हस्त मुद्राऐं और उनके लाभ

ब्रह्म मुद्रा (Brahma mudra) –

– रीढ़ की हड्डी और गर्दन सीधी रखते हुए गर्दन को धीरे-धीरे दाईं ओर ले जाएं, कुछ देर रुकें और फिर गर्दन को सीधे बाईं ओर ले जाएं। फिर कुछ सेकंड बाद पुनः दाईं ओर सिर घुमाएं। अब सिर को 3-4 बार क्लॉकवाइज और उतनी ही बार एंटी क्लॉकवाइज घुमाएं।

लाभ – इससे अवसाद व तनाव दूर होता है ! जिन लोगों को सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस (cervical spondylosis), थाइरॉयड या गर्दन से संबंधित कोई गंभीर रोग हो वे चिकित्सक (Yoga Doctor or Yoga Expert) की सलाह पर ही यह मुद्रा करें !

120150704-0013वरुण मुद्रा (Varuna mudra)-

– कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) तथा अंगूठे के सिरे को मिलाकर बाकी अँगुलियों को सीध में रखने पर वरुण मुद्रा बनती है।

लाभ – चर्मरोग से मुक्ति दिलाने, रक्त की न्यूनता (anemia -एनीमिया) दूर करने में परम सहायक है।

 

120150704-0008योनि मुद्रा (Yoni mudra) –

– दोनों हाथों की अंगुलियों का उपयोग करते हुए सबसे पहले दोनों कनिष्ठा अंगुलियों को आपस में मिलाएं और दोनों अंगूठे के प्रथम पोर को कनिष्ठा के अंतिम पोर से स्पर्श करें। फिर कनिष्ठा अंगुलियों के नीचे दोनों मध्यमा अंगुलियों को रखते हुए उनके प्रथम पोर को आपस में मिलाएं।

मध्यमा अंगुलियों के नीचे अनामिका अंगुलियों को एक-दूसरे के विपरीत रखें और उनके दोनों नाखुनों को तर्जनी अंगुली के प्रथम पोर से दबाएं।

लाभ – शरीर की सकारात्मक सोच सोच का विकास करती है और मस्तिष्क, हृदय और फेंफड़े स्वस्थ बनते हैं।

शक्तिपान मुद्रा (Shaktipan Mudra) –

– दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी अंगुली को इस तरह से मिला लें कि पान की सी आकृति बन जाएं तथा दोनों हाथों की बची हुई तीनों अंगुलियों को हथेली से लगा ले।

लाभ – ब्रेन की शक्ति में बहुत विकास होता है।

माण्डुकी मुद्रा (Manduki mudra) –

– मुंह बंद करके जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं। तालू से टपकती हुई लार को पीये ।

लाभ – स्वास्थ सुधरता है इससे त्वचा चमकदार बनती है तथा इसके नियमित अभ्यास से वात-पित्त एवं कफ की समस्या दूर हो जाती है।

20150704-0001ज्ञान मुद्रा (Gyan mudra) –

– अंगूठे और तर्जनी (पहली उंगली) के सिरों को आपस में सटाने पर ज्ञान मुद्रा बनती है।

लाभ – सभी मानसिक रोगों जैसे पागलपन, चिडचिडापन, क्रोध, चंचलता, चिंता, भय, घबराहट, अनिद्रा रोग, डिप्रेशन में बहुत लाभ पहुचता है (to overcome madness, irritation, playfulness, anger, anxiety, worry, fear, sadness, depression)।

20150704-0002वायु मुद्रा (Vayu Mudra)-

– पहली अंगुली, तर्जनी को मोड़कर उसके सिरे को अंगूठे के जड़ भाग में लगाया जाता है बाकी तीनो अँगुलियों को सीधा रखते हैं।

लाभ – वायु संबन्धी समस्त रोग जैसे – गठिया, जोडों का दर्द, पक्षाघात, हाथ पैर या शरीर में कम्पन, लकवा, हिस्टीरिया, वायु शूल, गैस, (arthritis, joint pain, paralysis, parkinson, hysteria, gastric problem, gas) इत्यादि अनेक रोगों में फायदा हैं।

20150704-0003शून्य मुद्रा (Shunya Mudra or Shoonya mudra) –

– अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा, सबसे लम्बी वाली अंगुली) को मोड़कर अंगूठे के जड़ में स्पर्श करें और अंगूठे को मोड़कर मध्यमा के ऊपर से ऐसे हल्के से दबायें कि मध्यमा उंगली का निरंतर स्पर्श अंगूठे के मूल भाग से बना रहे, बाकी की तीनो अँगुलियों को अपनी सीध में रखें।

लाभ – कान बहना, बहरापन, कान में दर्द (ear discharge deafness earache) इत्यादि कान के विभिन्न रोगों से मुक्ति संभव है।

20150704-0014सूर्य मुद्रा (surya mudra) –

– अंगूठे से तीसरी अंगुली अनामिका (रिंग फिंगर) को मोड़कर उसके सिरे को अंगूठे के जड़ से सटाये और अंगूठा मोड़कर अनामिका पर हल्का दवाब बनाये रखें तथा बाकी अँगुलियों को सीधा रखें।

लाभ – मोटापा घटाने में बहुत सहायक होता है! नोट – सूर्य मुद्रा का अभ्यास 2 मिनट से 4 मिनट तक ही करना चाहिए और सूर्य मुद्रा का अभ्यास करने वाले को लहसुन, प्याज, मांसाहार (onion garlic non vegetarian food) एकदम नहीं खाना चाहिए और समय से सोना और खाना बहुत जरुरी है!

20150704-0006प्राण मुद्रा (pran mudra) –

– अंगूठे से तीसरी अनामिका तथा चौथी कनिष्ठिका अँगुलियों के सिरों को एकसाथ अंगूठे के सिरे के साथ मिलाकर शेष दोनों अँगुलियों को अपने सीध में खडा रखने से जो मुद्रा बनती है उसे प्राण मुद्रा (prana mudra) कहते हैं।

लाभ – ह्रदय रोग और आँख की रोशनी में फायदा है। साथ ही यह प्राण शक्ति बढ़ाने वाला होता है।

120150704-0009अपान मुद्रा (apana mudra benefits) –

– अंगूठे से दूसरी अंगुली (मध्यमा) तथा तीसरी अंगुली (अनामिका) के सिरों को मोड़कर अंगूठे के सिरे से स्पर्श करने से जो मुद्रा बनती है, उसे अपान मुद्रा (apan mudra) कहते हैं।

लाभ – कब्ज और पेशाब की समस्याओ में फायदा है।

 

20150704-0010पुष्पांजलि मुद्रा (Pushpanjali Mudra) –

पुष्प अर्पण करते समय या भगवान से कुछ मांगते समय आपके हाथ जैसे रहते हैं वैसे ही यह मुद्रा बनती है – दोनों खुली और सीधी हथेलियों को अगल- बगल सटा कर।

लाभ – इसको निरंतर अभ्यास करने से नींद अच्छी तरह से आने लगती है। आत्मविश्वास बढ़ता है।

(सावधानी – मुद्राओं का अभ्यास साधारणतः 5 मिनट तक करना चाहिए, इससे ऊपर करने के लिए व्यक्ति के शरीर की स्थिति की एनालिसिस और जानकार योग चिकित्सक की सलाह जरुरी है)

 
 

 

 
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