कोई भी हथियार खेचरी मुद्रा से बने वज्र शरीर को चोट नहीं पंहुचा सकता

kjब्रह्माण्ड की सबसे महान प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण (kundalini shakti awakening) में सिद्धि के लिए खेचरी मुद्रा (khechari mudra) और शाम्भवी मुद्रा (shambhavi mudra) में सफलता जरूरी होती है ! ऐसा नहीं है की सिर्फ हठ योग (Hatha Yoga) से ही खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है, राज योग (Raj Yoga), कर्म योग (Karm Yog), भक्ति योग (Bhakti Yog) व तंत्र योग (Tantra Yoga)से भी यह मुद्रा सिद्ध हो सकती है !

इस मुद्रा के सिद्ध होने पर अचानक से जीभ पर बर्फ के समान ठंडा महसूस होता है जो की जीभ पर अवतरित हुए अमृत कणों की वजह से होता है जिससे जीभ उस समय अप्रत्याशित रूप से चिकनी महसूस होती है !

यह अमृत (Amrit, Nectar or Ambrosia) जीभ की सूक्ष्म ग्रंथियों द्वारा शरीर में घुल जाता है ! ऐसा नहीं है की यह अमृत शरीर में जाते ही शरीर को अमर बनाना शुरू कर देता है !

यह अमृत मुंह से खायी अन्य चीजों की तुलना में उलटे तरीके से काम करता है ! मतलब जब हम मुंह से खाना खाते हैं तो ये खाना सबसे पहले हमारे स्थूल शरीर (हांड मांस से बना शरीर) को पोषण देता है और फिर स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर उर्जा पाता है और अन्ततः कारण शरीर !

वास्तव में हमारे कारण शरीर और आत्मा (soul) में अन्तर बस इतना होता है की हमारे पूर्व जन्म के सारे कर्मों के संस्कार हमारे कारण शरीर को चारों ओर से ढके रहते हैं जबकि आत्मा विशुद्ध होती है !

तो खेचरी मुद्रा से निकला अमृत सबसे पहले हमारे कारण शरीर के संस्कारों को नष्ट करता है फिर सूक्ष्म शरीर को सबल बनाता है और अन्त में स्थूल शरीर (body) की सभी व्याधियों को नष्ट करते हुए स्थूल शरीर को वज्र (Vajra) के समान अभेद्य बनाता है !

पर अजर से अमर बनने की प्रक्रिया बहुत ही लम्बी होती है जिसमें बहुत कम ही योगी (Sadhu. Sant, Sanyasi, Yogi, Tantrik, Aghori, Aughar, bhakt) सफल हो पाते हैं !

जीभ पर गिरे अमृत में एक अक्षर तत्व होता है जिसकी वजह से इसका स्वाद अलग अलग योगियों को अलग अलग तरह से महसूस होता है ! ये अमृत के कण जब स्थूल शरीर में अपना काम शुरू करते हैं तो ये शरीर की हर सेल्स (cells या कोशिका) में बारी बारी घुसकर उसके नाभिक को जकड़ कर रक्षा कवच (armour) बना लेते हैं जिससे वो कोशिका अजर अर्थात व्याधि रहित होती जाती है लेकिन शरीर में अत्याधिक कोशिकाएं होती हैं इसलिए पूरे शरीर को अजर बनने में काफी समय लग जाता है

भविष्य में यही अमृत नाभि स्थित मुख्य कोटर (जिसमे शरीर का मुख्य प्राण रहता है) के चारो ओर भी कवच बना लेता है जिससे शरीर अमर (deathless, fadeless, immortal, undying, perpetual) अर्थात इच्छा मृत्यु की सिद्धि प्राप्त कर लेता है !

इस मुद्रा को सिर्फ योग्य गुरु (Guru) के सानिध्य में ही सीखना चाहिए क्योंकि हर बड़े फल देने वाली हर बड़ी साधना (sadhna) के बीच में कई डरावने अनुभव (fearful experiences & realization) होते हैं जिनसे पैदा हुए भ्रम (hallucination and delusion) से योग्य गुरु ही रक्षा करते हैं !

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