गंगा जिनके चरण छूती ऐसे शिव के अवतार श्री बाबा कीनाराम

xxmaxresdefaultकुछ मनीषियों का कहना है की वाराणसी स्थित क्रीं कुण्ड अपने में कई तीर्थों का सार स्वरुप है और इसलिए परम आदरणीय श्री बाबा कीना राम ने इसे अपनी अन्तिम निवास स्थली बनायीं ! बाबा कीना राम और क्रीं कुण्ड (Shri Baba Kinaram kreem kund Varansi India) की पूर्ण महिमा आज भी बस कुछ विशिष्ट लोग ही जानते हैं ! काशी वैसे ही महादेव की नगरी है अतः वहां महादेव कई गुप्त रूपों में हमेशा से निवास करते रहें हैं ! केवल महदेव की कृपा प्राप्त भक्त ही शिव को उनके गुप्त रूप के बावजूद पहचान लेते हैं और साक्षात् शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने का महा सौभाग्य प्राप्त करते हैं !

भगवान् शिव के ऐसे ही अवतार माने जाने वाले थे सुप्रसिद्ध सन्त श्री बाबा कीनाराम ! श्री बाबा किनाराम जी का जन्म बनारस के चन्दौली तहसील के अन्तर्गत रामगढ़ ग्राम में क्षत्रिय रघुवंशी परिवार में विक्रमी संवत् 1658 में, भाद्रपद के कृष्णपक्ष में अघोर चुतुर्दशी के दिन हुआ। श्री अकबर सिंह को 60 वर्ष की आयु में यह पुत्र प्राप्त हुआ था इससे ग्रामवासी भी प्रसन्न थे। बालक दीर्घजीवी और कीर्तिवान् हो इसके लिये उस गाँव की मान्यतानुसार उन्हें दूसरे को दे कर उससे धन दे कर खरीदा गया। इसी आधार पर इनका नाम कीना (क्रय किया हुआ) रखा गया। बालक कीना का शैशव समवयस्क बालकों के साथ खेलने-कूदने तथा महापुरुषों की जीवन कथाएँ सुनने और मनन करने में बीता।

बचपन से ही आध्यात्मिक संस्कार अत्यंत प्रबल थे। इधर माता-पिता कि आयु भी अधिक हो चली थी इसलिए तत्कालीन रीत्यनुसार बारह वर्ष की अल्प आयु में ही, इनकी घोर अनिच्छा रहते हुए भी, विवाह कर दिया गया किंतु दो तीन वर्षों बाद गौना की पूर्व संध्या को इन्होंने हठपूर्वक माँ से माँगकर दूध भात खाया। उन दिनों दूध भात मृतक संस्कार के बाद अवश्य खाया जाता था। दूसरे दिन सबेरे ही वधू के देहांत का समाचार आ गया। सबको आश्चर्य हुआ कि इन्हें पत्नी की मृत्यु का पूर्वाभास कैसे हो गया।

कुछ समय बाद माता-पिता भी परलोक सिधार गये और श्री कीना के लिये वैराग्य का मार्ग प्रशस्त हो गया। उन्होंने घर छोड़ा और सब से पहले गाजीपुर में एक गृहस्थ साधु शिवादास के यहाँ पड़ाव डाला। बाबा शिवादास को बालक कीना की विलक्षणता का आभास हो गया था। उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्होंने छिप कर देखा कि गंगा स्नान के लिये जाने वाले कीना का चरण स्पर्श करने के लिये गंगाजी स्वयं आगे बढ़ रही हैं। कुछ दिन बाबा शिवादास के साथ रहने के बाद वे उनके शिष्य बन गये। घर छोड़ने के बाद संत कहलाए जाने लगे !

एक बार श्री कीनाराम गाजीपुर के कारों गांव से गुजर रहे थे कि रास्ते में एक बुढ़िया रोती हुई मिली। निर्धन बुढ़िया के पास एकमात्र पुत्र था जो कि जमींदार को लगान न दिये जाने के कारण दण्डित किया जा रहा था। बुढ़िया के संताप के कारण बाबा कीनाराम उस जमींदार के पास पहुंच कर उसके पुत्र को छोड़ने के लिए आग्रह करने लगे, लेकिन लोभी जमींदार ने बाबा की बात मानने से इन्कार कर दिया। तब बाबा ने जमींदार को वहीं जमीन खोदने को कहा जहां वह बालक बैठा था। जमीन खोदने पर स्वर्ण मुद्राएं मिलीं। ऐसा देख जमींदार बाबा के पैरों पर गिरकर क्षमा याचना करने लगा और बुढ़िया ने भी अपने इकलौते पुत्र को बाबा को समर्पित कर दिया। आगे चलकर यही बालक बाबा बीजाराम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कहा जाता है कि बाबा कीनाराम को खड़ाऊ पहन कर चलते हुए पृथ्वी पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने की सिद्धि प्राप्त थी। कारों गांव से प्रस्थान कर बाबा कीनाराम गिरनार की तरफ चल दिये। यहां पर उनकी मुलाकात अघोरमत के महान प्रवर्तक भगवान् शिव स्वरुप श्री भगवान् दत्तात्रेय से हुई। श्री दत्तात्रेय ने उनकी कठिन परीक्षा ली और योग्य पा कर दीक्षित किया तथा एक पुरवा और एक लंगोट देकर, काशी में बाबा कालूराम के पास भेजा।

जब बाबा कीनाराम, संत कालूराम के पास काशी के हरिश्चंद्र घाट पर पहुंचे तो कालूराम खोपड़ी पर सिद्धि कर रहे थे। उन्होंने कालूराम से प्रश्न किया कि जो शव किनारे लगा हुआ है मुर्दा है या जिन्दा ? तब कालूराम ने कहा कि मुर्दा। इस पर कीनाराम ने शव से कहा कि ‘ऐ रामजीयावना उठ काहें सो रहा है’ और मुर्दा उठ गया। यह चमत्कार देखते ही कालूराम, बाबा कीनाराम के चरणों पर गिर गये। संत कालूराम तो सब जानते थे लेकिन फिर भी उन्होने कीनाराम से कुछ खाने को मांगा। इस पर बाबा कीनाराम ने गंगाजी से निवेदन किया और उसी क्षण एक मछली सामने जल रही चिता पर आकर गिर पड़ी और दोनों औघड़ संतों ने भुनी मछली खाई। बाबा कीनाराम की परीक्षा ले चुके संत कालूराम ने गुरू दत्तात्रेय का दिया हुआ सोटा बाबा कीनाराम को सौंपा।

गिरनार के बाद संत कीनाराम ने कराची (पाकिस्तान) के सुदूर पहाड़ी स्थित हिंगलाज देवी मन्दिर पहुँच कर काफी दिनों तक देवी की आराधना की। एक दिन अचानक संत कीनाराम ने देवी का असली रूप देखने की हठ लगा ली। भक्त की हठ पर देवी ने उन्हे अपना असली रूप दिखाया और कहा कि मैं ही हिंगला देवी हूं और अब मैं यहां से क्रीं कुण्ड चली जाऊंगी, तुम भी वहीं चलो, इस पर बाबा कीनाराम क्रीं कुण्ड वाराणसी चले आये।

बाबा कीनाराम के चमत्कारों की अनेक घटनाएं सर्वत्र प्रचलित हैं जिसमें गाजीपुर के भुडकुड़ा में जल का दूध बना देना, गिरनार से लौटते वक्त राजा के सिपाहियों के हाथों पकड़े जाने पर जेल में अपने आदेश पर चक्की चलवाना, सैदपुर में गरीब दीपुआ को उसके रेवड़ी सत्कार पर प्रसन्न होकर दीपचन्द्र बना देना आदि। बाबा कीनाराम शैव, वैष्णव एवं अघोरपंथ तीनों सम्प्रदायों में दीक्षित होने के कारण तीनों का सम्मिश्रण करने में पूर्ण सफल हुये। वैष्णव रीति से रामोपासक और अघोरपंथ से मद्य-मांस भक्षी बाबा कीनाराम जात-पात के भेद-भाव से पूर्ण रूप से मुक्त थे। वे कहा करते थे कि ‘भाई जतियों क खईली, कुजतियों क खईली तबो ना अघइली।

संत कीनाराम महाराज ने अनेक अघोरपीठ की स्थापना कीं जिसमें अघोर सिद्धपीठ रामगढ़, क्रीं-कुण्ड, वाराणसी, देवल, गाजीपुर प्रमुख हैं। इनके नाम पर मुड़ीयार, सैरपुर में अघोराचार्य बाबा कीनाराम सेवा संस्थान और एक चिकित्सालय है, जहां निःशुल्क इलाज किया जाता है। काशी में इस सम्प्रदाय से सम्बन्धित शिवाला क्षेत्र में क्रीं-कुण्ड है। इस स्थान पर इस पंथ की प्रधान गद्दी लगभग 400 वर्ष पूर्व बाबा कीनाराम ने ही स्थापित की थी। इस स्थान पर हर वर्ष भादो माह में लोलार्क छठ का मेला लगता है और मान्यता है कि क्रीं कुण्ड में स्नान करने से सभी चर्म रोगों से निश्चित मुक्ति मिलती है।

बाबा कीनाराम सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ-साथ अलौकिक शक्तियों का प्रयोग कर गरीब, दुखियों, रोगियों और बहिष्कृत व्यक्तियों की सेवा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे। वे कहा करते थे कि मैं उन सभी मनुष्यों को आदर और प्यार देता हूं जो उपेक्षित हैं और जो अपनी गलतियों को सुधारने के लिए उत्सुक हैं। क्रीं-कुण्ड स्थल में आज भी बाबा कीनाराम का तख्त सुरक्षित है और उनकी आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व प्रज्जवलित धूनी उसी प्रकार से जल रही है। यहां पर उनकी समाधि भी है। मान्यता है कि औघड़ बाबा कीनाराम ने अपने भौतिक शरीर को सन् 1772 में त्याग दिया था।

संत कीनाराम के जन्म स्थान रामगढ़ (चन्दौली) में अघोर सिद्ध पीठ है। बाबा कीनाराम की जन्म स्थली होने के कारण इस सिद्धपीठ का भी महत्व है। विशाल बरगद का वृक्ष आज भी उसी तरह तेज बरसा रहा है जैसे बाबा के साधना के वक्त था। पूजा के वक्त बाबा कीनाराम के मठ में दिव्य शक्ति की अनुभूती होती है। बाबा किनाराम ने इस मठ में एक कूप का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि निर्माण के समय ईंट कम हो गईं तो उन्होंने पास रखे गोहरे लगाने का आदेश दे दिया और गोहरे ईंट में बदल गया था जो आज भी दर्शनीय है। इसे राम सरोवर के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि राम सरोवर में स्नान मात्र से रोगों से मुक्ति मिलती है। रविवार और मंगलवार को कीनाराम स्नान के लिए लोगों की भीड़ लगती है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि बाबा एक बार इसमें कूद कर अदृश्य हो गये थे।

अघोर सिद्धपीठ रामगढ़ में बाबा का सिंहासन है और इनके पास ही इनके शिष्य बीजाराम का भी सिंहासन है, जहां आज भी उसी तरह धूनी प्रज्ज्वलित है। अघोर सिद्धपीठ रामगढ़ में प्रतिवर्ष उनके जन्म दिन पर तीन दिवसीय ‘जन्मोत्सव समारोह’ का आयोजन किया जाता है। बाबा कीनाराम जन्मोत्सव समारोह में दूर-दूर से विद्धान, गायक, संगीतकार, वादक एवं कलाकार आते हैं। जन्मोत्सव समारोह के दौरान निःशुल्क भोजन और रहने का इन्तजाम होता है। जन्मोत्सव समारोह में प्रदेश के मन्त्री, सांसद एवं विधायक समेत हजारों की संख्या में प्रबुद्ध नागरिक मौजूद रहते हैं। मठ में विशाल मन्दिर है जिसमें वर्ष भर पूजा-अर्चना का कार्यक्रम चलता है। यहां पर लोग दहेज रहित विवाह करते हैं। अघोर पंथ के प्रवर्तक बाबा कीनाराम ने समाज को सामाजिक सौहार्द व भाईचारे का पाठ पढ़ाया है। इसलिए बाबा के मठ में लोग धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर उनके दर्शन के लिए आते हैं। लोगों को इस बात की उम्मीद रहती है कि उनकी मुरादें बाबा के मठ में जरूर पूरी होंगी और होती भी हैं।

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