स्वयं बने गोपाल

निबंध – भाषा और साहित्य (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

श्रीमन् स्‍वागताध्‍यक्ष महोदय, देवियो और सज्‍जनो, इस स्‍थान से आपको संबोधित करते हुए मैं अपनी दीनता के भार से दबा-सा जा रहा हूँ। जिन साहित्‍य के महारथियों से इस स्‍थान की शोक्षा बढ़ चुकी...

निबंध – माँ के आँचल में (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

वह आँधी सब जगह आयी, रूस, जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, टर्की, चीन सब देशों के वन-उपवन उसके झोंके से कंपित हो उठे। प्रजातंत्र की वह आँधी कई देशों में आयी और उसने जनता की छाती...

निबंध – मानव-स्वत्व (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

संसार की स्‍वाधीनता के विकास का इतिहास उस अमूल्‍य रक्‍त से लिखा हुआ है, जिसे संसार के भिन्‍न-भिन्‍न भाग के कर्तव्‍यशील वीर पुरुषों ने स्‍वत्‍वों की रणभूमि में करोड़ों मूक और निर्बल प्राणियों की...

निबंध – युद्धोत्तर विश्व : आगामी महाभारत (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

मनुष्य के हृदय में यह भाव निरंतर काम किया करता है कि वह दूसरों पर प्रभुता प्रापत करके अपने को सबसे ऊपर रखे। विकास और उन्‍नति की दृष्टि से यह भाव निंदनीय नहीं है।...

निबंध – युवकों का विद्रोह (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

कुछ समय से हमारे अधिकांश नौजवान जिस वातावरण में है, उससे वे संतुष्‍ट नहीं है। निष्क्रियता में मुर्दों से बाजी लगाने वाले इस देश के युवक इस समय परिवर्तन और क्रांति का उत्‍साह के...

निबंध – राष्ट्र की आशा (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

मेज्जिनी का आदेश ‘हममें से प्रत्‍येक का कर्तव्‍य है कि वह अपनी आत्‍मा को एक देवालय के समान पवित्र बनावे। उससे अहंकार को दूर भगा दे और सच्‍चे धार्मिक भाव के साथ निज जीवन...

निबंध – राष्ट्र की नींव (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

राष्‍ट्र महलों में नहीं रहता। प्रकृत राष्‍ट्र के निवास-स्‍थल वे अगणित झोंपड़े हैं, जो गाँवों और पुरवों में फैले हुए खुले आकाश के देदीप्‍यमान सूर्य और शीतल चन्‍द्र और तारागण से प्रकृति का संदेश...

निबंध – राष्ट्रीय शिक्षा (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

8 अप्रैल से 15 अप्रैल तक देश के कितने ही स्‍थानों में राष्‍ट्रीय शिक्षा का सप्‍ताह मनाया जायेगा। इन उत्‍सवों का मतलब यह होगा कि लोग राष्‍ट्रीय शिक्षा की बात को अच्‍छी तरह समझें।...

निबंध – राष्ट्रीयता (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

देश में कहीं-कहीं राष्‍ट्रीयता के भाव को समझने में गहरी और भद्दी भूल की जा रही है। आये दिन हम इस भूल के अनेकों प्रमाण पाते हैं। यदि इस भाव के अर्थ भली-भाँति समझ...

निबंध – लोकमान्य‍ की विजय (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

कवि-श्रेष्‍ठ मिल्‍टन की उक्ति है कि शान्तिकाल की विजय युद्धकाल की विजयी से कम नहीं होती। हमारा विचार है कि शान्तिकाल की विजय अधिक स्‍थायी, अधिक गौरवप्रद और अधिक वास्‍तविक होती है। शान्तिकाल की...

निबंध – लक्ष्य से दूर (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

हम अपने लक्ष्‍य से दूर हटते जा रहे हैं। देश की आजादी का सवाल हमारे सामने है। कुछ समय पहले अधिकांश कार्यकर्ताओं को रात-दिन उसी की धुन थी, परंतु इस समय वे शिथिल हैं।...

निबंध – लोक-सेवा (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

वर्तमान युग अधिकारों का युग है। संसार के कोने-कोने से अधिकारों की ध्‍वनि उठ रही है। अत्‍याचारों से पीड़ित व्‍यक्तियों और समूहों से लेकर स्‍वतंत्र और शक्तिसंपन्‍न व्‍यक्तियों और समूहों तक सभी ने वर्तमान...

निबंध – वे दीवाने (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

अनुत्‍तरदायी? जल्‍दबाज? अधीर, आदर्शवादी? लुटेरे? डाकू? हत्‍यारे? अरे, ओ दुनियादार, तू किस नाम से, किस गाली से विभूषित करना चाहता है? वे मस्‍त हैं। वे दीवाने हैं। वे इस दुनिया के नहीं हैं। वे...

निबंध – वज्रपात : देशबंधु दास (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

यह वज्रपात है। वज्रपात देश के हृदय-स्‍थल पर! स्‍वप्‍न में भी इस बात का ध्‍यान न हुआ था कि अचानक ऐसा हो जायेगा। तार पढ़ते हुए भी कुछ क्षण तक यह विश्‍वास न हुआ...

निबंध – शिक्षा का प्रथम – I (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

शिक्षा के अधिक प्रचार से देश को जो बड़ा लाभ हो सकता है, उस पर कुछ कहना-सुनना मानी हुई बातों को दोहराना है। किसी भी उद्देश्‍य से हो, परंतु इस बात को स्‍वीकार करना...

निबंध – शिक्षा का प्रथम -I I (लेखक – गणेशशंकर विद्यार्थी)

वैसे तो हमारा देश-भर शिक्षा में, मनुष्‍य की बाहरी उन्‍नति के इस परमावश्‍यक साधन के विषय में, संसार-भर के सभ्‍य देशों से बहुत पिछड़ा हुआ है, परंतु देश में भी हमारा प्रांत इस विषय...