Monthly Archive: July 2012

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – भूमिका (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

ग्रंथावली के प्रस्तुत (चौथे) खंड में ‘हरिऔधा’ के खड़ीबोली के स्फुट काव्य को शामिल किया गया है। इसके पहले तीन खंड भी कविता से सम्बध्द हैं, जिसमें ‘हरिऔधा’ के ब्रजभाषा-काव्य, खड़ीबोली के महाकाव्य और...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – प्रेमपुष्पोपहार (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

आज ऐसा है न कोई दिन भला। भाग से मिलते हैं ऐसे दिन कहीं। हाय! किसने किसलिए हमको छला। जो सदा मिलते हैं ऐसे दिन नहीं। हैं परब त्योहार के कितने दिवस। जिनमें करते...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पद्य-प्रमोद (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

प्रभु-प्रताप [षट्पद] चाँद औ सूरज गगन में घूमते हैं रात दिन। तेज औ तम से, दिशा होती है उजली औ मलिन। वायु बहती है, घटा उठती है, जलती है अगिन। फूल होता है अचानक...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पद्य-प्रसून- पावन प्रसंग (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पावन प्रसंग अभेद का भेद दोहा खोजे खोजी को मिला क्या हिन्दू क्या जैन। पत्ता पत्ता क्यों हमें पता बताता है न।1। रँगे रंग में जब रहे सकें रंग क्यों भूल। देख उसी की...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – फूल-पत्तो- (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

भेद भरी बातें पी कहाँ चौपदे श्याम घन में है किसकी झलक। कौन रहता है रस से भरा। लुभा लेती है धारती किसे। दुपट्टा ओढ़ ओढ़ कर हरा।1। बड़ी ऍंधिायाली रातों में। बन बहुत...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – कल्पलता – (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

विभुता-विभूति प्रेम-प्रलाप भरे हैं उसमें जितने भाव, मलिन हैं, या वे हैं अभिराम, फूल-सम हैं या कुलिश-समान, बताऊँ क्या मैं तुझको श्याम! हृदय मेरा है तेरा धााम। गए तुम मुझको कैसे भूल, किसलिए लूँ...

हरिऔध् ग्रंथावली – खंड : 4 – पवित्रा पर्व – (लेखक – अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध)

पर्व और उत्सव मनुष्य का कार्य क्षेत्रा बड़ा विस्तृत है और उसमें उसकी तन्मयता अद््््भुत है। कारण यह है कि सांसारिकता का बन्धान ऐसा है कि वह मनुष्य को अधिाकतर कार्यरत रखता है, क्योंकि...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – भूमिका – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

कुछ समय से विचारशील जनों के मन में यह बात आने लगी है कि देश में एक भाषा और एक लिपि होने की बड़ी जरूरत है, और हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि ही इस...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – पूर्ववर्ती काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

विषयारंभ हिंदी भाषा की उत्‍पत्ति का पता लगाने, और उसका थोड़ा भी इतिहास लिखने में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं। क्‍योंकि इसके लिए पतेवार सामग्री कहीं नहीं मिलती। अधिकतर अनुमान ही के आधार पर इमारत खड़ी...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – प्राकृत-काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

आर्य लोगों की सबसे पुरानी भाषा के नमूने ऋग्‍वेद में हैं ऋग्‍वेद के मंत्रों का अधिकांश आर्यों ने अपनी रोजमर्रा की बोल-चाल की भाषा में निर्माण किया था। इसमें कोई संदेह नहीं। रामायण, महाभारत...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – अपभ्रंश-काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

अपभ्रंश भाषाओं की उत्‍पत्ति दूसरे प्रकार की प्राकृत का विकास होते-होते उस भाषा की उत्‍पत्ति हुई जिसे ”साहित्‍यसंबंधी अपभ्रंश” कहते हैं। अपभ्रंश का अर्थ है – ”भ्रष्‍ट हुई” या ”बिगड़ी हुई” भाषा। भाषाशास्‍त्र के...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – आधुनिक काल – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

परिमार्जित संस्‍कृत जैसा कि लिखा जा चुका है कि प्रारंभिक, किंवा पहली, प्राकृत से संबंध रखने वाली कई एक भाषाएँ या बोलियाँ थीं। उनका धीरे-धीरे विकास होता गया। भारत की वर्तमान भाषाएँ उसी विकास...

आलोचना – हिंदी भाषा की उत्पत्ति – उपसंहार – (लेखक – महावीर प्रसाद द्विवेदी)

आज तक‍ कुछ लोगों का ख्‍याल था कि हिंदी की जननी संस्‍कृत है। यह बात भारत की भाषाओं की खोज से गलत साबित हो गई। जो उद्गम-स्‍थान परिमार्जित संस्‍कृत का है, हिंदी जिन भाषाओं...

निबंध – अशोक के फूल – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

अशोक में फिर फूल आ गए है। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्‍पों के मनोहर स्‍तबकों में कैसा मोहन भाव है। बहुत सोच समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्‍पों को छोड़कर सिर्फ पाँच को ही...

निबंध – आपने मेरी रचना पढ़ी ? – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

हमारे साहित्यिकों की भारी विशेषता यह है कि जिसे देखो वहीं गम्भीर बना है, गम्भीर तत्ववाद पर बहस कर रहा है और जो कुछ भी वह लिखता है, उसके विषय में निश्चित धारणा बनाये...

निबंध – आम फिर बौरा गए – (लेखक – हजारी प्रसाद द्विवेदी)

वसंतपंचमी में अभी देर है, पर आम अभी से बौरा गए। हर साल ही मेरी आँखें इन्‍हें खोजती हैं। बचपन में सुना था कि वसंतपंचमी के पहले अगर आम्रमंजरी दिख जाय तो उसे हथेली...