Monthly Archive: January 2014

उपन्यास – अलंकार-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

थायस ने स्वाधीन, लेकिन निर्धन और मूर्तिपूजक मातापिता के घर जन्म लिया था। जब वह बहुत छोटीसी लड़की थी तो उसका बाप एक सराय का भटियारा था। उस सराय में परायः मल्लाह बहुत आते...

उपन्यास – अलंकार-3 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

जब थायस ने पापनाशी के साथ भोजशाला में पदार्पण किया तो मेहमान लोग पहले ही से आ चुके थे। वह गद्देदार कुरसियों पर तकिया लगाये, एक अर्द्धचन्द्राकार मेज के सामने बैठे हुए थे। मेज...

उपन्यास – अलंकार – 4 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

नगर में सूर्य का परकाश फैल चुका था। गलियां अभी खाली पड़ी हुई थीं। गली के दोनों तरफ सिकन्दर की कबर तक भवनों के ऊंचेऊंचे सतून दिखाई देते थे। गली के संगीन फर्श पर...

उपन्यास – अलंकार – 5 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

पापनाशी ने एक नौका पर बैठकर, जो सिरापियन के धमार्श्रम के लिए खाद्यपदार्थ लिये जा रही थी, अपनी यात्रा समाप्त की और निज स्थान को लौट आया। जब वह किश्ती पर से उतरा तो...

उपन्यास – कर्मभूमि – 1-1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन...

उपन्यास – कर्मभूमि – 1-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

ग्यारह सारे शहर में कल के लिए दोनों तरह की तैयारियां होने लगीं-हाय-हाय की भी और वाह-वाह की भी। काली झंडियां भी बनीं और फलों की डालियां भी जमा की गईं, पर आशावादी कम...

उपन्यास – कर्मभूमि – 2- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

उत्तर की पर्वत-श्रेणियों के बीच एक छोटा-सा रमणीक गांव है। सामने गंगा किसी बालिका की भांति हंसती, उछलती, नाचती, गाती, दौड़ती चली जाती है। पीछे ऊंचा पहाड़ किसी वृध्द योगी की भांति जटा बढ़ाए...

उपन्यास – कर्मभूमि – 3 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

लाला समरकान्त की जिंदगी के सारे मंसूबे धूल में मिल गए। उन्होंने कल्पना की थी कि जीवन-संध्‍या में अपना सर्वस्व बेटे को सौंपकर और बेटी का विवाह करके किसी एकांत में बैठकर भगवत्-भजन में...

उपन्यास – कर्मभूमि – 4 – 1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

अमरकान्त को ज्योंही मालूम हुआ कि सलीम यहां का अफसर होकर आया है, वह उससे मिलने चला। समझा, खूब गप-शप होगी। यह खयाल तो आया, कहीं उसमें अफसरी की बू न आ गई हो...

उपन्यास – कर्मभूमि – 4 – 2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘महन्तजी के दर्शन तुमने कभी किए हैं?’ ‘मैंने भला मैं कैसे करता- मैं कभी नहीं आया।’   नौ बज रहे थे, इस वक्त घर लौटना मुश्किल था। पहाड़ी रास्ते, जंगली जानवरों का खटका, नदी-नालों...

उपन्यास – कर्मभूमि – 5-1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

यह हमारा लखनऊ का सेंटल जेल शहर से बाहर खुली हुई जगह में है। सुखदा उसी जेल के जनाने वार्ड में एक वृक्ष के नीचे खड़ी बादलों की घुड़दौड़ देख रही है। बरसात बीत...

उपन्यास – कर्मभूमि – 5-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

‘यह क्यों नहीं कहते तुममें गैरत नहीं है?’ ‘आप तो मुसलमान हैं। क्या आपका फर्ज नहीं है कि बादशाह की मदद करें?’   ‘अगर मुसलमान होने का यह मतलब है कि गरीबों का खून...

उपन्यास – गबन -1-1- (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

बरसात के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सुनहरी घटाएँ छाई हुई हैं । रह – रहकर रिमझिम वर्षा होने लगती है । अभी तीसरा पहर है ; पर ऐसा मालूम हों...

उपन्यास – गबन -1-2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिमट गई। रमा ने पूछा–क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ीं?   जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नजरों से ताककर कहा–कुछ नहीं, एक स्वप्न देख रही...

उपन्यास – गबन – 2 -1 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

ग्यारह महाशय दयानाथ को जब रमा के नौकर हो जाने का हाल मालूम हुआ, तो बहुत खुश हुए। विवाह होते ही वह इतनी जल्द चेतेगा इसकी उन्हें आशा न थी। बोले–‘जगह तो अच्छी है।...

उपन्यास – गबन – 2 -2 – (लेखक – मुंशी प्रेमचंद)

रमेश ने मुस्कराकर कहा, ‘अच्छा, यह किस्सा तो हो चुका, अब यह बताओ, उसने तुम्हें रूपये किसलिए दिए! मैं गिन रहा था, छः नोट थे, शायद सौ-सौ के थे।’ रमानाथ-‘ठग लाया हूं।’   रमेश-‘मुझसे...