ससि रेखा । भै तहँ ओप जहाँ जोइ देखा॥

 

पावा रूप रूप जस चहा । ससि मुख जनु दरपन होइ रहा॥

 

नयन जो देखा कवँल भा, निरमल नीर सरीर।

 

हँसत जो देखा हंस भा, दसन जोति नग हीर॥8॥

 

(1) केत=केतकी। करना=एक फूल। कूजा=सफेद जंगली गुलाब।

 

(2) पाल=बाँधा, भीटा, किनारा।

 

(3) चाह=खबर। डेल=बहेलिए का डला।

 

(4) खाेंपा=चोटी का गुच्छा, जूरा। मुकलाई=खोलकर। मकु=कदाचित्।

 

(5) करिल=काले। बिसहर=विषधार, साँप। करी=कली। कोंप=कोंपल। उनंत=झुकती हुई।

 

(6) साखी=निर्णयकर्ता, पंच। बादमेलि कै=बाजी लगाकर।

 

(7) रउताई=रावत या स्वामी होने का भाव, ठकुराई। फुलायल=फुलेल।

 

(8) चाह=खबर, आहट।

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