आत्मकथा – बनारस और कलकत्ता – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

जब मैं चुनार से बनारस पढ़ने आया तब मन-ही-मन अपने सामाजिक स्‍टेटस पर बड़ा ही लज्जित-जैसा महसूस करता था। गुणहीन, ग़रीब, गर्हित चरित्र-लेकिन साल-दो साल रहकर जब काशी में कलियुगी रंग देखे तब दुखदायी...

आत्मकथा – जीवन-संक्षेप – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

सन् 1921 ई. में जेल से आने के बाद नितान्‍त ग़रीबी में, ग़रीब रेट पर, ‘आज’ में मैं सन् 1924 के मध्‍य तक राष्‍ट्रीय आन्‍दोलन के पक्ष में प्रचारात्‍मक कहानियाँ, कविताएँ, गद्य-काव्‍य, एकांकी, व्‍यंग्‍य...

आत्मकथा – असंबल गान – (लेखक – पांडेय बेचन शर्मा उग्र)

उपदेशक— तेरी कन्‍था के कोने में कुछ संबल, या संशय है, अरे पथिक, होने में? तेरी. यदि कुछ हो न ठहरता जा ना, कन्‍था अपनी भरता जा ना, करम दिखा इन बाज़ारों में कुछ...