जानिये सोना फसल उगाने वाली आयुर्वेदिक खाद व कीटनाशक का जबरदस्त फार्मूला

· September 17, 2016

zxyबिल्कुल समझ में नहीं आता कि आखिर खेतों में महंगे केमिकल्स युक्त फर्टिलाईजर्स और पेस्टीसाइड्स को डालने की जरूरत है ही क्यों, जबकि इनसे कई गुना ज्यादा फसल की पैदावार, इनसे कई गुना सस्ते हर्बल फर्टिलाईजर्स और पेस्टीसाइड्स से की जा सकती है !


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यदि कोई किसान लगातार 3 – 4 फसल सिर्फ आयुर्वेदिक खादों और कीटनाशकों के भरोसे बोये तो फिर देखे कि कैसे नहीं उसकी फसल का मुनाफा बढ़ रहा है !

असल में आयुर्वेदिक खादों और कीटनाशकों के एक दो बार प्रयोग करने से तो खेतों से पुराना केमिकल युक्त खादों और कीटनाशकों का जहर खत्म होता है और फिर खेत की उपजाऊ क्षमता में जबरदस्त इजाफा होने लगता है जिससे किसान के मुनाफे में भारी बढ़ोतरी होती है !

zseद्वितीय विश्व युद्ध के बाद बंद पड़ी रासायनिक हथियारों की फैक्ट्रियों को फिर से चालू करने के लिए अंग्रेजों ने इन फैक्ट्रियों से रासायनिक खाद और कीटनाशक का उत्पादन कर जबरदस्ती हम गुलाम भारतियों को केमिकल युक्त कीटनाशक और खाद का प्रयोग करने पर मजबूर किया पर अंग्रेजों की यह जबरदस्ती धीरे धीरे हमारी आदत में तब्दील हो गयी जिसकी वजह से आज कैंसर (cancer) जैसी सैकड़ों घातक बीमारियाँ भारत के लगभग हर तीसरे घर में घुस चुकी है !

आईये जानते हैं उन बेहद आसान और प्रसिद्ध फार्मूलों में से दो फार्मूलों के बारें में जिनकी मदद से हमारे भारत के पूर्वज खेतों से इतना ज्यादा मुनाफा कमाते थे कि उन्हें पैसा कमाने के लिए किसी और रोजगार या नौकरी की जरूरत ही नहीं पड़ती थी !

उनमें से एक खाद का नाम है “जीवामृत” खाद जिसे बनाने के लिए चाहिए होता है सिर्फ – भारतीय देशी गाय माता का गोबर, गोमूत्र, दही, दाल का आटा एवं गुड़।

इसके निर्माण के लिए – 60 किलोग्राम गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, किसी दाल का 2 किलो आटा, 2 किलोग्राम गुड़, 2 किलोग्राम दही को अच्छी तरह से मिलाकर मिश्रण बना लें और इसे दो दिनों तक छाया में रखें।

इसकी प्रयोग विधि इस प्रकार है – दो दिन बाद तैयार मिश्रण को 200 लीटर जल में मिलाकर एक एकड़ खेत में छिड़काव करें।

यह खाद खेत में असंख्य लाभप्रद जीवाणुओं को पैदा करती है जिससे खेत की उपजाऊ क्षमता बहुत बढ़ जाती है !

भारतीय देशी गाय माता के गोबर, गोमूत्र, दही, दाल के आटे और गुड़ से बनी यह खाद फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए बेजोड़ है और हर किसान को इसका असली चमत्कार देखने के लिए कम से कम 1 साल के लिए सिर्फ इसका अर्थात आयुर्वेदिक खाद और कीट नाशक का प्रयोग करके जरूर देखना चाहिए !

फसल के अलावा अगर आप किसी पेड़ के फलों की पैदावार भी बढ़ाना चाहते हैं तो उस फलदार वृक्ष के तने से 2 मीटर दूर एक फुट चौड़ा व एक फुट गहरा गड्ढा खोदकर, उसे खेत में उपलब्ध कूड़ा-करकट (सूखी पत्ती, खरपतवार आदि) से भर दें और अन्त में उस गड्ढे को जीवामृत खाद से अच्छे से गीला कर दें । इसके फलस्वरूप पेड़ में फलों की पैदावार खूब ब़ढ जाती है।

उपर्युक्त खाद के फ़ॉर्मूले के अलावा एक और चमत्कारी खाद का फार्मूला जिसके निर्माण के लिए सिर्फ 2 चीज चाहिए होती है, एक गाय माता का गोबर और दूसरा किसी मरी हुई गाय माता का सींग !

इस चमत्कारी खाद का निर्माण तो बहुत आसान है पर इसके निर्माण में लगभग 6 महीने लग जाते हैं, किन्तु इसके लाभ इतने चमत्कारी हैं कि कोई भी प्रयोगकर्ता आसानी से इसके निर्माण के लिए 6 महीने इन्तजार करने को ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो जाता है !

इसे बनाने से पहले जानना जरूरी है कि आखिर गाय माता की सींग में क्या आश्चर्य जनक विशेषताएं है ?

वैसे तो प्रथम द्रष्टया गाय माता का सींग केवल एक रक्षा अस्त्र की तरह ही दिखता है लेकिन गाय माता को इसके द्वारा सीधे तौर पर अन्तरिक्ष से रहस्यमयी ऊर्जा मिलती रहती है अतः इसे एक प्रकार से गाय माता को ईश्वर द्वारा प्रदत्त दुर्लभ एंटीना माना जा सकता है। गाय माता की मृत्यु के 45 साल बाद तक भी यह सुरक्षित बना रहता है। गाय माता की मृत्यु के बाद उनकी सींग के उपयोग से श्रेठ गुणवत्ता की खाद बनाने की परम्परा वैदिक काल से चली आ रही है। सींग से बनी खाद, एक मृदा उत्प्रेरक की तरह भूमि की उर्वरता बढाती है जिससे पैदावार खूब बढती है।

इसके निर्माण कि विधि इस प्रकार है – सर्वप्रथम सींग को साफकर उसमें ताजे गोबर को अच्छी तरह से भर लें। सितंबर अक्तूबर महीने में जब सूर्य दक्षिणायन पक्ष में हों, तब इस गोबर भरी सींग को एक से डेढ़ फिट गहरे गड्ढे में नुकीला सिरा ऊपर रखते हुए गाड़ देते हैं। इस सींग को गड्ढे से छः माह बाद मार्च अप्रैल में भूमि से निकाल लेते हैं। इस खाद से मीठी महक आती है जो इसके अच्छी प्रकार से तैयार हो जाने का प्रमाण है।

इस प्रकार मात्र एक सींग से तीन चार एकड़ खेत के लिए खाद तैयार हो सकती है। यह खाद खेत के लिए साक्षात् अमृत है और हर तरह से पौधों का पोषण करती है !

इसे प्रयोग कराने का तरीका – इस खाद को प्रयोग करने के लिए 25 ग्राम सींग खाद को 13 लीटर स्वच्छ जल में घोल लेते हैं। घोलने के समय कम से कम एक घंटे तक इसे लकड़ी की सहायता से हिलाते – मिलाते रहना चाहिए। सींग खाद से बने घोल का प्रयोग बीज की बुआई अथवा रोपाई से पहले सायंकाल छिड़काव विधि से करना ज्यादा बेहतर होता है ।

अब बात करते हैं आयुर्वेदिक कीट नाशकों की –

यहाँ पर प्राचीन भारत के कई जबरदस्त आयुर्वेदिक कीटनाशकों के फ़ॉर्मूले दिए जा रहें हैं, इनमे से जो भी आसान लगे उसे बनाकर आजमाया जा सकते हैं –

– पक्की मिट्टी के नाद में अथवा किसी पात्र में 40 – 50 दिन पुराना 10 लीटर गोमूत्र रखना चाहिए। इसमें ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को डाल कर इसे 15 दिनों तक गोमूत्र में सड़ने दें। 15 दिन बाद इस गोमूत्र को छान लें। इस प्रकार एक जबरदस्त कीट-नियंत्रक गोमूत्र तैयार हो जाता है।

– कम से कम 40 – 50 दिन पुरानी, 15 लीटर गोमूत्र को तांबे के बर्तन में रखकर 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबालें ! 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे आग से उतार कर ठंडा करें एवं छान लें।

– मदार की 5 किलोग्राम पत्ती, 15 लीटर गोमूत्र में उबालें। 7.5 लीटर मात्रा शेष रहने पर छान लें।

– तंबाकू की 2.5 किलोग्राम पत्तियों को 10 लीटर गोमूत्र में उबालें और 5 लीटर मात्रा शेष रहने पर छान लें।

– नीम की 15 किलो पत्तियों को 30 लीटर गोमूत्र में 10 लीटर मात्रा शेष रहने तक उबालें। ठंडा कर छान लें।

प्रयोग विधि – एक लीटर कीटनाशक को 10 लीटर जल में मिलाकर पौधों में छिड़काव करें !

यह बार बार देखा गया है कि भारतीय देशी गौमाता और देशी नन्दी (बैल) का मूत्र जितना ज्यादा पुराना होता जाता है उतना ज्यादा उसकी गुणवत्ता अच्छी होती जाती है जबकि जितने भी मल्टीनेशनल कम्पनियों के कीट नाशक होते हैं उन सबकी एक्सपायरी डेट होती है जिसके बाद उनसे कीड़े मरते नहीं है !

कई बार किसान इन केमिकल युक्त खादों और कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान उसे सूंघने या ओठों पर छीटे पड़ने से गम्भीर रूप से बीमार या मर जाते हैं जबकि इन आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स के साथ ऐसा खतरा बिल्कुल नहीं हैं !

शरीर को तो जो नुकसान है वो तो है ही उसके अलावा यह एक महा पाप भी है कि जगत माता अर्थात धरती माता को बार बार केमिकल युक्त जहरीली खाद और कीटनाशक से सींच कर धीरे धीरे उन्हें बंजर बनाना !

गाय माता से प्राप्त चीजों से बने इन आयुर्वेदिक खाद और कीटनाशक के लगातार तीन – चार साल इस्तेमाल करने पर खेत की मिट्टी एकदम पवित्र और शुद्ध बनने लगती है, मिट्टी में एक कण भी जहर का नहीं बचता है। उत्पादन भी पहले से काफी अधिक बढ़ जाता है। ध्यान देने की बात है कि फसल का उत्पादन हर साल धीरे धीरे बढता ही जाता है लेकिन खाद और कीटनाशक का खर्चा पहले ही साल से काफी कम हो जाता है!

(नोट – यहाँ पर दिए गए सारे फायदे सिर्फ भारतीय देशी गाय माता के गोबर, मूत्र और दही के हैं, ना कि वैज्ञानिकों द्वारा सूअर के जीन्स से तैयार जर्सी गाय के, या भैंस के)

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