प्रेत पिशाच दिख सकते हैं लेकिन देवता नहीं, क्यों

· May 23, 2016

download (2)ये ऐसा लॉजिक है जिसे समझने में आज का साइंस अभी तक फेल है | धीरे धीरे हिन्दू धर्म में लिखी हर बात नासा समेत यूरोप के सभी वैज्ञानिकों के सामने सही साबित होने से हडकम्प मचा हुआ है और कई सेक्युलर लोगों को ये बात अपने गले उतारने में दिक्कत हो रही है की अभी तक जिसे पाखण्ड, अंधविश्वास आदि का नाम देकर मॉडर्न बनने की लिए पश्चिमी सभ्यता का अन्धाधुन्ध अनुकरण कर रहे थे, वही पश्चिमी सभ्यता वाले अपनी कर्मों से उपजी दुनिया भर की समस्याओं से आजीज आकर अब हमारे परम आदरणीय हिन्दू धर्म के आदर्शों को तेजी से अपना रहें हैं !

कई लोगों को पता ही नहीं होगा की विश्व के सबसे महंगे हॉलीवुड के हीरो, हिरोइन्स बहुत पहले ही हिन्दू धर्म को अपना कर काफी सुखी और तरोताजा महसूस कर रहे हैं जबकि भारत वर्ष के कई हिन्दुओं का कहना है की उन्हें तो हिन्दू धर्म में जन्म लेकर कोई मजा तो मिला ही नहीं तो वो इस वजह से क्योंकि उन्होंने कभी भी ये जानने की कोशिश ही नहीं की हिन्दू धर्म आखिर है क्या हिन्दू धर्म का सबसे पहला सिद्धांत है कि कर्मों की पवित्रता से विचारों की पवित्रता पैदा करना, जिसका की आज के युग में घोर आभाव है | विदेशी जो पहले अपने मनमाने नियम कानून तरीके से लाइफ एन्जॉय करने की कोशिश करते रहे पर बदले में जिन्हें मिली सिर्फ बेचैनी, दुनिया भर की बिमारी आदि आदि पर जब उन्होंने हिन्दू धर्म के आदर्शों को समझा और उसे अपने जीवन में उतारा तो धीरे धीरे उन्हें उनका खोया हुआ सुख संतोष वापस मिलने लगा !

हमारे हिन्दू धर्म में बहुत अच्छे से समझाया गया है, प्रेत पिशाच योनि और देवत्व योनि के बारे में !

भारत के प्राचीन ज्ञान विज्ञानं के मूर्धन्य जानकार श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी बताते है की हमारे आदरणीय हिन्दू धर्म के ग्रन्थोनुसार, प्रेत पिशाच योनि अतृप्त योनि होती है और सामन्यतया इनका शरीर दो तत्वों से बना हुआ होता है और वो तत्व होते हैं वायु और अग्नि इसलिए वे हमें दिखाई नहीं देते हैं पर जब कोई प्रेत पिशाच अपनी अतृप्त इच्छा को पूरी करने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक होता है तब वो लम्बा अनुसन्धान करके अपने शरीर में आकाश तत्व को कुछ देर के लिए समाविष्ट कर लेता है जिससे वो मानवों को दिखने लगता है पर तभी तक के लिए जब तक की आकाश तत्व उसके शरीर में हैं लेकिन इस स्थिति में कोई उसके शरीर को छू नहीं सकता क्योंकि वो वायु स्वरुप ही होता है और उसे छूने वाले का हाथ उसके शरीर के आर पार निकल जाता है जैसा की आपने किसी डरावनी फिल्म में देखा होगा !

श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी का कहना है की कुछ बेहद अतृप्त प्रेत पिशाच, छूने का भी अहसास पाना चाहते हैं इसलिए वे बहुत प्रयास करके अपने अन्दर आकाश तत्व के साथ जल तत्व का भी समावेश कर लेते है, जिससे कुछ देर के लिए वे स्पर्श का भी अनुभव पा सकते हैं पर इस स्थिति में कोई आदमी अगर उस प्रेत पिशाच को छू ले तो उसे लगेगा जैसे उसने बर्फ को छू लिया मतलब इतना ठंडा होता है उनका शरीर !

श्री डॉक्टर उपाध्याय जी आगे बताते हैं की, प्रेत पिशाच योनि वाले चाहे कुछ भी कर लें, वे पांचवें तत्व यानी पृथ्वी तत्व का अपने शरीर में समावेश नहीं कर सकते हैं क्योंकि पांच तत्व से ही तो हम मानवों का शरीर बना हुआ है और किसी भी प्रेत पिशाच को प्रेत पिशाच योनि से वापस मानव योनि में आने के लिए उसे पहले सारे पापों का प्रयाश्चित करना पड़ता है तब अगर उसके कर्म इस लायक रहे की मानव जैसी दुर्लभ योनि मिल सके तो ही मानव योनि मिलती है, अन्यथा उसे निम्न योनि जैसे कीड़े, मकोड़े, जीव, जन्तु, पेड़, पौधों आदि की योनि में भेजा जा सकता है | पृथ्वी तत्व की कमी की वजह से ही हर प्रेत पिशाच का शरीर कभी भी पृथ्वी का स्पर्श करके नहीं चलता है बल्कि हमेशा जमीन से कुछ ऊपर उठा हुआ होता है !

श्री डॉक्टर सौरभ जी का कहना है की उच्च योनियाँ जैसे देव योनि आदि में शरीर 6 तत्वों से बना हुआ होता है जिसमे पांच तत्व वायु, आकाश, अग्नि, जल और पृथ्वी के अलावा अक्षर तत्व भी होता है ! ये अक्षर तत्व वो होता है जो इन देव लोगों के दिव्य शरीरों का क्षरण (नाश) नहीं होने देता है और इन्हें हमेशा युवा, महाबली और अजर बनाये रहता है ! इसीलिए इन देव पुरुषों के शरीर का तेज सामान्य मानव बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं ! अगर इन देव पुरुषों को मानव स्थूल आँखों से देख ले तो देव पुरुषों के दिव्य तेज से मानव अँधा हो जाएगा और उसकी त्वचा भी जल जाएगी !

श्री डॉक्टर उपाध्याय जी आगे बताते हैं की, अगर ये देव अपने अक्षर तत्व को कुछ देर के लिए अपने शरीर से बाहर कर दें तो हर मानव इन्हें आसानी देख सकता है पर इस दौरान उस देवता के पञ्च तत्वों के शरीर की किसी कारण से मौत हो गयी तो वो देव पुरुष बुरी तरह से फंस सकता है क्योंकि उसे जो नयी शरीर मिलेगी, उसमे उसे छठवें तत्व को फिर से समावेश करने का तरीका जानना बहुत मुश्किल होगा, जिससे वो देव पुरुष अनन्त काल के लिए भटकाव के चक्र में फंस सकता है बिना देव शरीर वापस पाए इसलिए देव पुरुष अपने तेज को कम करके साधारण मानवों के सामने आने की बजाय सिर्फ उन्ही तपस्वी सन्तों को दर्शन देते हैं जो उनका रूप बर्दाश्त करने की क्षमता रखते हों !

कई लोग देवताओं को ही भगवान् समझते हैं जबकि ये गलत है | देवता, भगवान के द्वारा बनाये हुए प्राणी है जैसे की हम लोग, पर देवताओं को हमारी तुलना में ज्यादा सुख और शक्तियां प्राप्त होती है क्योंकि वो देवता जब पूर्व जन्म में मानव थे तो उन्होंने अच्छे कर्म जैसे गरीबों, बीमारों की सहायता आदि किये थे, जिसकी वजह से उन्हें मरने के बाद देवलोक मिला पर उनके अच्छे कर्म काफी कम पड़ गए जिसकी वजह से उन्हें मरने के बाद सीधे भगवान का लोक नहीं मिला बल्कि उससे नीचे का लोक, देवलोक मिला | केवल एक स्वर्ग ही देवताओं का लोक या निवास स्थान नहीं है, स्वर्ग के अलावा और अन्य कई उच्च लोक (जैसे की भुंवर लोक आदि) भी हैं इस ब्रह्माण्ड में, जहां मानवों से उच्च योनियाँ निवास करती हैं !

श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी का कहना है की, एक बात और ध्यान देने वाली है की हमारे हिन्दू धर्म के ज्ञान के मुताबिक हम मानव तीन आयामी (लम्बाई, चौड़ाई, उचाई) संसार में रहते हैं इसलिए 3 आयाम से ज्यादा आयाम के लोकों को उच्च लोक कहते हैं और 3 आयाम से नीचे आयाम के लोकों को निम्न लोक कहते हैं |

11 वें आयाम में ब्रह्माण्ड के निर्माता श्री ब्रह्मा जी रहते है | पर इन सभी 11 आयाम और इन सभी आयाम में रहने वाले सभी प्राणी चाहे वो निम्न हों, मानव हों या देव हों का विलय, नाश या समाप्ति हो जाती है जब महा माया परम सत्ता की अध्यक्षता में महा प्रलय करती है !

पर परम सत्ता का जो निज धाम या निवास स्थान है, जो कृष्ण भक्त को गोलोक प्रतीत होता है, शिव के भक्तों को शिव लोक और नारायण के भक्त को बैकुण्ठ प्रतीत होता है उसका कभी भी नाश नहीं होता है क्योंकि वो अनन्त आयाम से बना हुआ है और वहां जाने का महा सौभाग्य पाने वाले भक्तों के शरीर भी अनन्त तेजस्वी अक्षर तत्व से बना हुआ होता है !

भगवान् के परम निजी और परम दिव्य लोक में निवास का महा सौभाग्य सिर्फ उन्ही को प्राप्त होता है जिन पर परमात्मा की महान कृपा हो और इस महान कृपा का हक़दार वही है जिसका मन वचन कर्म सब सिर्फ दूसरों की भलाई में ही मृत्यु पर्यन्त लगा रहे !

(आवश्यक सूचना- विश्व के 169 देशों में स्थित “स्वयं बनें गोपाल” समूह के सभी आदरणीय पाठकों से हमारा अति विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि आपके द्वारा पूछे गए योग, आध्यात्म से सम्बन्धित किसी भी लिखित प्रश्न (ईमेल) का उत्तर प्रदान करने के लिए, कृपया हमे कम से कम 6 घंटे से लेकर अधिकतम 72 घंटे (3 दिन) तक का समय प्रदान किया करें क्योंकि कई बार एक साथ इतने ज्यादा प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हो जातें हैं कि सभी प्रश्नों का उत्तर तुरंत दे पाना संभव नहीं हो पाता है ! वास्तव में “स्वयं बनें गोपाल” समूह अपने से पूछे जाने वाले हर छोटे से छोटे प्रश्न को भी बेहद गंभीरता से लेता है इसलिए हर प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर प्रदान करने के लिए, हम सर्वोत्तम किस्म के विशेषज्ञों की सलाह लेतें हैं, इसलिए हमें आपको उत्तर देने में कभी कभी थोड़ा विलम्ब हो सकता है, जिसके लिए हमें हार्दिक खेद है ! कृपया नीचे दिए विकल्पों से जुड़कर अपने पूरे जीवन के साथ साथ पूरे समाज का भी करें निश्चित महान कायाकल्प)-

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