जानिये बच्चों के डायपर से हो सकने वाली खतरनाक हानियाँ

· February 16, 2017

दुनिया दिन ब दिन सुविधा भोगी होती जा रही है …………… और इसी सुविधा भोगी मानसिकता की तीव्र उत्कंठा के हजारों उदाहरणों में से एक है अपने नवजात बच्चों के लिए डायपर इस्तेमाल करना !

आज की बहुत सी महिलाओं को पता ही नहीं कि डायपर पहनाने पर बहुत से दुष्प्रभाव नवजात बच्चों को झेलने पड़तें हैं …………… इसलिए ऐसी ही महिलाओं के लिए हम यह लेख लिख रहें हैं ताकि उन्हें जल्द से जल्द सदबुद्धि आ सके जिससे जाने अनजाने उन्ही के छोटे मासूम बच्चे के प्रति उन्ही के द्वारा हो रही ज्यादती को वो तुरंत रोक सकें !

बच्चों के मामलें में लगभग सभी माताएँ बहुत ही सावधान होतीं हैं इसलिए उन्हें जैसे ही पता लगता है कि किसी चीज से उनके छोटे बच्चे को दिक्कत हो रही है तो वो तुरंत उस चीज से बच्चे का बचाव निश्चित करती हैं ………………………… पर कुछ ऐसी भी बेहद आलसी मानसिकता की महिलायें होतीं हैं जिनके लिए उनका अपना आराम ही सर्वोपरि होता है इसलिए उन्हें कोई लाख समझाए कि डायपर पहनाने के कई तुरंत के एवं दूरगामी दुष्प्रभाव होतें हैं तब भी वो डायपर पहनाना नहीं छोड़तीं हैं और उल्टा समझाने वाले से ही बहस करने लगतीं हैं कि सभी माँ बाप तो डायपर पहनातें हैं आदि आदि ………………………….. कोई भी महिला जो थोड़ा भी समझदार होगी नीचे लिखे कारणों को जानने के बाद निश्चित ही अपने बच्चे को डायपर पहनाना छोड़, सूती कपड़ा पहनाना शुरू कर देगी लेकिन जिनके नस नस में आलस्य समा चुका है उनके ऊपर इन जानकारियों का कोई असर होगा या नहीं, कहना मुश्किल है !

वास्तव में बच्चों को पालना एक ऐसी कष्टसाध्य तपस्या होती है जिसमें कोई शार्ट कट नहीं होता है ……………. इसलिए जो माताएं अपने बच्चों से सम्बंधित अधिकाँश कामों को खुद प्रेम से करने की बजाय नौकरों या अन्य स्त्रियों की अधिक से अधिक सहायता लेतीं हैं या बच्चों से सम्बंधित कई कामों को अक्सर अवॉयड कर जातीं हैं, उनके बच्चे बड़े होते ही आजाद पंक्षी की तरह अपना नया घोसला बसा लेतें हैं और उनके पर्सनल जीवन में उनकी माँ की विशेष अहमियत नहीं रह जाती है ……………………………… जबकि जो माताएं अपने बच्चों के छोटे से छोटे काम को भी खुद प्रेम से अपने हाथों से करतीं हैं, उनके बच्चे चाहे जितने भी बड़े हो जाएँ, वे अपना जीवन अपनी माँ के बिना हमेशा अधूरा मानतें हैं और अपनी माँ को भगवान् से भी बढ़कर दर्जा देतें हैं !

आईये हम आपको बतातें हैं विदेशी सभ्यता द्वारा कुछ वर्ष पूर्व विकसित किये गए डायपर के कुछ खतरनाक पहलू –

– डायपर में गीलापन तुरंत सोखने के लिए कुछ केमिकल कम्पोजीशन का इस्तेमाल होता है जिसका हर समय बच्चे की नाजुक त्वचा के सम्पर्क में रहने पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है, जिससे यूरिन और गुदा मार्ग का खतरनाक संक्रमण (इन्फेक्शन) भी हो सकता है तथा नितम्बों व कमर पर त्वचा के रोग जैसे रैशेश आदि अक्सर होने की संभावना बनी रहती है ……………….. इस तरह के त्वचा रोग होने पर शुद्ध नारियल तेल या सरसों तेल या देशी घी की हल्की हल्की मालिश कर देनी चाहिए (अगर शुद्ध तेल या घी ना मिले तो पतंजलि के तेल या घी का बेहिचक इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि ये अति शुद्ध होतें हैं) !

– बच्चे के मूत्रांग इतना ज्यादा नाजुक होता है कि उस पर हल्का सा भी दबाव पड़ने से बच्चे की पेशाब रुक सकती है और पेशाब रुकने की अवस्था में बच्चे की बेचैनी अंदर ही अंदर बढ़ने लगती है जिससे वो लगातार रोने लगता है पर उनकी अनाड़ी माँ को समझ में ही नहीं आता है कि आखिर उनका बच्चा रो क्यों रहा है ………………….. ये तो छोटे बच्चों को हर समय महसूस होने वाला भगवान का साथ होता हैं जो उन्हें ज्यादातर मुसीबतों से बचा लेता है नहीं तो माँ बाप या किसी अन्य का भी अनाड़ीपन किसी भी बच्चे को कभी भी लाइफ टाइम का रोग पकड़ा सकता है !

– न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. कैरन एडोल्फ ने कई बच्चों पर शोध कर बताया है कि डायपर की वजह से बच्चों के पैरों के बीच दूरी अधिक हो जाती है जिससे उनकी चाल बिगड़ सकती है अर्थात उनकी चाल ही टेढ़ी हो सकती है !

– डायपर मूत्र तो सोख लेता है लेकिन मल का क्या ? मल तो उसी में पड़ा पड़ा सूखकर कड़ा होता रहता है जिसकी वजह से गुदा मार्ग पर घाव व इन्फेक्शन होने की पूर्ण संभावना रहती है !

– एक नयी समस्या डायपर पहनने वालों बच्चों के बारें में आजकल न्यूज़ पेपर्स में पढ़ने को मिलती है कि डायपर का इस्तेमाल करने वाले लड़के बड़े हो जाने पर भी अक्सर अपने पैंट में ही पेशाब कर देतें हैं ………………. मतलब उन्हें पैंट में ही पेशाब करने की पक्की आदत पड़ चुकी होती है !

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि डायपर पहनाने से माँ को तो आराम मिल जाता है किन्तु पूरी तरह से दूसरों पर ही आश्रित निरीह बच्चे की कई तरह से फजीहत हो सकती है ……………………….. इसलिए किसी भी शार्ट कट को अपनाने की बजाय बच्चे की सहूलियत को ही सर्वप्रथम प्राथमिकता देनी चाहिए तथा सिर्फ और सिर्फ कपड़ा (खासकर सूती कपड़ा) ही इस्तेमाल करना चाहिए …………………… तभी आज की एक ममतामयी माँ, भविष्य की एक आदरणीय माँ का दर्जा प्राप्त कर पाती हैं !

[ माँ की इसी ममतामयी रूप का वर्णन, प्रसिद्ध समाज सेवी श्री डॉक्टर किसलय उपाध्याय (अध्यक्ष, “स्वराज जन चेतना” संस्था –https://www.facebook.com/Dr-Kislaya-Upadhyay-951774771525353/ ) ने भी अपने एक वक्तव्य में किया था जिसे देखने के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें ] –

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