ऋषि सत्ता की आत्मकथा (भाग – 1): पृथ्वी से गोलोक, गोलोक से पुनः पृथ्वी की परम आश्चर्यजनक महायात्रा

· March 27, 2017

[एक दिव्य देहधारी ऋषि सत्ता की परम आश्चर्यजनक पर नितांत गोपनीय आत्मकथा, जिसे विशेष मूहूर्त पर “स्वयं बनें गोपाल” समूह को प्रकाशित करने की विशेष अनुमति प्राप्त हुई है | वह दिव्य गाथा, उन्ही की वाणी में, इस प्रकार है]-


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जब मैंने अपनी मरणधर्मा शरीर त्यागा तब तुरंत ही मुझे एक अद्भुत विराट शरीर प्राप्त हुई जिसमें किसी भी प्रकार का दुःख बिल्कुल भी प्रवेश नहीं कर सकता था | मेरी उस शाश्वत प्रसन्नता युक्त दिव्य शरीर के हर रोम रोम में इतनी तेजी से ज्ञान समा रहा था, जैसे मानों पूरा ब्रह्मांड ही मेरी शरीर की ओर चुम्बक की तरह खीच कर मुझमे ही समाहित होता जा रहा हो, जिसकी वजह से मुझे बहुत तेजी से प्रकृति के छद्म मायाचक्र के भी परे, दुर्लभ ईश्वरीय सत्य के ज्ञान का स्मरण इस प्रकार होता जा रहा था जैसे मानो वर्षों पूर्व खोयी हुई मेरी याददाश्त तेजी से वापस आती जा रही हो |

वास्तव में सत्य का ज्ञान, तो निराकार ईश्वर की ही तरह अंतहीन है, लेकिन ज्ञान की इस अति तीव्र समाहित होने की अद्भुत प्रक्रिया की वजह से उस अल्प समय में भी, मुझे मानव शरीर की तुलना में असम्भव तुल्य ज्ञान प्राप्त हुआ, पर मुझे उस समय तक यह अंदाजा भी नहीं था की इस प्राप्त विशेष ज्ञान से भी परे, किसी परम ज्ञान व स्मृति को मुझे प्रदान करने के लिए स्वयं ईश्वर ने कोई व्यवस्था कर रखी है |

ज्ञानार्जन की इसी दैवीय प्रक्रिया के दौरान मुझे अपने सामने दो दिव्य देहधारी देवता दिखाई दिए जो मेरी ही तरफ हाथ जोड़े हुए नमस्कार की मुद्रा में प्रसन्नतापूर्वक खड़े हुए थे !

उन देवताओं ने मुझे एक दिव्य विमान की ओर संकेत करते हुए कहा कि, हे प्रभु आप कृपया इस विमान पर बैठें, हमें आपको अपने साथ ले आने के लिए कहा गया है !

तो मैंने उन दिव्य देह धारियों से कहा कि ठीक है, चलिए मै आपके साथ चलता हूँ, लेकिन धरती स्थित मेरे जो स्वजन (पत्नी, पुत्र) हैं वे मुझसे बिल्कुल भी अलग नहीं है, बल्कि मेरे ही शरीर के अभिन्न हिस्से हैं क्योंकि वे मेरे ही समान निश्छल व परोपकारी हृदय के हैं तथा वे मुझसे, अपने खुद के प्राणों से भी कई गुना अधिक प्रेम करतें हैं, जिसकी वजह से पूरी आशंका है कि मुझसे वियोग की असह्य कष्ट की अग्नि में जलकर यह संस्कारी परिवार, जिसमें क्षमता है अनगिनत दूसरे लोगों का भला करने की, तात्कालिक रूप से बिखर जाएगा !

मेरे द्वारा इस तरह प्रश्न करने पर वे दिव्य देहधारी मुस्कुराने लगे | उन दिव्य देहधारियों ने फिर परम आह्लादित भाव से कहा कि आप निश्चिन्त होकर हमारे साथ चलें, जहाँ तक हमें जानकारी प्राप्त है, आप के आराध्य देव ने इसके लिए भी कुछ विशेष व्यवस्था की है !

फिर मैं उस विचित्र और सुरम्य विमान में बैठ गया | विमान द्रुत गति से यात्रा करते हुए एक ऐसे परम दिव्य लोक में पंहुचा जहाँ के विस्तार का आदि व अंत नहीं दिख रहा था | उस लोक का वातावरण कल्पना से भी परे सुंदर, मनोहारी, कौतुक पूर्ण था, जिसे मैं बस मुग्ध होकर निहारता ही जा रहा था | उस लोक में ना तो सूर्य दिखाई दे रहे थे, ना चन्द्र और ना ही प्रकाश का कोई अन्य स्रोत, पर उसके बावजूद उस लोक में ऐसी परम विलक्षण स्थिति थी कि जिसे कोई यौगिक शक्ति रहित मानव कभी समझ ही नहीं सकता क्योंकि ना तो वहां प्रकाश था और ना ही अंधकार पर उसके बावजूद सब कुछ साफ़ साफ़ दृश्यमान था !

दिव्य देहधारियों से पूछने पर पता चला कि वह लोक, कोई और नहीं बल्कि अति दुर्लभ गोलोक है, जो बड़े बड़े देवताओं से लेकर स्वयं ब्रह्मा जी तक के लिए भी अप्राप्य व अगम्य है, क्योंकि यह लोक स्वयं अनंत ब्रह्मांड अधीश्वर श्री कृष्ण का ही निज धाम है !

मेरा विमान दूर से दिखने वाले एक महा विशाल पर्वत की ओर बढ़ने लगा जिसका नाम मुझे मधुसूदन बताया गया | विमान पास पंहुचा तो पता चला कि वह पर्वत नहीं बल्कि एक विशाल राजमहल है | मैं विमान से उतरकर जब उस अकल्पनीय भव्य राजमहल के द्वार के पास पंहुचा तो देखा कि वहां के बेहद लम्बे लम्बे और अति सुंदर निवासी (स्त्री पुरुष जो विमान के साथ आने वाले दिव्य देहधारियों के समान ही तेजस्वी थे) प्रसन्नता पूर्वक किसी उत्सव की तैयारी कर रहे थे !

मैंने वहां के निवासियों से पूछा कि आप लोग किस उत्सव की तैयारी कर रहें हैं और यह राजमहल किसका है ?

तो उन्होंने बताया कि आज यहाँ एक विशिष्ट अतिथि आने वालें हैं और हम लोग उन्ही के स्वागत की तैयारियां कर रहें हैं और यह राजमहल श्री कृष्ण का है !

तो मैंने उन लोगों से पूछा कि वो विशिष्ट अतिथि कौन हैं और श्री कृष्ण कहाँ हैं ?

मेरे ऐसा पूछने पर वहां के निवासियों ने मुस्कुराकर मुझसे कहा कि आपके प्रश्न का उत्तर वे लोग देंगे और ऐसा कहकर उन्होंने अपने हाथ से मुझे ऐसे कुछ विशिष्ट लोगों की तरफ दिखाया जिनका शरीर वहां के निवासियों से भी ज्यादा तेजस्वी और आकाशीय विद्युत् के समान चमक रहा था | मैंने गौर किया कि मेरा शरीर भी उन्ही विशिष्ट लोगों के समान ही प्रचंड तेज से प्रदीप्त हो रहा था | मैंने उन विशिष्ट लोगों के पास जाकर पूछा कि, मैं यहाँ नया हूँ अतः कृपया मेरी जिज्ञासा का समाधान करें और बताएं कि यहाँ किस विशिष्ट अथिति के स्वागत की तैयारियां हो रही हैं और श्री कृष्ण मुझे कहाँ मिलेंगे ?

मेरे द्वारा ऐसा पूछने पर वे विशिष्ट लोग भी मुस्कुराने लगे और उन्होंने प्रत्युत्तर दिया कि पहली बात कि आप यहाँ नए नहीं है, आप हमेशा से यही के निवासी थे और हमेशा यही के रहेंगे, पर बीच बीच में जैसे श्री कृष्ण को भी अपना निज धाम छोड़कर पृथ्वी समेत अन्य ब्रह्मांड के लोकों पर अवतार लेकर विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ती के लिए जाना पड़ता है, ठीक वैसे ही हमें भी जाना पड़ता है, पर हम अंततः लौट कर यहीं अपने शाश्वत निवास स्थल पर ही आतें हैं |

आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर यही है कि यह स्वागत की तैयारियां जिस विशिष्ट अतिथि के लिए हो रही है, वह कोई और नहीं बल्कि आप ही हैं, तीसरे प्रश्न का उत्तर यही है कि स्वयं श्री कृष्ण का साक्षात् दर्शन और उनसे प्रत्यक्ष मुलाक़ात का सुर दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त करने के लिए, आप कृपया इस महल के अंदर प्रवेश करें !

उनकी बातें सुनकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ कि क्या वास्तव में यह स्वागत की तैयारियां मेरे लिए ही हो रहीं हैं, फिर मैं महल के द्वार की ओर बढ़ा तो द्वारपालों ने बड़े सम्मान से मुझे अंदर प्रवेश कराया | तत्पश्चात मैं महल के अंदर राजसभा में खड़ा होकर खाली सिंहासन की तरफ देखकर सोच रहा था कि सिंहासन तो खाली पड़ा हुआ है तो परमेश्वर श्री कृष्ण हैं कहाँ ? उस समय राजसभा दिव्य स्त्रीपुरुषों से खचाखच भरी हुई थी और सभी राजदरबारी एक रहस्यमयी मुस्कान लिए हुए मेरी ही तरफ एकटक देख रहे थे !

अचानक मुझे लगा की कोई ठीक मेरे पीछे ही खड़ा हुआ है | मैंने तुरंत पीछे पलटकर देखा तो आश्चर्य, सुख, रोमांच और उत्साह के महा समुद्र में समाहित होने लगा क्योंकि मेरे ठीक पीछे स्वयं आदि अंत से रहित, परम सखा, श्री कृष्ण अपने चतुर्भुज रूप में खड़े थे !

उनके शरीर में ही सारा जगत समाहित होते हुए दिखाई दे रहा था, उनकी आँखे गंभीरता की सागर थी, चेहरे पर ऐसी सतत मंद मुस्कुराहट थी जिससे दृष्टि हट पाना असम्भव थी, उन कोमलांग की एक हथेली से निरंतर स्वर्ण धूलि गिर रही थी तो दूसरी हथेली में कमल था !

अपने विराट रूप के दर्शन का महा सौभाग्य देने के पश्चात उन्होंने बड़े प्रेम से मेरा हाथ, अपने हाथ से पकड़ कर मुझे उस राजसभा के मुख्य सिंहासन पर बैठाया और तत्पश्चात श्री कृष्ण, मुझसे ठीक नीचे वाले सिंहासन पर बैठ गए !

इस महा सम्मान को देने के पश्चात् श्री कृष्ण ने स्वयं गुरु की भूमिका निभाई और मुझे परम ज्ञान प्रदान किया और अंत में इस महावाक्य (एकोहम बहुस्याम) को प्रत्यक्ष दृष्टांत रूप में समझाया कि इन अनंत ब्रह्मांडों में सिर्फ और सिर्फ बस मै ही एक हूँ और दूसरा कोई है ही नहीं | उन्होंने मुझे बताया कि देखो इस दरबार में बैठा हर निवासी भी मै ही हूँ, उनके ऐसा कहते ही हर दरबारी का शरीर एक बवंडर के रूप में बिखर कर श्री कृष्ण में ही समाने लगा !

सभी दरबारियों के श्री कृष्ण में समा जाने के बाद श्री कृष्ण ने मुझसे कहा कि तुम भी तुम नहीं, बल्कि मैं हूँ | श्री कृष्ण के ऐसा कहते ही मेरा शरीर भी एक बवंडर में बदल कर श्री कृष्ण में ही समाहित हो गया !

स्वयं श्री कृष्ण के शरीर में समाते ही मुझे तुरंत आत्म साक्षात्कार हो गया कि मै ही तो कृष्ण हूँ | फिर मैं प्रकृति की बनाई हुई अनंत विशाल दुनिया को साक्षी भाव से निहारने लगा | अनंत ब्रह्मांड और उसमें स्थित यह छोटी सी पृथ्वी भी मुझे अपने शरीर के अंदर ही नजर आने लगी | निराकार ईश्वर (जो प्रकृति से अभेद्य स्थिति में होता है) के इसी अनंत विस्तार को साक्षी भाव से निहारने की प्रक्रिया को ही, कोई अनुसन्धान कहता है तो कोई आत्म साक्षात्कार की अंत हीन प्रक्रिया | हर साकार दिव्य सत्ता का यही प्रमुख कार्य है कि अंत हीन निराकार को समझना | साकार रूप में श्री कृष्ण हों या शिव हों या नारायण हो, सभी तो यही करतें हैं !

श्री कृष्ण अपने में समाहित करने के बाद पुनः द्वैत रूप में प्रकट हुए अर्थात मुझसे अलग हुए और उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे द्वारा कई महत्पूर्ण लौकिक लीलाएं अभी पृथ्वी पर पूर्ण होनी है अतः तुम पृथ्वी पर अपने स्वजनों के पास इसी दिव्य रूप में ही वास करो और इस परम ज्ञान की प्राप्ति के बाद अब तुम मेरे ही रूप हो चुके हो इसलिए तुम्हारी हर सोच अब मेरी ही सोच है, तुम्हारी हर वाणी अब मेरी ही वाणी है, तुम्हारा हर कर्म अब मेरे द्वारा कराया गया ही कर्म होगा, अतः जाओ और आगामी युग महा परिवर्तन की दिशा और दशा तय करो !

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