Monthly Archive: August 2012

नाटक – श्रीरुक्मिणीरमणो विजयते – अध्याय 11 (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दशमांक श्रीरुक्मिणीपरिणयनाटक का एक अतिरिक्त अंक (स्थान-शय्याभवन) (भगवान श्रीकृष्ण एक सुकोमल तल्प पर बिराजमान, व्यजनहस्ता रुक्मिणी समीप दण्डायमान) (सुलोचना व सुनैना दो परिचारिकाओं का प्रवेश) सुलो.- सखी सुनयने! आज कैसा आनन्द का दिन है,...

पत्र – पगली का पत्र (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तुम कहोगे कि छि:, इतनी स्वार्थ-परायणता! पर प्यारे, यह स्वार्थ-परायणता नहीं है, यह सच्चे हृदय का उद्गार है, फफोलों से भरे हृदय का आश्वासन है, व्यथित हृदय की शान्ति है, आकुलता भरे प्राणों का...

आत्मकथा – रोग का रंग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

बाबू बंकिमचन्द्र चटर्जी बंगाल के एक बड़े प्रसिद्ध उपन्यास लेखक हैं। उन्होंने बंगला में ‘विष वृक्ष’ नाम का एक बड़ा ही अनूठा उपन्यास लिखा है। उसमें कालिदास की एक बड़ी मनोमोहक कहानी है-आप लोग...

आत्मकथा – रोग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

हम कौन हैं, आप यह जानकर क्या करेंगे। फिर हम आप से छिप कब सकते हैं, आपकी हमारी जान-पहचान बहुत दिनों की है। हमने कई बार आप से मीठी-मीठी बातें की हैं, आपका जी...

आत्मकथा – जी का लोभ (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जिन दिनों माघ के महीने में मेरा स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था, उन्हीं दिनों की बात है, कि एक दिन दो घड़ी रात रहे मेरी नींद अचानक टूट गयी। इस घड़ी रोग का पारा...

आत्मकथा – घबराहट (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जब किसी बीमार के जी में यह बात बैठ जाती है कि अब बचना कठिन है, तो उसमें घबराहट का पैदा हो जाना कुछ आश्चर्य नहीं। अपने दुख को देखकर मैं भी बहुत घबराया,...

आत्मकथा – झाड़फूँक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आजकल एक विचार फैला हुआ है-जो बात चटपट समझ में न आ जावे, या दलीलों से जो पूरी तौर पर साबित न की जा सके, या जिसका प्रभाव ठीक-ठीक हम न जान सकें, वह...

आत्मकथा – पूजा-पाठ (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पूजा-पाठ आजकल का एक ढंग यह भी है कि पहले तो हमारे मन की जितनी बातें नहीं हैं, उनको हम मानना नहीं चाहते, और यदि किसी कारण से हमको उन्हें मानना पड़ता है, तो...

आत्मकथा – तन्त्र यन्त्र (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

तन्त्र यन्त्र मैं समझता हँ इस ग्रन्थ के पढ़नेवालों में कितने लोग ऐसे होंगे, जो तन्त्र का नाम पढ़ते ही मुँह बना लेंगे और ग्रन्थ को अपने हाथ से दूर फेंक दें, तो भी...

आत्मकथा – दान पुण्य (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

दान पुण्य मेरा विचार है कि ”न देने से देना अच्छा है”। कोई आकर हम से कुछ माँगता है, तो हम उसको क्या देते हैं। एक दो पैसे। जो हमारे लिए कुछ नहीं है,...

आत्मकथा – मृत्यु क्या है (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु क्या है जब किसी की बीमारी बढ़ जाती है, और वह समझ लेता है कि अब बचने की आशा नहीं, तो सब ओर से हटकर उसका जी यह सोचने लगता है कि मृत्यु...

आत्मकथा – मृत्यु का भय (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का भय मृत्यु क्या है? यह आप लोगों ने समझ लिया। जैसा हमें बतलाया गया है, उससे पाया जाता है कि मृत्यु कोई ऐसी वस्तु नहीं है, कि जिससे कोई डरे। यह सच...

आत्मकथा – मृत्यु का प्रभाव (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

मृत्यु का प्रभाव संसार में आज जो अमन दिखलाई पड़ रहा है, धुली हुई चाँदनी सी शान्ति जो चारों ओर छिटकी हुई है। जब आप यह जानेंगे कि इसमें सबसे अधिक श्रेय मृत्यु का...

आत्मकथा – स्वर्ग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

स्वर्ग जब किसी के जी में यह बात जम जाती है कि अब जीवन के दिन इने-गिने ही हैं, जब कूच का नगारा बजने लगता है, मौत सामने खड़ी दिखलाती है, उस समय यदि...

आत्मकथा – नरक (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

नरक स्वर्ग के साथ नरक के विषय में तेरहवें सर्ग में बहुत सी बातें लिखी जा चुकी हैं। जैसे स्वर्ग के विषय में भूतल के समस्त ग्रन्थ एक राय हैं, और उसके अस्तित्व को...

आत्मकथा – जन्मान्तर वाद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

जन्मान्तर वाद पुनर्जन्म का सिद्धान्त आर्य जाति की उच्च कोटि की मननशीलता का परिणाम है। इसीलिए चाहे सनातन धर्म हो, चाहे बौद्ध धर्म उनमें पुनर्जन्म वाद स्वीकृत है। अन्य धर्मों अर्थात् ईसवी, मुसल्मान, और...