मरे हुए को जिन्दा करने की विद्या : मृत संजीवनी विद्या

· August 6, 2016

zzzzमृत्युंजय मन्त्र साधना और मृत संजीवनी मन्त्र साधना दोनों अलग अलग साधना है ! हमारे परम आदरणीय हिन्दू धर्म के दुर्लभ शास्त्र कहते हैं की मृत्युंजय मन्त्र साधना में जिन्दा आदमी की किसी भी कारण से हो सकने वाली मृत्यु को टालने का प्रयास किया जाता है जबकि मृत संजीवनी मन्त्र साधना में मर चुके आदमी को फिर से जिन्दा करने का प्रयास किया जाता है !

प्राचीन भारत के ज्ञान विज्ञान के मूर्धन्य जानकार श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी बताते हैं की हमारे बेहद कीमती शास्त्रों के अनुसार, ये दोनों विद्याएँ बहुत ही कठिन है पर मृत संजीवनी विद्या (mrit sanjivani mantra yoga practice in hindi) विशेष कठिन है क्योंकि इसमें मरा हुआ शरीर चाहे कितनी भी सड़ी गली या कटी फटी अवस्था में हो उसे जिन्दा किया जा सकता है !

मृत्युंजय मन्त्र साधना (maha mrityunjaya mantra yoga sadhana in hindi) में मृत्यु चाहे जिस भी कारण (चाहे कैंसर, एड्स हो या कोई एक्सीडेंट) से पास आ रही हो रुक जाती है और शरीर पहले की तरह धीरे धीरे स्वस्थ भी हो जाता है ! मृत्युंजय मन्त्र साधना से शरीर पहले अजर होता है और फिर अमर ! अजर मतलब शरीर की सारी व्याधियों का नाश होना और अमर का मतलब होता है कभी ना मरना और हमेशा जवान भी बने रहना !

श्री डॉक्टर सौरभ जी बताते हैं की, जब कोई मृत्युंजय मन्त्र की साधना करता है तो उसे अजर बनने में ही कई वर्ष लग सकते है और अजर से अमर बनना तो बहुत ही लम्बी प्रकिया है !

महामृत्युंजय मन्त्र साधना का लाभ कोई भी ले सकता है चाहे वो कोई भी कितना बूढ़ा आदमी हो, बहुत छोटा बालक हो या स्त्री हो !

पर महामृत्युंजय मन्त्र साधना के साथ जो सबसे बड़ी खास बात है की इसकी साधना बेहद सावधानी से करना चाहिए क्योंकि इसमें गलत जप करने पर यह भी सुनने को मिलता है की कोई भारी नुकसान, कठिन रोग या आकस्मिक मृत्यु तक भी हो जाती है !

अतः जिस आदमी के अन्दर संस्कृत के इस कठिन मन्त्र को अति शुद्धता पूर्वक और पूरे विधि विधान पूर्वक जप सकने की क्षमता हो सिर्फ उसे ही इस साधना को करना चाहिए !

श्री डॉक्टर उपाध्याय जी बताते हैं की, रावण ने भी मृत्यु को जीता था और अमृत को अपने नाभि में धारण किया था ! दरअसल नाभि में ही एक बेहद सूक्ष्म कोटर में हर व्यक्ति का मुख्य प्राण रहता है और जब मृत्यु होती है तो यही प्राण शरीर के 5 प्रत्यक्ष या 1 अप्रत्यक्ष रास्ते से बाहर निकल जाता है !

तो जब कोई अमरत्व की साधना में सफलता प्राप्त कर लेता है तो उसके नाभि स्थित प्राण के चारो ओर अमृत का खोल चढ़ जाता है जिससे वो तब तक मर नहीं सकता या बूढ़ा नहीं हो सकता जब तक उसके प्राण पर अमृत का खोल रहता है !

रावण इसी घमण्ड में था की उसे कोई मार नहीं सकता पर उसका महा अधर्म, उसके द्वारा एक अति पवित्र स्त्री माँ सीता के अपमान का महा पाप ही प्रभु श्री राम के बाण की नोक पर बैठ गया और उस अमृत के कवच को भी तोड़ कर नाभि के प्राण को मुक्त कर दिया !

हमारे शास्त्र कहते हैं की इस अमृत साधना से व्यक्ति अपने खुद के कटे हुए अंगो को फिर से उगा सकता है या किसी बीमारी या विकलांगता से खराब हुए अंगों को फिर से सही कर सकता है तथा अपनी बूढ़ी, जर्जर और कमजोर हो चुकी शरीर को फिर से एकदम जवान कर सकता है, बशर्ते वो इस मृत्युंजय साधना को एकदम शुद्धता पूर्वक और पूरे विधि विधान से करे !

श्री डॉक्टर सौरभ उपाध्याय जी आगे बताते हैं की मृत संजीवनी विद्या, वही विद्या है जिससे देवासुर संग्राम में शुक्राचार्य ने मरे हुए दैत्यों को फिर से जीवित किया था ! इस साधना में कई यौगिक, मान्त्रिक और भौतिक प्रक्रियाएं शामिल होती है ! इस विद्या को सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के लिए आदमी के अन्दर बहुत जिगर होना चाहिए ! इस साधना के लिए 6 अति दिव्य औषधियों का मिश्रण लेना होता है और पारे के साथ विशेष बर्तन में पकाना पड़ता है ! इन 6 औषधियों में सिर्फ एक ही औषधि (जिसे सोम कहते है) आज पृथ्वी पर हिमालय के क्षेत्र में उपलब्ध है बाकी 5 औषधियाँ उच्च लोकों (स्वर्ग लोक आदि) में ही मिलती है !

इन औषधियों को पारे के साथ पकाने पर एक अग्नि के समान दहकता दिखता हुआ, स्वर्ण आभा लिए हुए एक महा दिव्य पेय तैयार होता है ! इसी दिव्य तरल को मरे हुए शरीर में डाला जाता है और जो डालता है उसे कुछ घंटे तक अपनी सांस रोक कर प्राणायाम की कुम्भक की स्थिति में बैठना पड़ता है जब तक की ये तरल मरे हुए शरीर के सभी कोशों का फिर से निर्माण न कर दे !

अगले कुछ घंटे में मरे हुए शरीर का फिर से नये स्वस्थ शरीर की तरह निर्माण हो जाता है, बस कमी रह जाती है तो प्राण की जिसके बिना ये शरीर जीवित नहीं कही जा सकती है ! उस नव निर्मित शरीर में प्राण डालने के लिए, उस व्यक्ति को जिसने पिछले कुछ घंटे से अपनी सांस रोक कर रखी थी, उसे अपना सूक्ष्म शरीर प्राण के साथ, अपने स्थूल शरीर से बाहर निकाल कर उस नव निर्मित शरीर के अन्दर घुसना पड़ता है जिसे परकाया प्रवेश की विशिष्ट स्थिति भी कहते हैं ! फिर अन्दर घुस कर मृत संजीवनी मन्त्र के साथ कुछ विशिष्ट मन्त्रों का पूरे विधान से पाठ कर मरे हुए शरीर के प्राण का आवाहन करना पड़ता है जिससे उस मान्त्रिक घेरे से सुरक्षित शरीर में सिर्फ अभीष्ट आत्मा ही वापस आ पाये ना की कोई अवांछनीय आत्मा ! इस तरह करने से कुछ क्षणों में मरे हुए के प्राण, सही में वापस उस देह में आ जाता है और मरा हुआ आदमी पुनर्जीवित हो उठता है ! नव निर्मित शरीर के प्राण वापस आने पर आवाहन कर्ता को अपना सूक्ष्म शरीर और प्राण वापस अपने शरीर में लौटा लेना चाहिए ! इस तरह मृत संजीवनी की कठिन विद्या सफल होती है ! इस तरह से ये प्रक्रिया अत्यंत कठिन के साथ खतरनाक भी है जिसमे थोड़ी सी चूक के भी कल्पना से परे अन्जाम हो सकते हैं !

मृत संजीवनी विद्या को इतना गुप्त इसलिए रखा गया है क्योंकि एक आदमी जब जब जन्म लेता है या मरता है तब तब उसे उम्मीद से कई गुना बढ़कर भयंकर दर्द होता है (कहावत है की जन्मत मरत दुसह दुःख होई), तो ऐसे में किसी को पुनर्जन्म देने से पहले हजार बार यह सोचना चाहिए की क्या वाकई में इसकी जरूरत है की नहीं !

12341199_1532048380444188_5623270703532464001_nमृत संजीवनी विद्या और मृत्युंजय साधना के अधिष्ठात्रा भगवान् शिव है !

श्री डॉक्टर उपाध्याय बताते हैं की, असल में ईश्वर मुख्य रूप से निराकार है मतलब उनका कोई आकार या सीमा नहीं है ! पर जब जब ये ईश्वर आकार लेते हैं, चाहे राम, शिव, कृष्ण आदि के रूप में तो इनकी शक्ति भी आकार के समान ही सीमित होती है (पर इनकी सीमित शक्ति, साधारण मानवों के लिए कल्पना से परे मतलब असीमित है) ! तो इन रूपों (राम, कृष्ण, शिव आदि रूपों में) में ईश्वर खुद अपने निराकार ईश्वर के सामर्थ्य का लगातार अनुसन्धान करते रहते हैं !

जैसे निराकार ईश्वर के ही साकार अवतार भगवान् ब्रह्मा जी ने अपने ही पिता निराकार ईश्वर पर अनुसन्धान करके या साधारण भाषा में कहें तो तप करके, अपने पिता से सभी जीवों को पैदा करने की शक्ति विकसित की पर वो उस समय, अपने ही पैदा किये हुए जीव के मरने पर उसे फिर से जिन्दा करने की कला नहीं जान पाए और इस कला को भगवान् शिव ने निराकार ईश्वर से सीखा और उसे सभी योग्य पात्रों में इस कला का ज्ञान बाटा भी !

इसीलिए आपने भगवान् शिव को हमेशा तप करते हुए देखा होगा क्योंकि वो अपने ही स्वरुप और असीमित ईश्वर से निरन्तर ज्ञान प्राप्त करते रहते हैं !

श्री डॉक्टर उपाध्याय जी बताते हैं की, कुछ लोग यह भी कहते हैं की श्री शिव, भगवान् होने के बावजूद भांग का नशा करते है जो की गलत है ! पर वे लोग इसलिए ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि उन्हें पूरी सच्चाई पता नहीं होती है !

भगवान् शिव, सिर्फ भांग नहीं खाते हैं बल्कि भांग के साथ 5 और अन्य औषधियों का भी मिश्रण खाते हैं और इन 6 औषधियों के दुर्लभ मिश्रण को खाने से मस्तिष्क में एक गुप्त स्थान है जिसे मणि स्थान कहते हैं, वहां पर भयंकर मन्थन शुरू हो जाता है और फिर उस मन्थन से एक से बढ़कर एक दिव्य ज्ञान का प्रकटीकरण होता है ठीक उसी तरह से जैसे की देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन से अमृत, श्री लक्ष्मी आदि महा रत्न पैदा हुए थे ! भगवान् शंकर द्वारा खाने वाले इन 6 औषधियों का मिश्रण सिर्फ भगवान् शिव ही बर्दाश्त कर सकते है, साधारण मनुष्य तो इसे खाते ही कोमा में चला जायेगा !

वास्तव में हमारे परम आदरणीय हिन्दू धर्म में वर्णित सभी ज्ञान विज्ञान की बाते बहुत ही कीमती हैं तथा इस ज्ञान विज्ञान के सच्चे जानकार बहुत कम बचे हैं, पर इस ज्ञान विज्ञान के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले ढोंगी बहुत है !

इन्ही ढोंगी और झूठे लोगों की वजह से ही पूरा हिन्दू धर्म बदनाम होता है, अतः ऐसे में समझदार लोगों को अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हुए अपने इस बेहद कीमती धर्म की दुर्लभ जानकारियों को पूरी तरह से नष्ट होने से बचाने का लगातार प्रयास करना चाहिए !

(नोट – ऊपर वर्णित लेख में कुछ विशिष्ट विधियों की जानकारी विस्तार से नहीं दी गयी है क्योंकि इन जानकारियों का सम्पूर्ण और सम्यक ज्ञान एवं अनुभव सिर्फ योग्य गुरु के सानिध्य में ही प्राप्त किया जा सकता है ! उपर्युक्त लेख का उददेश्य केवल भारतवर्ष के परम आदरणीय हिन्दू धर्म के गौरव शाली अतीत की जानकारी प्राप्त कराना है)



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