आसक्ति में अपमान है !

images (24)जी हा, ये तय बात है की इस दुनिया में हम जिस भी चीज से आसक्ति रखेंगे (ईश्वर को छोड़कर) वही चीज हमारा एक न एक दिन अपमान जरूर करेगी। और तब तक बार – बार हमारा अपमान करती रहेगी जब तक हमारे मन में उसके प्रति खिन्नता ना पैदा हो जाय। ऐसा क्यों होता है ?

इसका उत्तर अगर बहुत सीधी भाषा में समझना हो तो ये है की ये अपमान होना हमारे परम दयालु भगवान की कृपा है !!

अब कई लोगो को ये समझ में नहीं आता की इंसल्ट होना भगवान की कृपा कैसे हो सकती है। कृपा तो उसको बोलते है जिसमे आदमी को बैठे – बैठे अचानक से पैसे मिल जाय या उसका प्रमोशन हो जाय या उसकी कोई बीमारी ठीक हो जाय।

तो भगवान की इस तरह की कृपा का मतलब समझने के लिए पहले भगवान की इच्छा को समझने के जरुरत है।

भगवान हैं क्या , भगवान हैं परम पिता। जैसे कोई बाप अपने लड़के का बुरा नहीं चाहेगा वैसे ही भगवान भी अपने बनाये हुए सभी बच्चो का सिर्फ भला ही चाहते है और वो चाहते है की उनका लड़का यानि हम इन्सान सही रास्ते पर सही तरीके से उन्नती करे।

तो इसमें प्रश्न ये आता है की किसी भी दूसरे आदमी या सांसारिक वस्तु को चाहने में गलत क्या है की भगवान उसी चीज या उसी आदमी से हमारी इंसल्ट करवाये ? तो ये गलत ऐसे है – हर आदमी को आदमी का शरीर मिलने के पीछे का एक मात्र उद्देश्य यही है की वो इस बात को खोजने और समझने की लगातार कोशिश करे की वो आखिर है कौन, और कहा से आया और कहा को जायेगा !! अपने आप को खोजने की इस खोज को ही ईश्वर की खोज या आत्म तत्व की खोज कहते है।

इस खोज को सफल या पूरा नहीं होने देने में कई बाधाओ का हाथ होता है और ये बाधायें है आदमी के खुद की अंदर की काम – क्रोध – लालच – माया जैसी भावनाए।

और इन्ही बाधाओ में से एक बाधा है मोह यानी आसक्ति !!

वैसे तो आदमी को सभी जीवो के प्रति जरूर प्रेम भाव रखना चाहिए और किसी के लिए दुश्मनी का भाव नहीं रखना चाहिए लेकिन जब ये प्रेम भाव, मोह का रूप धारण कर ले तब नुकसान है। और अगर इंसान अपने से प्रयास करके उस मोह भाव को वापस प्रेम भाव में बदल ले तो ठीक, नहीं तो जिंदगी में ऐसी अपमान वाली घटनाक्रम बार – बार तब तक होती है जब तक की आदमी का मन उस चीज से खिन्न होकर विरक्त हो न जाय।

जब आदमी का मन बार संसार के चीजो और रिश्तो से खिन्न होगा तभी वह सही मायने में सत्य की तलाश शुरू करेगा और जब वो सत्य की तलाश के लिए प्रयास शुरू करेगा तब उसको अनन्त दयालु भगवान की तरफ से रास्ता दिखाने और उत्साह बढ़ाने के लिए मदद जरूर मिलेगी। ये मदद किसी भी रूप में मिल सकती है चाहे वो सद्गुरु के रूप में हो या कोई घटना या कुछ अन्य।

अगर कभी सत्य की तलाश की बहुत इच्छा हो और कोई रास्ता समझ में न आ रहा हो तो सबसे आसान पर बहुत प्रभावी तरीका है कि सारी तामसिक चीजो (जैसे माँस -मछली -अण्डा -शराब -बियर -सिगरेट -गुटखा -तम्बाखू) को खाना त्याग कर और अपनी नौकरी – व्यापार को ईमानदारी से निभाते हुए भगवान के किसी भी नाम का अधिक से अधिक प्रतिदिन मानसिक जप या मुह से बोलते हुए करना। ये जप किसी भी समय किया जा सकता है मतलब काम करते हुए, पैदल चलते हुए, उठते – बैठते, सोते किसी भी समय पर जब भी जपे शुद्ध जपे। भगवान का नाम गलत नहीं जपना चाहिए इसलिए संतो का कहना है की भगवान के आसानी से उच्चारण होने वाले नाम (जैसे- सीता राम या राधा गोपाल आदि ) जपने में गलती होने की सम्भावना कम रहती है।

अतः इस तरह आदमी अगर एक ईमानदार दिनचर्या जीते हुए, सभी गलत खान पान का त्याग करते हुए और अपने माता पिता गुरुजनो और गरीबो का ख्याल करते हुए भगवान के नाम का निरन्तर जप करता रहे तो उसकी सत्य की या आत्म तत्व की या ईश्वर की तलाश जरूर पूरी होती ही है।

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