Monthly Archive: September 2012

कविता – वैदेही-वनवास – उपवन रोला (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

लोक-रंजिनी उषा-सुन्दरी रंजन-रत थी। नभ-तल था अनुराग-रँगा आभा-निर्गत थी॥ धीरे-धीरे तिरोभूत तामस होता था। ज्योति-बीज प्राची-प्रदेश में दिव बोता था॥1॥ किरणों का आगमन देख ऊषा मुसकाई। मिले साटिका-लैस-टँकी लसिता बन पाई॥ अरुण-अंक से छटा...

कविता – वैदेही-वनवास – चिन्तित चित्त चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध के राज मन्दिरों मध्य। एक आलय था बहु-छबि-धाम॥ खिंचे थे जिसमें ऐसे चित्र। जो कहाते थे लोक-ललाम॥1॥ दिव्य-तम कारु-कार्य अवलोक। अलौकिक होता था आनन्द॥ रत्नमय पच्चीकारी देख। दिव विभा पड़ जाती थी मन्द॥2॥...

कविता – वैदेही-वनवास – मन्त्रणा गृह चतुष्पद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मन्त्रणा गृह में प्रात:काल। भरत लक्ष्मण रिपुसूदन संग॥ राम बैठे थे चिन्ता-मग्न। छिड़ा था जनकात्मजा प्रसंग॥1॥ कथन दुर्मुख का आद्योपान्त। राम ने सुना, कही यह बात॥ अमूलक जन-रव होवे किन्तु। कीर्ति पर करता है...

कविता – वैदेही-वनवास – वसिष्ठाश्रम तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवधपुरी के निकट मनोरम-भूमि में। एक दिव्य-तम-आश्रम था शुचिता-सदन॥ बड़ी अलौकिक-शान्ति वहाँ थी राजती। दिखलाता था विपुल-विकच भव का वदन॥1॥ प्रकृति वहाँ थी रुचिर दिखाती सर्वदा। शीतल-मंद-समीर सतत हो सौरभित॥ बहता था बहु-ललित दिशाओं...

कविता – वैदेही-वनवास – सती सीता ताटंक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रकृति-सुन्दरी विहँस रही थी चन्द्रानन था दमक रहा। परम-दिव्य बन कान्त-अंक में तारक-चय था चमक रहा॥ पहन श्वेत-साटिका सिता की वह लसिता दिखलाती थी। ले ले सुधा-सुधा-कर-कर से वसुधा पर बरसाती थी॥1॥ नील-नभो मण्डल...

कविता – वैदेही-वनवास – कातरोक्ति पादाकुलक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रवहमान प्रात:-समीर था। उसकी गति में थी मंथरता॥ रजनी-मणिमाला थी टूटी। पर प्राची थी प्रभा-विरहिता॥1॥ छोटे-छोटे घन के टुकड़े। घूम रहे थे नभ-मण्डल में॥ मलिना-छाया पतित हुई थी। प्राय: जल के अन्तस्तल में॥2॥ कुछ...

कविता – वैदेही-वनवास – मंगल यात्रा मत्तसमक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

अवध पुरी आज सज्जिता है। बनी हुई दिव्य-सुन्दरी है॥ विहँस रही है विकास पाकर। अटा अटा में छटा भरी है॥1॥ दमक रहा है नगर, नागरिक। प्रवाह में मोद के बहे हैं॥ गली-गली है गयी...

कविता – वैदेही-वनवास – आश्रम-प्रवेश तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

था प्रभात का काल गगन-तल लाल था। अवनी थी अति-ललित-लालिमा से लसी॥ कानन के हरिताभ-दलों की कालिमा। जाती थी अरुणाभ-कसौटी पर कसी॥1॥ ऊँचे-ऊँचे विपुल-शाल-तरु शिर उठा। गगन-पथिक का पंथ देखते थे अड़े॥ हिला-हिला निज...

कविता – वैदेही-वनवास – अवध धाम तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

था संध्या का समय भवन मणिगण दमक। दीपक-पुंज समान जगमगा रहे थे॥ तोरण पर अति-मधुर-वाद्य था बज रहा। सौधों में स्वर सरस-स्रोत से बहे थे॥1॥ काली चादर ओढ़ रही थी यामिनी। जिसमें विपुल सुनहले...

कविता – वैदेही-वनवास – तपस्विनी आश्रम चौपदे (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रकृति का नीलाम्बर उतरे। श्वेत-साड़ी उसने पाई॥ हटा घन-घूँघट शरदाभा। विहँसती महि में थी आई॥1॥ मलिनता दूर हुए तन की। दिशा थी बनी विकच-वदना॥ अधर में मंजु-नीलिमामय। था गगन-नवल-वितान तना॥2॥ चाँदनी छिटिक छिटिक छबि...

कविता – वैदेही-वनवास – रिपुसूदनागमन सखी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बादल थे नभ में छाये। बदला था रंग समय का॥ थी प्रकृति भरी करुणा में। कर उपचय मेघ-निचय का॥1॥ वे विविध-रूप धारण कर। नभ-तल में घूम रहे थे॥ गिरि के ऊँचे शिखरों को। गौरव...

कविता – वैदेही-वनवास – नामकरण-संस्कार तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

शान्ति-निकेतन के समीप ही सामने। जो देवालय था सुरपुर सा दिव्यतम॥ आज सुसज्जित हो वह सुमन-समूह से। बना हुआ है परम-कान्त ऋतुकान्त-सम॥1॥ ब्रह्मचारियों का दल उसमें बैठकर। मधुर-कंठ से वेद-ध्वनि है कर रहा॥ तपस्विनी...

कविता – वैदेही-वनवास – जीवन-यात्रा तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तपस्विनी-आश्रम के लिए विदेहजा। पुण्यमयी-पावन-प्रवृत्ति की पूर्ति थीं॥ तपस्विनी-गण की आदरमय-दृष्टि में। मानवता-ममता की महती-मूर्ति थीं॥1॥ ब्रह्मचर्य-रत वाल्मीकाश्रम-छात्रा-गण। तपोभूमि-तापस, विद्यालय-विबुध-जन॥ मूर्तिमती-देवी थे उनको मानते। भक्तिभाव-सुमनाजंलि द्वारा कर यजन॥2॥ अधिक-शिथिलता गर्भभार-जनिता रही। फिर भी परहित-रता...

कविता – वैदेही-वनवास – दाम्पत्य-दिव्यता तिलोकी (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रकृति-सुन्दरी रही दिव्य-वसना बनी। कुसुमाकर द्वारा कुसुमित कान्तार था॥ मंद मंद थी रही विहँसती दिग्वधू। फूलों के मिष समुत्फुल्ल संसार था॥1॥ मलयानिल बह मंद मंद सौरभ-बितर। वसुधातल को बहु-विमुग्ध था कर रहा॥ स्फूर्तिमयी-मत्तता-विकचता-रुचिरता। प्राणि...

नाटक – श्रीप्रद्युम्नविजय व्यायोग – अध्याय 1 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रार्थना प्यारे पाठक बृन्द! आप लोग भली-भाँति जानते हैं कि मनुष्य की बुध्दि अपूर्णा अथच भ्रमात्मिका है। ऐसी अवस्था में यदि मेरी बुध्दि अति अपूर्णा और महाभ्रमात्मिका हो तो कोई आश्चर्य का विषय यहाँ...

नाटक – श्रीप्रद्युम्नविजय व्यायोग – अध्याय 2 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

सा.- कुमार! क्या यह सुरराज निजप्रियपुत्र को प्रवर की रक्षा का निदेश दे रहे हैं? प्रद्यु.- हाँ हाँ! ज्ञात होता है कि जब तक निकुंभ ने प्रवर पर गदा का प्रहार किया, तभी तक...