स्वयं बने गोपाल

आत्मकथा – दान पुण्य (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दान पुण्य मेरा विचार है कि ”न देने से देना अच्छा है”। कोई आकर हम से कुछ माँगता है, तो हम उसको क्या देते हैं। एक दो पैसे। जो हमारे लिए कुछ नहीं है,...

आत्मकथा – मृत्यु क्या है (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु क्या है जब किसी की बीमारी बढ़ जाती है, और वह समझ लेता है कि अब बचने की आशा नहीं, तो सब ओर से हटकर उसका जी यह सोचने लगता है कि मृत्यु...

आत्मकथा – मृत्यु का भय (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का भय मृत्यु क्या है? यह आप लोगों ने समझ लिया। जैसा हमें बतलाया गया है, उससे पाया जाता है कि मृत्यु कोई ऐसी वस्तु नहीं है, कि जिससे कोई डरे। यह सच...

आत्मकथा – मृत्यु का प्रभाव (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का प्रभाव संसार में आज जो अमन दिखलाई पड़ रहा है, धुली हुई चाँदनी सी शान्ति जो चारों ओर छिटकी हुई है। जब आप यह जानेंगे कि इसमें सबसे अधिक श्रेय मृत्यु का...

आत्मकथा – स्वर्ग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

स्वर्ग जब किसी के जी में यह बात जम जाती है कि अब जीवन के दिन इने-गिने ही हैं, जब कूच का नगारा बजने लगता है, मौत सामने खड़ी दिखलाती है, उस समय यदि...

आत्मकथा – नरक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

नरक स्वर्ग के साथ नरक के विषय में तेरहवें सर्ग में बहुत सी बातें लिखी जा चुकी हैं। जैसे स्वर्ग के विषय में भूतल के समस्त ग्रन्थ एक राय हैं, और उसके अस्तित्व को...

आत्मकथा – जन्मान्तर वाद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जन्मान्तर वाद पुनर्जन्म का सिद्धान्त आर्य जाति की उच्च कोटि की मननशीलता का परिणाम है। इसीलिए चाहे सनातन धर्म हो, चाहे बौद्ध धर्म उनमें पुनर्जन्म वाद स्वीकृत है। अन्य धर्मों अर्थात् ईसवी, मुसल्मान, और...

आत्मकथा – संसार (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

संसार क्या है? प्रकृति का क्रीड़ा स्थल, रहस्य निकेतन, अद्भुत व्यापार समूह का आलय, कलितकार्य कलाप का केतन, ललित का लीलामन्दिर, विविध विभूति अवलम्बन, विचित्र चित्र का चित्रपट, अलौकिक कला का कल आकर, भव्य-भाव...

लेख – चार (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रिय विचारशील एवं विवेचक महाशय, ‘चार’ शब्द से आशा है कि आप भली-भाँति परिचय रखते होंगे और समाचार, दुराचार, अत्याचार, अनाचार, सदाचार, शिष्टाचार, आचार, उपचार, प्रचार, विचार, उचार, अचार इत्यादि पदों के अन्त में...

लेख – धाराधीश की दान-धारा (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

महाराज भोज की गणना भारतवर्षीय प्रधान दानियों में होती है। वे अपने समय के धन-कुबेर तो थे ही, दानि-शिरोमणि भी थे। यदि वे मुर्तिमन्त दान थे तो उनकी धारानगरी दानधारा-तरंगिणी थी। हृदय इतना उदार...

लेख – भगवान भूतनाथ और भारत (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत के आधार से ही भगवान भूतनाथ की कल्पना हुई है। वे असंख्य ब्रह्माण्डाधिपति और समस्त सृष्टि के अधीश्वर हैं। उनके रोम-रोम में भारत जैसे करोड़ों प्रदेश...

बाल साहित्य – चंदा मामा (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

चंदा मामा, दौड़े आओ दूध कटोरा भरकर लाओ। उसे प्यार से मुझे पिलाओ मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ। मैं तेरा मृग छौना लूँगा उसके साथ हँसूँ-खेलूँगा। उसकी उछल-कूद देखूँगा उसको चाटूँगा, चूमूँगा।

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 3 – बोलचाल विशेष वक्तव्य (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मनुष्य को कभी-कभी ऐसा कार्य हाथ में लेना पड़ता है, जिसमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तिा नहीं होती, अब मैं एक ऐसा ही विषय हाथ में ले रहा हूँ, जिस पर मैं कुछ लिखना नहीं चाहता...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 3 – चोखे चौपदे (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जो किसी के भी नहीं बाँधो बँधो। प्रेमबंधान से गये वे ही कसे। तीन लोकों में नहीं जो बस सके। प्यारवाली आँख में वे ही बसे। पत्तिायों तक को भला वै+से न तब। कर...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 3 – चुभते चौपदे (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

गागर में सागर देवदेव चौपदे अब बहुत ही दलक रहा है दिल। हो गईं आज दसगुनी दलवें+। उ+बता हूँ उबारने वाले। आइये, हैं बिछी हुई पलवें+। डाल दे सिर पर न सारी उलझनें। जी...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – भूमिका (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

ग्रंथावली के प्रस्तुत (चौथे) खंड में ‘हरिऔधा’ के खड़ीबोली के स्फुट काव्य को शामिल किया गया है। इसके पहले तीन खंड भी कविता से सम्बध्द हैं, जिसमें ‘हरिऔधा’ के ब्रजभाषा-काव्य, खड़ीबोली के महाकाव्य और...