उधार के मगरमच्छ………

· August 15, 2016

sasws(नोट – आज के इस अनिश्चित युग में कभी भी किसी के साथ कुछ भी अनहोनी अचानक से हो सकती है इसलिए उधार की जरूरत तो किसी को भी पड़ सकती है ……….. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह देखने को भी मिलता है …………….. कि समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी अच्छे फैमिली बैकग्राउंड से सम्बन्ध रखने के बावजूद उन्हें बार बार अपनी मौज मस्ती अय्याशियों के लिए दूसरों से उधार मांगने की गन्दी लत होती है ………….. यह आर्टिकल ऐसे ही उधारबाजों जो अक्सर किसी संकोची स्वभाव के मनुष्य के गले की हड्डी बन जाते हैं, के विषय में अनुभूतिपरक है)

ऐसे उधारबाजों के भेष में छिपे अहसान फरामोशों की खुद की कलम से –

उधार मांगते समय हमारे जैसा कोई राम (शरीफ) नहीं होता पर उधार मिल जाने के बाद या नया उधार मिल पाने की संभावना ख़त्म हो जाने के बाद ……….. हम धीरे धीरे अपना रावण रूप उजागर करते हैं ताकि अगले की हिम्मत ही ना पड़े कि हमसे उधार वापस मांग सके !

हम तो उधार मांगने में इसकदर उस्ताद हैं कि एक बार जिससे जोंक की तरह चिपक गये तो बिना कुछ ना कुछ चूसे उसे नही ही छोड़ेंगे …………….. लेकिन असली कमाल तो यह है कि एक बार उधार पा जाने के बाद क्या मजाल कि हमसे कोई चवन्नी भी वापस वसूल कर दिखा दे !

भाई हमें कोई शर्म नहीं है यह स्वीकारने में कि हम उस मगरमच्छ की तरह हैं जो एक बार किसी को (चाहे वो हमारा कितना भी परिचित या सगा क्यों ना हो) बेवकूफ बना कर उसका माल हड़प लें तो ……………. फिर तो चाहे भगवान् भी आ जाएँ लेकिन हम उसका पूरा पैसा इतनी आसानी से तो वापस बिल्कुल नहीं करने वाले …………… अलबत्ते हमारे पास उसका उधार लौटाने लायक पैसा हो लेकिन कसम हमारे धूर्त ईमान कि हम पैसा अपने पास रखकर अपने शौक, अय्याशियों पर खर्च कर देंगे या तिजोरी में रखकर सड़ा देंगे लेकिन अगले का उधार कत्तई नहीं वापस करेंगे !

हमारे घाघपन का कोई टक्कर नहीं …………… क्योंकि हम रोज नयी नयी स्टोरी सुना सकतें हैं, पैर भी पड़ सकते हैं, घड़ियालू आंसू की नदियाँ भी बहा सकते हैं ……………….. लेकिन किसी को उल्लू बनाकर हड़पा हुआ माल वापस नहीं ही कर सकते हैं !

इतना दो मुखी चरित्र होने के बादजूद भी …………. क्या मजाल कि कोई हमको “लीगल डकैत” कह दे !

हमने ना तो देशभक्ति के लिए और ना ही गरीब दुखियों के लिए आज तक एक रूपए भी बर्बाद करने की मूर्खता की …………… क्योंकि जिन्होंने किया उन्हें कौन सा परम आनंद मिल गया !

हम तो गिरगिट से भी तेज रंग बदलते हैं क्योंकि जब हमारी जरूरत पड़ती है और हमें उधार माँगना होता है तो हमारे मुंह से चाशनी में लपेटी सिर्फ मीठी वाणी ही निकलती है पर जरूरत ख़त्म होते ही ………………… हम ऐसे दबंग किंग की तरह बिहैव करने लगते हैं कि अगला भी एक बार सहम कर सोचने पर मजबूर हो जाता है कि, क्या ये वही है जो अभी कुछ दिनों पहले तक हमसे उधार मांगने के लिए हमारी जी हजूरी कर रहा था …………. पर वाह रे कलियुग का अदृश्य सपोर्ट कि हमारे व्यवहार के इस गिरगिटपन के बावजूद, ना तो हमारे नंबर ऑफ़ फ्रेंड्स में कोई कमी आती है और ना ही हमारे सामाजिक रूतबे में !

सामान्य मेहनतकश लोगों कि तुलना में हमारा दिमाग इतना ज्यादा तेज तर्रार फ़ास्ट तरीके से काम करता है कि ………….. जब तक एक आदमी से उधार मांगी हुई रकम ख़त्म होने वाली होती है …………. तब तक हम दूसरा, तीसरा, चौथा शिकार तक खोज चुके होते हैं नया उधार मांगने के लिए !

हम तो इतने बड़े शातिर हैं कि जब किसी के बाप से और उधार मिलने की संभावना एकदम ख़त्म हो जाती है तो हम पतली गली से निकल कर ……………. तब तक नहीं लौटते जब तक कि ………… उसका बेटा उधार देने लायक स्थिति में नहीं आ जाता ……………. बाप से की गयी हमारे द्वारा अहसानफरामोशी को भुलवाने के लिए हम बेटे को तरह तरह की मक्कारी वाली इमोशनल स्टोरी सुनाते हैं …………. लेकिन तब तक प्रयास नहीं छोड़ते जब तक उस बेटे से भी कुछ ना कुछ चूस लेते !

टिप्पणी

ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि इस तरह के उधारबाजों में से कुछ तो रोज रोज नयी नयी मनगढ़न्त कारुणिक स्टोरी सुनाकर अपने परचितों से उधार मांगते हैं और कुछ तो बड़े गर्व व अधिकार से ऐसे उधार मांगते हैं कि मानों यह तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार ही है !

इन ढीठ उधारबाजों को इसकी बिल्कुल परवाह नहीं होती कि पुराना माँगा उधार अब तक इन्होने वापस किया है कि नहीं …. या …… पुराना उधार सिर्फ 10 दिन के लिए कह कर माँगा था लेकिन 4-5 साल बाद जाकर वापस किया वो भी सिर्फ मूलधन, ऊपर से तुर्रा यह कि उधार देने वाले का कोई अहसान मानने की बजाय उल्टा उसी पर अहसान लाद दिया कि लो आखिरकार तुम्हारा पैसा मैंने वापस कर दिया, बेवजह तुमने इतना ज्यादा हाय तौबा मचा रखा था कि मानों जैसे मै तुम्हारा पैसा कभी वापस करता ही नहीं !

उधार मांगने की लत से एकदम विवश ये उधारबाज इतना ज्यादा संवेदन हीन होते हैं कि इन्हें इस बात का जरा भी लिहाज नहीं होता कि आखिर इन्हें क्या हक है कि किसी संकोची स्वभाव के व्यक्ति की मेहनत की कमाई को सालों तक बिना डकार लिए हड़प कर बैठे रहने का ……… !!

ffyfyfyhfअतः नीति यही कहती है कि अगर वाकई में कोई जरूरतमंद है तो उधार देकर उसकी मदद करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए क्योंकि यह एक तरह का पुण्यवर्धक परोपकार का कार्य है ………….. लेकिन कोई अपने धूर्त स्वभाववश उधार मांग रहा हो तो उसे उधार देकर उसकी बुरी आदत को और बिगाड़ना नहीं चाहिए …………. और साथ ही साथ अगर किसी मगरमच्छ टाइप के व्यक्ति को अपनी मेहनत की कमाई का उधार दिया हो तो बिना किसी संकोच लिहाज के जल्द से जल्द उससे अपना उधार वसूलने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि ……….. ऐसे मगरमच्छों का कोई भरोसा होता है नहीं और ये कभी भी अपनी ही अति चालाकी का शिकार होकर किसी दूसरे बड़े मगरमच्छ का शिकार बन सकते हैं जिससे ये अपने साथ उन सभी लोगों का पैसा भी लेकर डूब जाते हैं जिनसे इन्होने कभी उधार ले रखा हो !

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