बूढ़ा बाप कैंसर से जूझता, माँ अकेली हैरान और बेटे अपनी जिंदगी के सपने पूरे करते

· March 15, 2017

कुछ दिनों पूर्व एक आदरणीय सीनियर सिटीजन महिला ने “स्वयं बनें गोपाल” समूह को अपनी समस्याओं से अवगत कराया, जिनकी बातों को सुनकर हमें इतना दुःख हुआ कि हम यह लेख उन संवेदन हीन संतानों के लिए लिखने पर मजबूर हो गए जिन्हें इस बात की विशेष परवाह नहीं होती है कि उनके द्वारा लगातार प्रदर्शित किये जाने वाले उपेक्षा या उदासीनता के व्यवहार की वजह से भगवान् से भी ऊँचे माने जाने वाले माँ बाप अंदर ही अंदर रो रहें हैं पर उनके दुःख की आंच उनके बेटो तक ना पहुचने पाए इसलिए आज भी बेटों से अपनी आंतरिक मानसिक तकलीफ खुल कर बताने की बजाय, हमेशा बेटों से यही कहतें रहतें हैं कि बेटा हम लोग एकदम ठीक है इसलिए हम लोगों की चिंता करने की बजाय सिर्फ अपने काम, स्वास्थ और आराम पर ही ध्यान दो !


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वो सीनियर सिटीजन महिला बातचीत के दौरान भावुक होकर रोने लगी | उन्होंने काफी विस्तार से अपनी अंतर्मन की पीड़ा हमसे बतायी जिसका संक्षेप में हम यहाँ वर्णन कर रहें है –

वो महिला एक छोटे शहर के एक अच्छे सनाढ्य परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उनके पति रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं और पर्याप्त पेंशन प्राप्त कर लेतें है और बेटे भी अच्छे ओहदों पर हैं पर अचानक से उनके सुखी जीवन में एक बड़ा व्यवधान तब आ गया जब उनके पति को कैंसर हो गया है क्योकि वो नशा करते थे और यह समस्या केवल कैंसर तक ही नहीं रुकी है, बल्कि कैंसर के इलाज के लिए किये जाने वाले कड़े एलोपैथिक ट्रीटमेंट के साइड इफेक्ट्स की वजह से अब किडनी भी खराब होने लगी है !

वैसे कैंसर है तो अभी फर्स्ट स्टेज में ही लेकिन कैंसर के नाम का खौफ आज भी आम जनमानस में ऐसा फैला हुआ हैं कि मरीज एक बार तो घबड़ा ही जाता है !

उन महिला के बच्चों (जो दूसरे शहरों में रहकर नौकरी करतें हैं) को जब अपने पिता की बिमारी के बारे में पता चला तो वे किसी तरह अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर घर आये और अपने पिता को बड़े शहर के एक बड़े हॉस्पिटल में जांच करवाकर, दवाई वगैरह खरीदवा कर वापस अपनी नौकरी पर लौट गए !

संतानों ने तो मान लिया कि उन्होंने अपने बेटे होने का फर्ज बखूबी निभाया क्योंकि खुद की व्यस्त दिनचर्या होने के बावजूद, अपने पैसे से अपने पिता को हास्पिटल ले गए, महंगे डॉक्टर्स से कंसल्ट किया, दवाईयां खरीदी आदि आदि !

पर वास्तव में ऐसे कठिन समस्या में जो सबसे महत्वपूर्ण पहलूओं में से एक होता है, कि घबराए हुए मरीज को लगातार मानसिक ढांढस बधाना, हिम्मत देना, सहारा देना, उसके लिए उन्होंने क्या किया ?

बुढ़ापे में मानसिक सपोर्ट पाने के लिए माँ बाप का संतानों के साथ रहना बेहद बेहद बेहद जरूरी होता है | इसका कोई और विकल्प है ही नहीं क्योंकि संतानों से ज्यादा प्रिय और आत्मबल प्रदान करने वाला कोई दूसरा (जैसे नर्स, नौकर, रिश्तेदार, पड़ोसी, मित्र आदि) हो ही नहीं सकता है इसलिए बुढ़ापे में बेटों के द्वारा थोड़ी भी बेरुखी दिखाने पर माँ बाप के मन में बहुत चुभता है लेकिन धन्य है माँ बाप के भेष में छुपे भगवान् जो अपने ही बेटों द्वारा की जाने वाले प्रतिदिन की अनगिनत बेरुखी भरी हरकतों को हँसकर टाल देतें हैं !

खाली एकांत घर में रहने वाले बूढ़े माँ बाप को लगभग हर समय अपनी बिमारी की गंभीरता, तकलीफें व अन्य पुरानी कड़वी यादें सताती रहती हैं जिसकी वजह से मन ही मन घबराए हुए बूढ़े माँ बाप की आँखे बार बार अपने बेटों को तलाशती रहतीं हैं पर उन्हें ना पाकर निराश हो जातीं हैं, फिर सोचतीं है कि चलो कम से कम एक बार फोन से बात ही कर लिया जाए लेकिन तब भी फिर यही सोच कर रुक जातें है, कि बेटा तो अभी ऑफिस में बिजी होगा, इसलिए चलो रात में ही बात करतें हैं पर रात आते आते बेटा तो इतना थक जाता है कि सिर्फ एक दो मिनट ही फोन से बात करके रख देता है !

वास्तव में वह बेटा इस बात की गंभीरता को समझ ही नहीं पा रहा है, या समझ रहा है पर जानबूझकर नासमझ बनने का नाटक कर रहा है कि उसके माँ बाप जो किसी तरह 24 घंटा अपने बेसब्र दिल को रोज थामे रखतें हैं कि रात को बेटे से खूब बातें करके ही अपने बेटे के पास होने का काल्पनिक सुखद अहसास पाने की कोशिश करतें हैं, उनकी उम्मीद बुरी तरह से चकनाचूर हो जाती हैं जब उनका बेटा सिर्फ 2 – 3 बातें ही करके फोन रख देता है या कभी कभी तो हफ़्तों बात ही नहीं करता है !

अगर नौकरी या व्यापार की व्यस्तता की वजह से बेटे, माँ बाप के पास आकर नहीं रह पा रहें हों तो कम से कम बेटे को ही माँ बाप को अपने पास बुला लेना चाहिए लेकिन इसमें कहीं ना कहीं बेटे की पत्नि का उपेक्षा व अनिच्छा भरा व्यवहार भी रोड़ा बनते हुए अक्सर देखा गया है |

तो ऐसे में बेटे को खुद ही अपनी पत्नी को समझाना चाहिए कि उसके जन्म दाता माँ बाप उसके लिए कोई गेस्ट नहीं है जिन्हें कुछ दिन बाद जैसे तैसे करके अपने घर से विदा कर देना है बल्कि माँ बाप भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है जितनी बड़ी जिम्मेदारी पत्नी/बच्चे हैं इसलिए अब से लेकर आखिरी दम तक माँ बाप हमेशा, हमेशा और हमेशा मेरे साथ ही रहेंगे, चाहे तुम्हे पसंद आये या नहीं और अगर मेरे माँ बाप तुम्हारे लिये बोझ हैं, तो मैं तुम्हे बोझ के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं करूंगा, तुम पूर्ण स्वतंत्र हो इसलिए तुम जहाँ चाहे वहां जाकर रह सकती हो पर यदि तुम इसी घर में मेरे मातापिता के साथ ही रहना पसंद करोगी तो बिना किसी चालाकी या ड्रामा को किये हुए, तुम्हे मेरे बूढ़े मातापिता का ठीक उसी तरह दिल से ख्याल रखना होगा, जैसा कि तुम मायके में अपने खुद के मातापिता का करती हो |

पति के द्वारा इस तरह साफ़ साफ़ बात अपनी पत्नी से करने पर बेहद कामचोर और झगडालू पत्नी के स्वभाव में भी अक्सर नाटकीय रूप से सुधार आते हुए देखा गया है !

स्वार्थी व कामचोर पत्नी के प्रेमपाश में बंधकर अपने ही जन्म दाता बूढ़े, निरीह, कमजोर, बीमार माँ बाप से दूरी बना लेने वाले नपुंसक पतियों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वो वक्त दूर नहीं जब वो भी बूढ़े होंगे और उनकी संतान व बहू भी कोई ना कोई कारण, बहाना आदि बनाकर उनकी सेवा ना करने का बहाना ठीक उसी तरह ढूढेंगे जैसा कि आज वे कर रहें हैं ! .

निष्कर्ष यही है कि बूढ़े व बीमार माँ बाप के संतानों को यह बात अच्छे से समझने की जरूरत है कि सही इलाज के लिए माँ बाप का मानसिक रूप से सिक्योर महसूस करना बहुत जरूरी है और यह तभी हो पायेगा जब उनके बुढ़ापे की लाठी अर्थात उनके जवान बेटे उनके साथ नियमित समय बिताएं, जैसे सुबह शाम उनके पास बैठकर चाय पीते समय उनका प्यार से हाल चाल पूछे, उन्हें अपने हाथ से दवाई खिलाएं, उन्हें बाथरूम टॉयलेट ले जाने में मदद करें और अगर कभी कमजोरी में बिस्तर पर ही मल मूत्र त्याग हो जाएँ तो बिना नाक भौ सिकोड़े, उतने ही प्रेम व उत्साह से उसकी सफाई भी करे, जितने प्रेम से कोई मंदिर में भगवान का फूलों से श्रृंगार करता है !

वास्तव में यही सच्चाई है कि किसी बेहद बीमार परिचित अपरिचित व्यक्ति के मल मूत्र गन्दगी से सने शरीर की सफाई का कई कई कई गुणा अधिक पुण्य फल मिलता है, मंदिर में भगवान् की सुंदर मूर्ती का खुशबू युक्त फूलों से श्रृंगार करने की तुलना में क्योंकि हर बीमार, कमजोर, निसहाय, गरीब नर (मानव) वास्तव में प्रत्यक्ष नारायण का ही अंश रूप है और जो इस सच्चाई को एक बार अच्छे से समझ जातें हैं, वे अपने मरने से पहले अधिक से अधिक ऐसे गरीबों की सहायता, स्वयं अपने हाथों से करने का मौका बिल्कुल नहीं चूकना चाहतें हैं !

अगर हम बात करें कैंसर बिमारी की तो यह बीमारी आजकल इतनी ज्यादा तेजी से फ़ैल रही है कि जैसे हर घर में आलू प्याज मिल जायेंगे, वैसे ही हर घर परिवार खानदान में कोई ना कोई कैंसर से ग्रसित मरीज मिल ही जाएगा, इसलिए अब कैंसर से घबराने की नहीं, बल्कि लड़ने की जरूरत है |

साथ ही साथ हर संतान को अच्छे से समझने की जरूरत है कि जैसे अगर ऑफिस नहीं जायेंगे तो पैसा नहीं कमा पायेंगे, अगर काम पूरा नहीं करेंगे तो बॉस से डांट खायेंगे, अगर कार में पेट्रोल नहीं भरवाएंगे तो कार नहीं चला पायेंगे, अगर घर में सब्जी नहीं लायेंगे तो घर का खाना नहीं खा पायेंगे, ठीक उसी तरह अगर आज बूढ़े माँ बाप की सेवा नहीं करेंगे तो खुद बुढ़ापे में कोई सेवा नहीं पायेंगे (कम से कम अपने संतान के हाथ से तो नहीं ही पायेंगे) |

इसलिए माँ बाप चाहे जैसे हों, उनमे कमी निकाल कर सेवा ना करने का बहाना ढूढने की बजाय, तुरंत उनकी सेवा में लग जाने की जरूरत है, जिसका एक बड़ा फायदा यह भी है कि शास्त्रोंनुसार अटल प्रारब्ध से जीवन में मिला कोई अकाट्य कष्ट (जैसे कोई खतरनाक बीमारी या गरीबी) सिर्फ माँ बाप के आशीर्वाद से ही निश्चित समाप्त हो सकता है, इसलिए बड़े दुर्भाग्यशाली है वे बेटें जिनके माँबाप, बिना उनकी सेवा प्राप्त किये हुए इस दुनिया से विदा हो जातें हैं |

वास्तव में यह बेशकीमती आशीर्वाद तभी निकलता है जब कोई संतान बिना किसी निजी स्वार्थ (जैसे ज्यादाद, सैलरी/पेंशन आदि में हिस्सा या लोक लाज का डर) के सच्चे मन से अपने माता पिता की लम्बे समय तक सेवा करता है !

ईश्वर का बनाया हुआ विचित्र नियम है कि जो ताकत में जितना ज्यादा कमजोर (जैसे बूढ़ा, बीमार, गरीब या कोई निरीह जानवर) होता है, उसके श्राप और आशीर्वाद में उतना ही ज्यादा ताकत होती है, जिसका बड़ा उदाहरण है, उन लोगों के जिंदगी में आये दिन पैदा होने वाली समस्याएं (जैसे बिमारी, एक्सीडेंट, झगड़े, आर्थिक घाटा, अपमान, मानसिक अशांति आदि) जो चिकन, फिश आदि जैसे निरीह, कमजोर, बेजुबान जानवरों को खाकर उनके श्राप के भागीदार बनते हैं !

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