आत्मकथा – बच्चा महाराज – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

‘बाबू!’ जवान लड़के ने वृद्ध, धनिक और पुत्रवत्‍सल पिता को सम्‍बोधित किया। ‘बचवा… !’ ‘मिर्ज़ापुर में पुलिस सब-इन्‍स्‍पेक्‍टर की नौकरी मेरा एक दोस्‍त, जो कि पुलिस में है, मुझे दिलाने को तैयार है। क्‍या...

आत्मकथा – पं. जगन्नाथ पाँडे – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

अब मैं चौदह साल का हो चला था कि रामलीला-मण्‍डली से छुट्टी मनाने बड़़े भाई के संग चुनार आया। इस बार अलीगढ़ में किसी बात पर महन्‍त राममनोहरदास और मेरे बड़े भाई में वाद-विवाद...

आत्मकथा – लाला भगवान ‘दीन’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

अरसा हुआ वाराणसी के दैनिक अखबार ‘आज’ में आदरणीय पं. श्रीकृष्‍णदत्तजी पालीवाल की चर्चा करते हुए मैंने लिखा था कि मेरे पाँच गुरु हैं, जिनमें एक पालीवालजी भी हैं। उन पाँचों में मैं अपने...

आत्मकथा – पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

यह चर्चा सन् 1920 और 21 ई. के बीच की होगी। यह सब मैं स्‍मरण से लिख रहा हूँ, क्‍योंकि डायरी रखने की आदत मैंने नहीं पाली, इस ख़ौफ़ से कि कहीं राजा हरिश्‍चन्‍द्र...

आत्मकथा – बाबू शिवप्रसाद गुप्त’ – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

तो? तो क्‍या बाबू शिवप्रसाद गुप्‍त को भी स्‍वर्ग के फाटक से नहीं गुज़रने दिया गया? बाइबिल में लिखा है : सुई के सूराख़ से ऊँट निकल जाए — भले, परन्‍तु धनवान स्‍वर्ग के...

आत्मकथा – पं. कमलापति त्रिपाठी – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सो, तुम जीते – कमला, और बहुत ख़ूब जीते। अभी गत कल ही की तो बात है। तुम प्रादेशिक साहित्‍य-सम्‍मेलन के अध्‍यक्ष बने थे (सन् 1948-49)। उन्‍हीं दिनों लखनऊ में मैं भी मोहक मिनिस्‍टर...

आत्मकथा – बनारस और कलकत्ता – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

जब मैं चुनार से बनारस पढ़ने आया तब मन-ही-मन अपने सामाजिक स्‍टेटस पर बड़ा ही लज्जित-जैसा महसूस करता था। गुणहीन, ग़रीब, गर्हित चरित्र-लेकिन साल-दो साल रहकर जब काशी में कलियुगी रंग देखे तब दुखदायी...

आत्मकथा – जीवन-संक्षेप – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सन् 1921 ई. में जेल से आने के बाद नितान्‍त ग़रीबी में, ग़रीब रेट पर, ‘आज’ में मैं सन् 1924 के मध्‍य तक राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के पक्ष में प्रचारात्‍मक कहानियाँ, कविताएँ, गद्य-काव्‍य, एकांकी, व्‍यंग्‍य...

आत्मकथा – असंबल गान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

उपदेशक— तेरी कन्‍था के कोने में कुछ संबल, या संशय है, अरे पथिक, होने में? तेरी. यदि कुछ हो न ठहरता जा ना, कन्‍था अपनी भरता जा ना, करम दिखा इन बाज़ारों में कुछ...