Monthly Archive: February 2013

व्यंग्य – अपील का जादू (लेखक – हरिशंकर परसाई)

एक देश है! गणतंत्र है! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-काँटे में...

कविता – जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? (लेखक – हरिशंकर परसाई)

किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता...

व्यंग – आध्यात्मिक पागलों का मिशन (लेखक – हरिशंकर परसाई)

भारत के सामने अब एक बड़ा सवाल है – अमेरिका को अब क्या भेजे? कामशास्त्र वे पढ़ चुके, योगी भी देख चुके। संत देख चुके। साधु देख चुके। गाँजा और चरस वहाँ के लड़के...

व्यंग – अश्लील (लेखक – हरिशंकर परसाई)

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं। दस-बारह उत्‍साही...

व्यंग – आवारा भीड़ के खतरे (लेखक – हरिशंकर परसाई)

एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक...

व्यंग – उखड़े खंभे (लेखक – हरिशंकर परसाई)

कुछ साथियों के हवाले से पता चला कि कुछ साइटें बैन हो गयी हैं। पता नहीं यह कितना सच है लेकिन लोगों ने सरकार को कोसना शुरू कर दिया। अरे भाई,सरकार तो जो देश...

व्यंग – एक अशुद्ध बेवकूफ (लेखक – हरिशंकर परसाई)

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है। मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है,...

व्यंग – एक मध्यमवर्गीय कुत्ता (लेखक – हरिशंकर परसाई)

मेरे मित्र की कार बँगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, ‘इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?’ मित्र ने कहा, ‘तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!’ मैंने कहा, ‘आदमी की शक्ल में कुत्ते...

व्यंग – कंधे श्रवणकुमार के (लेखक – हरिशंकर परसाई)

एक सज्जन छोटे बेटे की शिकायत करते हैं – कहना नहीं मानता और कभी मुँहजोरी भी करता है। और बड़ा लड़का? वह तो बड़ा अच्छा है। पढ़-लिखकर अब कहीं नौकरी करता है। सज्जन के...

व्यंग – क्रांतिकारी की कथा (लेखक – हरिशंकर परसाई)

‘क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें करता। हमेशा...

व्यंग – किस भारत भाग्य विधाता को पुकारें (लेखक – हरिशंकर परसाई)

मेरे एक मुलाकाती हैं। वे कान्यकुब्ज हैं। एक दिन वे चिंता से बोले – अब हम कान्यकुब्जों का क्या होगा? मैंने कहा – आप लोगों को क्या डर है? आप लोग जगह-जगह पर नौकरी...

व्यंग – ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड (लेखक – हरिशंकर परसाई)

मेरी टेबिल पर दो कार्ड पड़े हैं – इसी डाक से आया दिवाली ग्रीटिंग कार्ड और दुकान से लौटा राशन कार्ड। ग्रीटिंग कार्ड में किसी ने शुभेच्छा प्रगट की है कि मैं सुख और...

व्यंग – खेती (लेखक – हरिशंकर परसाई)

सरकार ने घोषणा की कि हम अधिक अन्न पैदा करेंगे और एक साल में खाद्य में आत्मनिर्भर हो जाएँगे। दूसरे दिन कागज के कारखानों को दस लाख एकड़ कागज का आर्डर दे दिया गया।...

व्यंग – घायल वसंत (लेखक – हरिशंकर परसाई)

कल बसंतोत्सव था। कवि वसंत के आगमन की सूचना पा रहा था – प्रिय, फिर आया मादक वसंत। मैंने सोचा, जिसे वसंत के आने का बोध भी अपनी तरफ से कराना पड़े, उस प्रिय...

व्यंग – जैसे उनके दिन फिरे (लेखक – हरिशंकर परसाई)

एक था राजा। राजा के चार लड़के थे। रानियाँ? रानियाँ तो अनेक थीं, महल में एक ‘पिंजरापोल’ ही खुला था। पर बड़ी रानी ने बाकी रानियों के पुत्रों को जहर देकर मार डाला था।...

व्यंग – ठिठुरता हुआ गणतंत्र (लेखक – हरिशंकर परसाई)

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता।...