वो अपने

· October 12, 2016

hghजो अपने कभी मेरे बहुत करीब थे
आज वही मेरे बुरे वक्त के दर्पण में
अपना वो वास्तविक अक्स छोड़ गए
जो मेरी कल्पना से भी परे था !


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आज जब मुझे उन अपनों के
सच्चे स्नेह व सांत्वना के चन्द
शब्दों की जरूरत थी
तब उनका दामन इस तरह
सिमट गया कि वे
परायों से भी ज्यादा पराये हो गए !

लेकिन कुछ अपने ऐसे अब भी हैं
जिनके स्नेह की छाँव में
क्षणांश के लिए ही सही
मैं सुकून के कुछ
पल बिता लेती हूँ !

लेखिका –

श्री देवयानी (इस कविता पर “स्वयं बनें गोपाल” समूह की निजी टिप्पणी- श्री देवयानी जी के द्वारा लिखी हुई इस मार्मिक कविता का आशय आज के इस युग में सही चरितार्थ है जब अक्सर देखने को मिलता है कि आपसे रिश्ता निभाने वाले कुछ अपनों का प्रेम अचानक से तब कम होने लगता है जब उन्हें आप से कोई और सहयोग मिलने की संभावना ख़त्म हो जाती है और तब ही उनका असली चेहरा भी उजागर होने लगता है | खैर इस कलियुग की यही मूल निशानी है पर महान वही है जो स्वार्थियों के स्वार्थी स्वभाव से चोटिल होने के बावजूद भी अपना परमार्थी स्वभाव ना छोड़ें | श्री देवयानी की अन्य रचनाओं को पढने के लिए कृपया नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें)-

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