सिर्फ ये एक काम करने से आँखों के सारे रोगों के नाश होता है

हमारे अनन्त वर्ष पुराने और अति सम्माननीय हिन्दू धर्म में एक से बढ़कर एक चमत्कारी योग और दवाओं का वर्णन आता है जिनको सही तरीके से करने से वाकई में चमत्कारी लाभ मिलते है और इसी वजह से विश्व के कई अमीर देश (अमेरिका, यूरोपियन देश आदि) जो हमारे आयुर्वेद, योग, ज्योतिष आदि कई विषयों पर सालों रिसर्च करके उसके आश्चर्यजनक रिजल्ट देख हैरान होकर, गुपचुप तरीके से हमारे आयुर्वेदिक दवाओं और योग की क्रियाओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट कराकर अपना नाम दे रहें है |

तो हमारे इसी योग शास्त्र के हठ योग साधना पद्धति में एक क्रिया होती है जिसका नाम है त्राटक ! इस त्राटक को आँखों के सभी रोगों और विकृतियों को नष्ट करने वाला बताया गया है | त्राटक में जो सबसे जरूरी बात ये है की इसको करने में कभी भी जल्दीबाजी नहीं करना चाहिए नहीं तो ये फायदा के बजाय नुकसान भी कर सकता है |

सही तरीके से त्राटक करने से कई – कई साल पुराना चश्मा भी उतर जाता है और ये मोतियाबिंद में भी फायदा है | त्राटक से आंख की बिमारियों के नाश में कुछ महीने से कुछ साल भी लग सकते है क्योकी त्राटक करने का समय बहुत धीरे धीरे बढ़ाना चाहिए जिससे आँखों पर जोर ना पड़े |

त्राटक दो तरह के होते है एक बाह्य त्राटक और दूसरा आतंरिक त्राटक |

जिनको सिर्फ अपने आँखों के रोग दूर करने है उन्हें बाह्य त्राटक करना चाहिए और जिन्हें अपना आज्ञाचक्र (जो की दोनों भौं के बीच अदृश्य रूप से होता है) जगा कर रहस्यमय अतीन्द्रिय शक्तिया पानी होती है वो आन्तरिक त्राटक करते है | इसलिए भारतीय योगी सदा ही आन्तरिक त्राटक का इष्ट- ध्यान के रूप में प्रयोग करते रहे हैं।

बाह्य त्राटक की विधि –

इसमें नजर को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर उसमें मन को तन्मयतापूर्वक प्रवेश कराने से नेत्रों द्वारा विकीर्ण होने वाला मनःतेज एवं विद्युत् प्रवाह एक स्थान पर केन्द्रीभूत होने लगता है। इससे एक तो एकाग्रता बढ़ती है, दूसरे नेत्रों का प्रवाह- चुम्बकत्व या आकर्षण बढ़ जाता है। मन की एकाग्रता, चूँकि त्राटक के अभ्यास में अनिवार्य रूप से करनी पड़ती है, इसलिए उससे अपने मन पर बहुत कुछ काबू पाया जा सकता है।

इसकी विधि है एक सफ़ेद कागज पर बीच में रुपए के बराबर एक काला गोल निशान बना लीजिये। स्याही एक सी हो, कहीं कम- ज्यादा न हो। इसके बीच में सरसों के बराबर निशान छोड़ दीजिये और उसमें पीला रंग भर दीजिये। अब उससे चार फीट की दूरी पर इस प्रकार बैठिये कि वह काला गोला आपकी आँखों के सामने और एकदम सीध में हो।

साधना का एक कमरा ऐसा होना चाहिए जिसमें न अधिक प्रकाश रहे, न अँधेरा, न अधिक सर्दी हो, न गर्मी और न शोर हो। पालथी मारकर, मेरुदण्ड सीधा रखते हुए बैठिये और काले गोले के बीच में जो पीला निशान हो, उस पर नजर जमाइए। मन की सारी बाते भुलाकर कर केवल उस बिन्दु को लगातार कुछ देर तक देखिए |

अगर आप चश्मा लगाते है तो इस अभ्यास को चश्मा उतार कर करे पर इस बात का जरूर ध्यान दें की शुरू के दिनों में त्राटक को बहुत कम देर के लिए मतलब कुछ सेकंड्स (20 – 30 सेकंड्स) के लिए करे और फिर कुछ दिन बाद रोज का अभ्यास 5 – 10 सेकंड्स बढ़ाते जाय | जब भी आँखें थक जाय या पानी आ जाय तुरन्त आंखे बंद करके अपने हथेलियों की गर्म सेंक दें।

हथेलियों की गर्म सेंक देना भी काफी जरूरी प्रक्रिया है और इससे भी आँखों की रोशनी में बड़ा फायदा मिलता है |

जब अभ्यास आधे घंटे तक पहुच जाय तो फिर त्राटक का समय बढ़ाना रोक दीजिये | आधे घंटे के अभ्यास से ही आपके आँखों के सारे रोंगों का नाश होने लगेगा |

नजर को स्थिर करने पर उस काले गोले में तरह- तरह की आकृतियाँ पैदा होती दिखाई दे सकती हैं। कभी वह सफेद रंग का हो जाएगा तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा, कभी चिनगारियाँ- सी उड़़ती दीखेंगी, कभी बादल- से छाए हुए मालूम होंगे। इस प्रकार यह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा, किन्तु जैसे- जैसे दृष्टि स्थिर होना शुरू हो जाएगी, उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जाएँगी और देर तक देखते रहने पर भी गोला ज्यों का त्यों बना रहेगा।

आतंरिक त्राटक की विधि –

गो- घृत का दीपक जलाकर नेत्रों की सीध में चार फुट की दूरी पर रखिए। दीपक की लौ आधा इञ्च से कम उठी हुई न हो, इसलिए मोटी बत्ती डालना और पिघला हुआ घृत भरना आवश्यक है। बिना पलक झपकाए कुछ सेकंड के लिए इस अग्निशिखा को देखिये और फिर आंख बंद करके यह भावना कीजिए कि भ्रूमध्य में (मतलब दोनों भौं के बीच में) भी एक दिव्य ज्योति या प्रकाश चमक रहा है फिर थोड़ी – थोड़ी देर पर उस दीपक की लौ को देखते रहिये जिससे आंख बंद करने पर भ्रूमध्य में भी ज्योति दिखने लगे |

कुछ महीने लगातार अभ्यास करने से भ्रूमध्य में आंख बंद करने पर सही में दिव्य ज्योति दिखने लगती है जिसको अधिक से अधिक देखने पर बहुत ख़ुशी मिलती है और शरीर के सारे रोगों का भी नाश होने लगता है और कई दिव्य चमत्कारी सिद्धियाँ भी मिलती है |

अपनी सुविधा, स्थिति और रुचि के अनुरूप इन त्राटकों में से किसी को चुन लेना चाहिए और उसे नियत समय पर नियम पूर्वक करते रहना चाहिए। इससे मन एकाग्र होता है और दृष्टि में बेधकता, पारदर्शिता एवं प्रभावोत्पादकता की अभिवृद्धि होती है।

त्राटक पर से उठने के पश्चात् गुलाब जल से आँखों को धो डालना चाहिए। गुलाब जल न मिले तो स्वच्छ छना हुआ ताजा पानी भी काम में लाया जा सकता है। आँख धोने के लिए छोटी काँच की प्यालियाँ अंग्रेजी दवा बेचने वालों की दुकान पर मिलती हैं, वह सुविधाजनक होती हैं।

न मिलने पर कटोरी में पानी भरके उसमें आँखें खोलकर डुबाने और पलक हिलाने से आँखें धुल जाती हैं। इस प्रकार के नेत्र स्नान से त्राटक के कारण उत्पन्न हुई आँखों की उष्णता शान्त हो जाती है।

त्राटक का अभ्यास समाप्त करने के उपरान्त साधना के कारण बढ़ी हुई मानसिक गर्मी के समाधान के लिए दूध, दही, लस्सी, मक्खन, मिश्री, फल, शर्बत, ठण्डाई आदि कोई ठण्डी पौष्टिक चीजें, ऋतु का ध्यान रखते हुए सेवन करनी चाहिए। जाड़े के दिनों में बादाम का हलुवा, च्यवनप्राश अवलेह आदि वस्तुएँ भी उपयोगी होती हैं।

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