स्वयं बने गोपाल

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 19 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बन में जहाँ जाकर खोर लोप होती थी, वहाँ के पेड़ बहुत घने नहीं थे। डालियों के बहुतायत से फैले रहने के कारण, देखने में पथ अपैठ जान पड़ता, पर थोड़ा सा हाथ-पाँव हिलाकर...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 20 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

धीरे-धीरे रात बीती, भोर हुआ, बादलों में मुँह छिपाये हुए पूर्व ओर सूरज निकला-किरण फूटी। पर न तो सूरज ने अपना मुँह किसी को दिखलाया, न किरण धरती पर आयी। कल की बातें जान...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 21 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बासमती के चले जाने पर देवहूती अपनी कोठरी में से निकली, कुछ घड़ी आँगन में टहलती रही, फिर डयोढ़ी में आयी। वहाँ पहुँच कर उसने देखा, बासमती पहरे के भीलों से बातचीत कर रही...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 22 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दिन बीतता है, रात जाती है, सूरज निकलता है, फिर डूबता है, साथ ही हमारे जीने के दिन घटते हैं। हम लोगों से कोई पूछता है, तो हम लोग कहते हैं, मैं बीस बरस...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 23 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

एक चूकता है-एक की बन आती है। एक मरता है-एक के भाग्य जागते हैं। एक गिरता है-एक उठता है। एक बिगड़ता है-एक बनता है। एक ओर सूरज तेज को खोकर पश्चिम ओर डूबता है-दूसरी...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 24 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज तक मरकर कोई नहीं लौटा, पर जिसको हम मरा समझते हैं, उसका जीते जागते रहकर फिर मिल जाना कोई नई बात नहीं है। ऐसे अवसर पर जो आनन्द होता है-वह उस आनन्द से...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 25 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बासमती के मारे जाने पर दो चार दिन गाँव में बड़ी हलचल रही, थाने के लोगों ने आकर कितनों को पकड़ा, मारनेवाले को ढूँढ़ निकालने के लिए कोई बात उठा न रखी, पर बासमती...

उपन्यास – अधखिला फूल – अध्याय 26 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज दस बरस पीछे हम फिर बंसनगर में चलते हैं। पौ फट रहा है, दिशाएँ उजली हो रही हैं, और आकाश के तारे एक-एक कर के डूब रहे हैं। सूरज अभी नहीं निकला है,...

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 1 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बटोही ने जो कुछ आँखों देखा, कानों सुना, वह सब बातें उसको चकरा रही थीं, दुखी बना रही थीं, और सता रही थीं, पर इस घड़ी वह बहुत ही अनमना हो रहा था, वह...

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 2 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पहला ठाट ललकि ललकि लोयनन तेहि, लखि लखि होहु निहाल। लाली इत उत की लहत, लहे जीव जेहि लाल। एक ग्यारह बरस की लड़की अपने घर के पास की फुलवारी में खड़ी हुई किसी...

उपन्यास – ठेठ हिंदी का ठाट – अध्याय 3 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आठवाँ ठाट बटोही ने जो कुछ आँखों देखा, कानों सुना, वह सब बातें उसको चकरा रही थीं, दुखी बना रही थीं, और सता रही थीं, पर इस घड़ी वह बहुत ही अनमना हो रहा...

कविताएँ – कविता संग्रह (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

फूल और काँटा फूल और काँटा हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता । मेह...

लेख – करुणरस (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

करुणरस द्रवीभूत हृदय का वह सरस-प्रवाह है, जिससे सहृदयता क्यारी सिंचित, मानवता फुलवारी विकसित और लोकहित का हरा-भरा उद्यान सुसज्जित होता है। उसमें दयालुता प्रतिफलित दृष्टिगत होती है, और भावुकता-विभूति-भरित। इसीलिए भावुक-प्रवर-भवभूति की भावमयी...

कविता – वैदेही-वनवास – उपवन रोला (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

लोक-रंजिनी उषा-सुन्दरी रंजन-रत थी। नभ-तल था अनुराग-रँगा आभा-निर्गत थी॥ धीरे-धीरे तिरोभूत तामस होता था। ज्योति-बीज प्राची-प्रदेश में दिव बोता था॥1॥ किरणों का आगमन देख ऊषा मुसकाई। मिले साटिका-लैस-टँकी लसिता बन पाई॥ अरुण-अंक से छटा...

कविता – वैदेही-वनवास – चिन्तित चित्त चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध के राज मन्दिरों मध्य। एक आलय था बहु-छबि-धाम॥ खिंचे थे जिसमें ऐसे चित्र। जो कहाते थे लोक-ललाम॥1॥ दिव्य-तम कारु-कार्य अवलोक। अलौकिक होता था आनन्द॥ रत्नमय पच्चीकारी देख। दिव विभा पड़ जाती थी मन्द॥2॥...

कविता – वैदेही-वनवास – मन्त्रणा गृह चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मन्त्रणा गृह में प्रात:काल। भरत लक्ष्मण रिपुसूदन संग॥ राम बैठे थे चिन्ता-मग्न। छिड़ा था जनकात्मजा प्रसंग॥1॥ कथन दुर्मुख का आद्योपान्त। राम ने सुना, कही यह बात॥ अमूलक जन-रव होवे किन्तु। कीर्ति पर करता है...