Monthly Archive: May 2012

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 27 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

मियाँ आजाद और खोजी चलते-चलते एक नए कस्बे में जा पहुँचे और उसकी सैर करने लगे। रास्ते में एक अनोखी सज-धज के जवान दिखाई पड़े। सिर से पैर तक पीले कपड़े पहने हुए, ढीले...

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 28 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

दूसरे दिन नौ बजे रात को नवाब साहब और उनके मुसाहब थिएटर देखने चले। नवाब – भई, आबादीजान को भी साथ ले चलेंगे। मुसाहब – जरूर, जरूर उनके बगैर मजा किरकिरा हो जायगा। इतने...

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 29 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

आज तो निराला समाँ है। गरीब, अमीर, सब रँगरलियाँ मना रहे हैं। छोटे-बड़े खुशी के शादियाने बजा रहे हैं। कहीं बुलबुल के चहचहे, कहीं कुमरी के कह-कहे। ये ईद की तैयारियाँ हैं। नवाब साहब...

अनुवाद – आजाद-कथा – भाग 30 – (लेखक – रतननाथ सरशार, अनुवादक – प्रेमचंद)

दूसरे दिन सुबह को नवाब साहब जनानखाने से निकले, तो मुसाहबों ने झुक-झुक कर सलाम किया। खिदमतगार ने चाय की साफ-सुथरी प्यालियाँ और चमचे ला कर रखे। नवाब ने एक-एक प्याली अपने हाथ से...

व्यंग्य – नेता का स्थान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

लड़कपन से लेकर बी.ए. पास हो लेने तक, आठ वर्ष की अज्ञान अवस्‍था से तेईस वर्ष की अपरिपक्‍व अवस्‍था तक वे दोनों अभिन्‍न मित्र रहे। दोनों तीव्र भी थे, दोनों ‘देश के चमकते हुए...

आत्मकथा – दिग्दर्शन – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

‘मैंने क्‍या-क्‍या नहीं किया? किस-किस दर की ठोकरें नहीं खाईं? किस-किसके आगे मस्‍तक नहीं झुकाया?’ मेरे राम! आपको न पहचानने के सबब ‘जब जनमि- जनमि जग, दुख दसहू दिसि पायो।’ आशा के जाल में...

आत्मकथा – प्रवेश – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

चन्‍द ही महीने पहले बिहार के विदित आचार्य श्री शिवपूजन सहायजी (पद्मभूषण), आचार्य नलिन विलोचनजी शर्मा तथा श्री जैनेन्‍द्र कुमारजी मेरे यहाँ कृपया पधारे थे। साथ में बिहार के दो-तीन तरुण और भी थे।...

आत्मकथा – अपनी खबर – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

मनकि बेचन पाँडे, वल्‍द बैजनाथ पाँडे, उम्र साठ साल, क़ौम बरहमन, पेशा अख़बार-नवीसी और अफ़साना-नवीसी, साक़िन मुहल्‍ला सद्दूपुर चुनार, ज़िला मिर्ज़ापुर (यू.पी.), हाल मुकाम कृष्‍णनगर, दिल्‍ली-31, आज ज़िन्‍दगी के साठ साल सकुशल समाप्‍त हो...

आत्मकथा – धरती और धान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

‘अरे बेचन! न जाने कौन आया था— उर्दजी, उर्दजी, पुकार रहा था!’ ये शब्‍द मेरी दिवंगता जननी, काशी में जन्‍मी जयकली के हैं जिन्‍हें मैं ‘आई’ पुकारा करता था। यू.पी. में माता या माई...

आत्मकथा – चुनार – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

रामचन्‍द्र भगवानद्य सरयू नदी के किनारे पैदा हुए थे, मैं पैदा हुआ गंगा सुरसरि के किनारे। मुझे सरयू उतनी अच्‍छी नहीं लगतीं जितनी नर, नाग, विबुध बन्‍दनी गंगा। रामचन्‍द्र भगवान् अयोध्‍या नगरी में पैदा...

आत्मकथा – नागा भागवतदास – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

यह सन् 1910 ई. है। और यह नगर? इसका नाम है मिण्‍टगुमरी! मिण्‍टगुमरी? यह नगर कहाँ है रे बाबा! यह नगर इस समय पश्चिमी पाकिस्‍तान में है, लेकिन जब की बात लिखी जा रही...

आत्मकथा – राममनोहरदास – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

महन्‍त भागवतदास ‘कानियाँ’ की नागा-जमात के साथ मैंने पंजाब और नार्थवेस्‍ट फ्रण्टियर प्राविंस का लीला-भ्रमण किया। अमृतसर, लाहौर, सरगोधा मण्‍डी, चूहड़ काणा, पिंड दादन खाँ, मिण्‍टगुमरी, कोहाट और बन्‍नू तक रामलीलाओं में अपने राम...

आत्मकथा – भानुप्रताप तिवारी – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

बचपन में मेरे मुहल्‍ले में दो हस्तियाँ ऐसी थीं जिनका कमोबेश प्रभाव मुझ पर सारे जीवन रहा। उनमें एक थे भानुप्रताप तिवारी (जब मैं सात बरस का था, वह साठ के रहे होंगे), दूसरे...

आत्मकथा – बच्चा महाराज – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

‘बाबू!’ जवान लड़के ने वृद्ध, धनिक और पुत्रवत्‍सल पिता को सम्‍बोधित किया। ‘बचवा… !’ ‘मिर्ज़ापुर में पुलिस सब-इन्‍स्‍पेक्‍टर की नौकरी मेरा एक दोस्‍त, जो कि पुलिस में है, मुझे दिलाने को तैयार है। क्‍या...

आत्मकथा – पं. जगन्नाथ पाँडे – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

अब मैं चौदह साल का हो चला था कि रामलीला-मण्‍डली से छुट्टी मनाने बड़़े भाई के संग चुनार आया। इस बार अलीगढ़ में किसी बात पर महन्‍त राममनोहरदास और मेरे बड़े भाई में वाद-विवाद...

आत्मकथा – लाला भगवान ‘दीन’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

अरसा हुआ वाराणसी के दैनिक अखबार ‘आज’ में आदरणीय पं. श्रीकृष्‍णदत्तजी पालीवाल की चर्चा करते हुए मैंने लिखा था कि मेरे पाँच गुरु हैं, जिनमें एक पालीवालजी भी हैं। उन पाँचों में मैं अपने...