Author: gopalp

लेख – निरुद्देश्‍य – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

निरुद्देश्‍य का अर्थ है उद्देश्‍यरहित, अर्थात् बिना प्रयोजन का। प्रयोजन बिना तो कोई मंदबुद्धि भी काम नहीं करता। इसलिए कोई समझदार घुमक्कड़ यदि निरुद्देश्‍य ही बीहड़पथ को पकड़े तो यह विचित्र-सी बात है। निरुद्देश्‍य...

लेख – स्वावलंबन – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

घुमक्कड़ी का अंकुर किसी देश, जाति या वर्ग में सीमित नहीं रहता। धनाढ्य कुल में भी घुमक्कड़ पैदा हो सकता है, लेकिन तभी जब कि उस देश का जातीय जीवन उन्‍मुख हो। पतनशील जाति...

लेख – प्रेम – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

घुमक्कड़ को दुनिया में विचरना है, उसे अपने जीवन को नदी के प्रवाह की तरह सतत प्रवाहित रखना है, इसीलिए उसे प्रवाह में बाधा डालने वाली बातों से सावधान रहना है। ऐसी बाधक बातों...

लेख – स्‍मृतियाँ – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

घुमक्कड़ असंग और निर्लेप रहता है, यद्यपि मानव के प्रति उसके हृदय में अपार स्‍नेह है। यही अपार स्‍नेह उसके हृदय में अनंत प्रकार की स्‍मृतियाँ एकत्रित कर देता है। वह कहीं किसी से...

लेख – शिल्‍प और कला – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

घुमक्कड़ के स्वावलंबी होने के लिए उपसुक्त कुछ बातों को हम बतला चुके हैं। क्षौरकर्म, फोटोग्राफी या शारीरिक श्रम बहुत उपयोगी काम हैं, इसमें शक नहीं; लेकिन वह घुमक्कड़ की केवल शरीर-यात्रा में ही...

लेख – देशज्ञान – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

आज जिस प्रकार के घुमक्कड़ों की दुनिया को आवश्‍यकता है, उन्‍हें अपनी यात्रा केवल ”स्वांत: सुखाय” नहीं करनी है। उन्‍हें हरेक चीज इस दृष्टि से देखनी है, जिसमें कि घर बैठे रहनेवाले दूसरे लाखों...

लेख – पिछड़ी जातियों में – घुमक्कड़-शास्त्र – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

बाहरवालों के लिए चाहे वह कष्‍ट, भय और रूखेपन का जीवन मालूम होता हो, लेकिन घुमक्कड़ी जीवन घुमक्कड़ के लिए मिसरी का लड्डू है, जिसे जहाँ से खाया जाय वहीं से मीठा लगता है...

लेख – तिब्बत में प्रवेश – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

अब तो मैं तीसरी बार तिब्बत में प्रवेश कर रहा था, इस रास्ते यह दूसरी बार जा रहा था। पहले प्रवेश में मुझे उतना ही कष्टों का सामना करना पड़ा था, जितना कि हनुमानजी...

लेख – ऐनम् – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

अभी हम जंगल और वनस्पति की भूमि में ही थे, लेकिन कुछ ही मीलों बाद उसका साथ चिरकाल के लिए छूटने वाला था। तातपानी से यहाँ तक, भोटकाशी के दोनों किनारों के पहाड़ हरे-भरे...

लेख – तिड्‍़री की ओर – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

एक अपैल के नौ बजे हम आगे के लिए रवाना हुए। हमारे और अभयसिंह के अतिरिक्त चार नेपाली सवार साथी हुए, जिनमें शि-गर्-चे के नेपाली फोटोग्राफर तेजरत्न तथा उनकी तिब्बती स्त्री भी थी। जोड़्...

लेख – स-स्क्या की ओर – (लेखक – राहुल सांकृत्यायन)

2 मई को चाय-सत्तू (प्रातराश) करके आठ बजे हम तिड्‍रि से रवाना हुए। चार घंटे में नेमू गाँव में पहुँचे। आजकल यहाँ खेतों में जुताई का काम हो रहा था। आसपास के पहाड़ों पर...

कविता – कविता संग्रह – (लेखक – वृंदावनलाल वर्मा)

आगे चले चलो अपवाद भय या कीर्ति प्रेम से निरत न हो, यदि खूब सोच-समझ कर मार्ग चुन लिया। प्रेरित हुए हो सत्य के विश्वास, प्रेम से, तो धार्य नियम, शौर्य से आगे चले...

व्यंग्य – अपनी अपनी बीमारी (लेखक – हरिशंकर परसाई)

हम उनके पास चंदा माँगने गए थे। चंदे के पुराने अभ्यासी का चेहरा बोलता है। वे हमें भाँप गए। हम भी उन्हें भाँप गए। चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी...

कविता – क्या किया आज तक क्या पाया ? (लेखक – हरिशंकर परसाई)

मैं सोच रहा, सिर पर अपार दिन, मास, वर्ष का धरे भार पल, प्रतिपल का अंबार लगा आखिर पाया तो क्या पाया? जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा जब थाप पड़ी, पग डोल उठा...

व्यंग्य – अपील का जादू (लेखक – हरिशंकर परसाई)

एक देश है! गणतंत्र है! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-काँटे में...

कविता – जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? (लेखक – हरिशंकर परसाई)

किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता...