आखिर भारत के 9/18 का बदला अमेरिका के 9/11 से कम क्यों ?

· September 20, 2016

345322“स्वयं बने गोपाल” समूह से जुड़े कुछ प्रखर समाजशास्त्रियों का पूछना है कि, क्या भारतीय सैनिकों की जान, अमेरिका के नागरिकों से सस्ती है ?


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ये समाज शास्त्री कहते हैं कि जब कोई खतरनाक प्राणी क्रोध के उन्मांद में आकर भयंकर जानलेवा उत्पात मचाये, और उसे शान्त करने में हर दवा बार बार फेल हो जाए तो उसके साथ कठोरता से पेश आना अनुचित नहीं होता है ! इसी तरह कई देश के समझदार राष्ट्राध्यक्ष अपने देश में सुख शान्ति बनाये रखने के लिए, आतंकवादी समूहों पर कठोर कार्यवाही कर रहें हैं !

ये समाज शास्त्री आगे कहते हैं कि चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बोस बाबू जैसे प्रचण्ड वीरों के हम वंशजों को क्या इन आतंकवादियों ने कायर समझ रखा है कि हम सिर्फ इनसे बार बार मार खाने के लिए ही पैदा हुए हैं ?

हमारे पास पिछले कई सालों से बहादुर फ़ौज तो रही है लेकिन बहादुर नेतृत्व तो अभी 2 वर्ष पूर्व ही मिला है जो आते ही हजारों पेंडिंग पड़े कामों को दुरुस्त करने में उलझ कर रह गया लेकिन अब सारे अन्य टॉप प्रेओरीटीज कामों के बराबर ही जरूरी हो गया है, पड़ोस से आ रहे आतंकवाद के कैंसर का प्रभावी इलाज करना !

जब कोई फोड़ा दवाईयों के लम्बे समय तक के प्रयोग के बावजूद भी ठीक होने की बजाय कैंसर में तब्दील हो जाए तो डॉक्टर भी उसकी सर्जरी करने की सलाह देते हैं यही हाल पाकिस्तानी आतंकवादियों का भी लगता है जिनका अब बातचीत से सुधरना सम्भव नहीं दिखता है !

अतः इन समाज शास्त्रियों का कहना है कि, अब इन कठिन परिस्थितियों में, अमेरिका की ही तरह भारत का भी कठोर राष्ट्र धर्म निभाने का वक्त आ गया है जिसके तहत सिर्फ इन आतंकवादियों को ही नहीं बल्कि इन आतंकवादियों की जड़ें चाहे वे कोई उनके पाकिस्तानी लीडर्स/मिलिट्री अधिकारी हों या भारत में रहने वाला राजनेता/मीडिया ग्रुप/संगठन हों, सबका उसी तरह से सफाया जरूरी है, जैसा एक जमाने में पंजाब में करके आतंकवाद को समाप्त कर दिया गया था !

ये समाज शास्त्री कहते हैं कि, अब तक के अनुभव के आधार पर कई देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने यही जाना कि ये आतंकवादी उन पौधों की तरह होते हैं जो भीषण गर्मी पड़ने पर ऐसे सूख जाते हैं जैसे लगता कि मानों अब उनमे जान ही नहीं बची लेकिन जैसे ही वे थोड़ी सी नमी पाते हैं, फिर से ऐसे हरे भरे होने लगते हैं जैसे लगता ही नहीं कि कभी वे एकदम सूख चुके थे !

इसलिए इनकी मुख्य जड़ अर्थात पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के शासन का भी कुछ परमानेंट जुगाड़ खोजना ही पड़ेगा ! इनकी शक्ति कम करने के लिए पाकिस्तान का विभाजन भी एक तरीका हो सकता है !

zawaइन समाज शास्त्रियों का पूरा जोर इसी बात पर है कि सरकार द्वारा किये जाने वाला प्रयास चाहे जो कुछ भी हो, लेकिन वो किसी ठोस परिणाम तक जरूर पहुंचना चाहिए अन्यथा उड़ी के नौजवानों का बलिदान उसी तरह व्यर्थ चला जाएगा जैसे पहले के हजारों नौजवानों का भी जा चुका है !

(दिनांक – 20 Sept 2016)

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